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देवशयनी एकादशी पर कैसे कराएं भगवान विष्णु का शयन? जानें पूजा विधि, नियम और सावधानियां
Thu, 23 Jul 2026 06:13 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Thu, 23 Jul 2026 06:13 PM IST
सार
Devshayani Ekadashi 2026: भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ चातुर्मास का आरंभ होता है, जो कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक चलता है।
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देवशयनी एकादशी के दिन सात्विकता का विशेष महत्व बताया गया है।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Devshayani Ekadashi 2026: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। पद्म पुराण, स्कंद पुराण और भविष्य पुराण के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ चातुर्मास का आरंभ होता है, जो कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक चलता है। इस दिन अनेक भक्त भगवान विष्णु की विशेष पूजा कर उन्हें प्रतीकात्मक रूप से शयन कराते हैं। यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि भगवान के प्रति प्रेम, समर्पण और सेवा का भाव व्यक्त करने का माध्यम है।
भगवान को कैसे कराएं शयन?
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार प्रातः स्नान के बाद पूजा स्थल को स्वच्छ कर भगवान विष्णु या श्रीलक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। पंचामृत एवं गंगाजल से अभिषेक करने के बाद पीले वस्त्र अर्पित करें। चंदन का तिलक लगाएं, तुलसी दल, पीले पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और मौसमी फल अर्पित करें। इसके बाद भगवान को खीर या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। पूजन के अंत में भगवान के समक्ष एक स्वच्छ पीला या सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर छोटा तकिया या गद्दी प्रतीक रूप में रखें। भगवान से प्रार्थना करें कि वे चार माह के लिए योगनिद्रा में विराजमान हों और समस्त सृष्टि पर अपनी कृपा बनाए रखें। इस अवसर पर "ॐ नमो नारायणाय" अथवा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है।
इन नियमों का रखें विशेष ध्यान
देवशयनी एकादशी के दिन सात्विकता का विशेष महत्व बताया गया है। व्रत रखने वाले को क्रोध, असत्य, कटु वचन और तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। पूजा में भगवान विष्णु को तुलसी दल अवश्य अर्पित करें, क्योंकि शास्त्रों में तुलसी के बिना विष्णु पूजन को अपूर्ण माना गया है। यथाशक्ति दान, जप और रात्रि जागरण भी पुण्यदायी बताए गए हैं।
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ये सावधानियां भी हैं आवश्यक
शास्त्रों के अनुसार भगवान को शयन कराने की परंपरा श्रद्धा और भाव से की जाती है, इसलिए इसे केवल दिखावे या औपचारिकता न बनाएं। भगवान को अर्पित तुलसी दल खंडित या बासी न हो। पूजा में अपवित्र या फटे वस्त्र धारण करने से बचें। एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है तथा तामसिक पदार्थों से भी दूर रहने की सलाह दी गई है। पूजा के समय मन को शांत रखें और अनावश्यक विवाद या क्रोध से बचें।
शयन का आध्यात्मिक संदेश
पुराणों में वर्णित भगवान विष्णु की योगनिद्रा का अर्थ सामान्य निद्रा नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन और संरक्षण की दिव्य अवस्था है। इसलिए देवशयनी एकादशी पर भगवान को शयन कराते समय भक्त यह प्रार्थना करते हैं कि श्रीहरि की कृपा से उनके जीवन में धर्म, सुख, समृद्धि और मंगल बना रहे। श्रद्धा, शुद्धता और विधिपूर्वक की गई यह पूजा चातुर्मास के चार महीनों को आध्यात्मिक साधना और भगवान की भक्ति के लिए शुभ आरंभ प्रदान करती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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भगवान को कैसे कराएं शयन?
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार प्रातः स्नान के बाद पूजा स्थल को स्वच्छ कर भगवान विष्णु या श्रीलक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। पंचामृत एवं गंगाजल से अभिषेक करने के बाद पीले वस्त्र अर्पित करें। चंदन का तिलक लगाएं, तुलसी दल, पीले पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और मौसमी फल अर्पित करें। इसके बाद भगवान को खीर या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं। पूजन के अंत में भगवान के समक्ष एक स्वच्छ पीला या सफेद वस्त्र बिछाकर उस पर छोटा तकिया या गद्दी प्रतीक रूप में रखें। भगवान से प्रार्थना करें कि वे चार माह के लिए योगनिद्रा में विराजमान हों और समस्त सृष्टि पर अपनी कृपा बनाए रखें। इस अवसर पर "ॐ नमो नारायणाय" अथवा विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ माना गया है।
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इन नियमों का रखें विशेष ध्यान
देवशयनी एकादशी के दिन सात्विकता का विशेष महत्व बताया गया है। व्रत रखने वाले को क्रोध, असत्य, कटु वचन और तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। पूजा में भगवान विष्णु को तुलसी दल अवश्य अर्पित करें, क्योंकि शास्त्रों में तुलसी के बिना विष्णु पूजन को अपूर्ण माना गया है। यथाशक्ति दान, जप और रात्रि जागरण भी पुण्यदायी बताए गए हैं।
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ये सावधानियां भी हैं आवश्यक
शास्त्रों के अनुसार भगवान को शयन कराने की परंपरा श्रद्धा और भाव से की जाती है, इसलिए इसे केवल दिखावे या औपचारिकता न बनाएं। भगवान को अर्पित तुलसी दल खंडित या बासी न हो। पूजा में अपवित्र या फटे वस्त्र धारण करने से बचें। एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है तथा तामसिक पदार्थों से भी दूर रहने की सलाह दी गई है। पूजा के समय मन को शांत रखें और अनावश्यक विवाद या क्रोध से बचें।
शयन का आध्यात्मिक संदेश
पुराणों में वर्णित भगवान विष्णु की योगनिद्रा का अर्थ सामान्य निद्रा नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन और संरक्षण की दिव्य अवस्था है। इसलिए देवशयनी एकादशी पर भगवान को शयन कराते समय भक्त यह प्रार्थना करते हैं कि श्रीहरि की कृपा से उनके जीवन में धर्म, सुख, समृद्धि और मंगल बना रहे। श्रद्धा, शुद्धता और विधिपूर्वक की गई यह पूजा चातुर्मास के चार महीनों को आध्यात्मिक साधना और भगवान की भक्ति के लिए शुभ आरंभ प्रदान करती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।