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नवरात्रि के नौ दिन इन मंत्र, चालीसा और आरती से करें पूजा, मां दुर्गा की मिलेगी असीम कृपा

Mon, 12 Oct 2026 01:36 PM IST
मेघा कुमारी धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: मेघा कुमारी Updated Mon, 12 Oct 2026 01:36 PM IST
सार

Shardiya Navratri 2026: नवरात्रि के इन नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है। पूजा के दौरान देवी मंत्रों का जाप करने और श्रद्धापूर्वक आरती करने से भक्त मां का आशीर्वाद प्राप्त करने की कामना करते हैं।

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Shardiya Navratri Mantra Aarti Chalisa for 9 dayes in hindi
Shardiya Navratri 2026 - फोटो : अमर उजाला AI

विस्तार

Shardiya Navratri 2026: हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व माना जाता है। इन नौ दिनों में भक्त पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मां दुर्गा की उपासना करते हैं। साथ ही, कई भक्त नौ दिनों तक व्रत रखकर देवी मां से सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। मान्यता है कि नवरात्रि के दिनों में विधि-विधान से मां दुर्गा की पूजा करने से देवी की कृपा प्राप्त होती है। शास्त्रों के अनुसार, शारदीय नवरात्रि का पर्व धार्मिक आस्था के साथ-साथ आत्मसंयम, धैर्य और मन की शुद्धता से भी जुड़ा हुआ है। इस साल शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ 11 अक्तूबर 2026 से हो चुका है। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप को समर्पित होता है और भक्त उनके स्वरूप के अनुसार पूजा-पाठ, मंत्र जाप और आरती करते हैं। इस दौरान नवरात्रि में सुबह-शाम मां की आरती करने के साथ दुर्गा चालीसा और देवी मंत्रों का जाप करना भी शुभ माना जाता है। ऐसे में आप यहां दिए गए मंत्र, दुर्गा चालीसा और आरती का पाठ पूजा के दौरान कर सकते हैं।

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मां दुर्गा की आरती 

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥
जय अम्बे गौरी
माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।
उज्जवल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥
जय अम्बे गौरी

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥
जय अम्बे गौरी
केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।
सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥
जय अम्बे गौरी

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।
कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥
जय अम्बे गौरी
शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।
धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥
जय अम्बे गौरी

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।
मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥
जय अम्बे गौरी
ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी।
आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥
जय अम्बे गौरी

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरूँ।
बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु॥
जय अम्बे गौरी
तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।
भक्तन की दु:ख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥
जय अम्बे गौरी

भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।
मनवान्छित फल पावत, सेवत नर-नारी॥
जय अम्बे गौरी
कन्चन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।
श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥
जय अम्बे गौरी

श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।
कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै॥
जय अम्बे गौरी

नवरात्रि नौ दिन की पूजा के मंत्र
  • मां शैलपुत्री का मंत्र- ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः
  • मां ब्रह्मचारिणी का मंत्र- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:
  • मां चन्द्रघण्टा का मंत्र- ॐ देवी चन्द्रघंटायै नमः
  • देवी कूष्माण्डा का मंत्र - ॐ कूष्माण्डायै नमः
  • देवी स्कंदमाता का मंत्र - ॐ स्कन्दमात्राय नमः
  • देवी कात्यायनी का मंत्र - ॐ कात्यायनै नमः
  • देवी कालरात्रि का मंत्र - ॐ कालरात्र्यै नमः
  • देवी महागौरी का मंत्र - ॐ महागौर्यै नमः
  • देवी सिद्धिदात्री का मंत्र- ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः
  • श्री दुर्गा चालीसा

    नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
    नमो नमो अंबे दुःख हरनी ॥  

    निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
    तिहू लोक फैली उजियारी ॥  

    शशि ललाट मुख महाविशाला ।
    नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ 

    रूप मातु को अधिक सुहावे ।
    दरश करत जन अति सुख पावे ॥  

    तुम संसार शक्ति लय कीना ।
    पालन हेतु अन्न धन दीना ॥  

    अन्नपूर्णा हुयि जग पाला ।
    तुम ही आदि सुंदरी बाला ॥  

    प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
    तुम गौरी शिव शंकर प्यारी ॥  

    शिव योगी तुम्हरे गुण गावेम् ।
    ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावेम् ॥  

    रूप सरस्वती का तुम धारा ।
    दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥  

    धरा रूप नरसिंह को अंबा ।
    परगट भयि फाड के खंबा ॥  

    रक्षा कर प्रह्लाद बचायो ।
    हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥  

    लक्ष्मी रूप धरो जग माहीम् ।
    श्री नारायण अंग समाहीम् ॥  

    क्षीरसिंधु में करत विलासा ।
    दयासिंधु दीजै मन आसा ॥  

    हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
    महिमा अमित न जात बखानी ॥  

    मातंगी धूमावति माता ।
    भुवनेश्वरी बगला सुखदाता ॥  

    श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
    छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥  

    केहरि वाहन सोह भवानी ।
    लांगुर वीर चलत अगवानी ॥  

    कर में खप्पर खडग विराजे ।
    जाको देख काल डर भाजे ॥  

    तोहे कर में अस्त्र त्रिशूला ।
    जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥  

    नगरकोटि में तुम्हीं विराजत ।
    तिहुँ लोक में डंका बाजत ॥  

    शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे ।
    रक्तबीज शंखन संहारे ॥  

    महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
    जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥  

    रूप कराल कालिका धारा ।
    सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥  

    पडी भीढ संतन पर जब जब ।
    भयि सहाय मातु तुम तब तब ॥  

    अमरपुरी अरु बासव लोका ।
    तब महिमा सब कहें अशोका ॥  

    ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
    तुम्हें सदा पूजें नर नारी ॥  

    प्रेम भक्ति से जो यश गावेम् ।
    दुःख दारिद्र निकट नहिं आवेम् ॥  

    ध्यावे तुम्हें जो नर मन लायि ।
    जन्म मरण ते सौं छुट जायि ॥ 

    जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
    योग न होयि बिन शक्ति तुम्हारी ॥ 

    शंकर आचारज तप कीनो ।
    काम अरु क्रोध जीत सब लीनो ॥ 

    निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
    काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥  

    शक्ति रूप को मरम न पायो ।
    शक्ति गयी तब मन पछतायो ॥  

    शरणागत हुयि कीर्ति बखानी ।
    जय जय जय जगदंब भवानी ॥  

    भयि प्रसन्न आदि जगदंबा ।
    दयि शक्ति नहिं कीन विलंबा ॥  

    मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
    तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ 

    आशा तृष्णा निपट सतावेम् ।
    रिपु मूरख मॊहि अति दर पावैम् ॥  

    शत्रु नाश कीजै महारानी ।
    सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥  

    करो कृपा हे मातु दयाला ।
    ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला ॥  

    जब लगि जियू दया फल पावू ।
    तुम्हरो यश मैं सदा सुनावू ॥  

    दुर्गा चालीसा जो गावै ।
    सब सुख भोग परमपद पावै ॥  

    देवीदास शरण निज जानी ।
    करहु कृपा जगदंब भवानी ॥

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