Shimla Disaster Risk: भूकंप ही नहीं, अब भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का भी बड़ा खतरा; नई रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
नगर निगम शिमला की नई क्लाइमेट रिस्क एंड वल्नरेबिलिटी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि राजधानी अब केवल भूकंप ही नहीं बल्कि भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, क्लाउडबर्स्ट और जलवायु परिवर्तन से भी गंभीर खतरे में है। रिपोर्ट में नई आपदा नीति, क्लाइमेट डाटाबेस, डिजिटल मैपिंग और वैज्ञानिक आधार पर जोखिम प्रबंधन की सिफारिश की गई है।
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राजधानी शिमला अब केवल भूकंप ही नहीं, बल्कि भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, बादल फटने और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अन्य प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे का सामना कर रही है। नगर निगम शिमला की ओर से कराए गए मल्टी-हैजार्ड क्लाइमेट रिस्क एंड वल्नरेबिलिटी असेसमेंट (सीआरवीए) अध्ययन में सामने आया है कि बदलती जलवायु और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने शहर की संवेदनशीलता पहले की तुलना में काफी बढ़ा दी है।
करीब दस वर्षों के आंकड़ों और प्राकृतिक आपदाओं के विश्लेषण पर आधारित इस अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि शिमला के लिए नई आपदा प्रबंधन नीति तैयार की जाए, जिसमें जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को प्राथमिकता दी जाए। रिपोर्ट के अनुसार भविष्य में बादल फटना, अचानक आने वाली बाढ़ (फ्लैश फ्लड), भूस्खलन और अनियोजित निर्माण शहर के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां बन सकते हैं।
अध्ययन में बताया गया है कि वर्ष 2016 में कराए गए सर्वे में मुख्य रूप से भूकंप, बर्फबारी और ओलावृष्टि को प्रमुख खतरा माना गया था। हालांकि नए अध्ययन में पहली बार क्लाउडबर्स्ट, फ्लैश फ्लड, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी गंभीर जोखिम की श्रेणी में शामिल किया गया है।
रिपोर्ट में नगर निगम को शहर का केंद्रीकृत क्लाइमेट डाटाबेस तैयार करने, संवेदनशील आबादी और सरकारी परिसंपत्तियों की डिजिटल मैपिंग करने, जल स्रोतों और पर्यटन क्षेत्रों का अलग से जोखिम मूल्यांकन करने तथा मास्टर प्लान और भवन निर्माण नियमों में जलवायु जोखिम को शामिल करने की सिफारिश की गई है। साथ ही रियल टाइम क्लाइमेट मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित करने, नियमित जोखिम मूल्यांकन और वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर नीतियां तैयार करने पर भी जोर दिया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार कृष्णानगर, शिव बावड़ी, फागली, लोअर कैथू, अपर कैथू, समरहिल, बालूगंज, टूटीकंडी, संजौली, ढली, भराड़ी, जाखू की ढलानें और नवबहार के कुछ हिस्से सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल हैं। इन इलाकों में खड़ी ढलानें, कमजोर भूगर्भीय संरचना, अनियोजित निर्माण, पहाड़ियों की कटिंग और खराब जल निकासी व्यवस्था जोखिम को और बढ़ा रही है।
पिछले कुछ वर्षों में शिमला में भूस्खलन और जमीन धंसने की घटनाओं में लगातार वृद्धि हुई है। वर्ष 2023 में समरहिल, शिव बावड़ी, कृष्णानगर और फागली सहित कई क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ था। वहीं 2025 में भी बैनमोर, कृष्णानगर, हिमलैंड, पंथाघाटी और न्यू शिमला में जमीन धंसने की घटनाएं सामने आई थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ते निर्माण कार्य और जलवायु परिवर्तन के संयुक्त प्रभाव से भविष्य में ऐसे खतरे और बढ़ सकते हैं।
नगर निगम के अतिरिक्त आयुक्त डॉ. भुवन शर्मा ने बताया कि नए अध्ययन में पहली बार फ्लैश फ्लड, क्लाउडबर्स्ट और तेजी से बढ़ती आबादी को भी जोखिम मूल्यांकन में शामिल किया गया है। इन निष्कर्षों के आधार पर भविष्य की योजनाएं और नीतियां तैयार की जाएंगी ताकि शहर को संभावित आपदाओं से बेहतर सुरक्षा मिल सके।