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Falgun Amavasya 2026: फाल्गुन अमावस्या पर शिव खप्पर पूजा, शिव कृपा से भर जाता है अन्न का भंडार
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 17 Feb 2026 12:40 PM IST
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सार
Falgun Amavasya 2026: महाशिवरात्रि पर भगवान भोलेनाथ की आराधना खप्पर पूजा के बिना अधूरी मानी जाती है। कहा जाता है कि जब सृष्टि में अन्न का अभाव उत्पन्न हुआ और जीव-जगत भूख से व्याकुल होने लगा, तब स्वयं भगवान शिव करुणा से द्रवित होकर जगत-जननी मां अन्नपूर्णा के पास भिक्षा मांगने पहुंचे।
खप्पर पूजा महाशिवरात्रि के बाद अमावस्या को होती है।
- फोटो : Adobe stock
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विस्तार
Falgun Amavasya 2026: खप्पर पूजा महाशिवरात्रि के बाद अमावस्या को होती है। महाशिवरात्रि पर भगवान भोलेनाथ की आराधना खप्पर पूजा के बिना अधूरी मानी जाती है। कहा जाता है कि जब सृष्टि में अन्न का अभाव उत्पन्न हुआ और जीव-जगत भूख से व्याकुल होने लगा, तब स्वयं भगवान शिव करुणा से द्रवित होकर जगत-जननी मां अन्नपूर्णा के पास भिक्षा मांगने पहुंचे। उनके हाथ में खप्पर था। माता अन्नपूर्णा ने उस खप्पर को अन्न से इस प्रकार भर दिया कि वह कभी खाली नहीं हुआ। धार्मिक मान्यता है कि उसी दिव्य खप्पर से आज भी संपूर्ण सृष्टि का पालन-पोषण हो रहा है। यह प्रसंग हमें अन्न के सम्मान, करुणा और पालन की दिव्य भावना का संदेश देता है। इसी शिव-करुणा की छाया ब्रजभूमि की पावन नगरी मथुरा में भी देखने को मिलती है, जहाँ चारों दिशाओं में भगवान शिव स्वयं क्षेत्रपाल रूप में विराजमान हैं।
चारों दिशाओं में विराजमान शिव
मथुरा के कोतवाल मथुरा में भगवान शिव के चार प्राचीन मंदिर चारों दिशाओं में स्थित हैं। पूर्व दिशा में पिपलेश्वर महादेव, पश्चिम में भूतेश्वर महादेव, दक्षिण में रंगेश्वर महादेव और उत्तर में गोकर्णेश्वर महादेव का पावन धाम है। चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण भगवान शिव को मथुरा का ‘कोतवाल’ कहा जाता है। लोकविश्वास है कि ये चारों शिवालय नगर की आध्यात्मिक रक्षा करते हैं और ब्रजभूमि को अदृश्य संकटों से सुरक्षित रखते हैं। यह व्यवस्था केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि आस्था और संरक्षण का प्रतीक भी है।
रंगेश्वर महादेव: खप्पर और जेहर पूजा की परंपरा
दक्षिण दिशा में स्थित रंगेश्वर महादेव मंदिर में खप्पर पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। यहाँ महाशिवरात्रि के अवसर पर ‘जेहर पूजा’ की परंपरा प्रचलित है। नवविवाहिताएँ संतान-सुख, विशेषकर पुत्र-प्राप्ति की कामना से यह पूजा श्रद्धा और विधि-विधान से करती हैं। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, यहाँ सच्चे मन से की गई आराधना दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि और वंश-वृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती है। शिव की यह आराधना ब्रज की लोक-आस्था का अभिन्न अंग है।
गोकर्णेश्वर महादेव: कृष्णकालीन स्मृतियों से जुड़ा धाम
उत्तर दिशा में स्थित गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर को अत्यंत प्राचीन और कृष्णकालीन बताया जाता है। मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान शिव कई बार ब्रजभूमि में पधारे थे। यहाँ विराजमान शिवमूर्ति को साक्षात महाकाल स्वरूप माना जाता है। यह मंदिर एक टीले पर स्थित है, जिसे गोकर्णेश्वर अथवा कैलाश कहा जाता है। लोककथा के अनुसार भगवान शिव का प्राकट्य गाय के कर्ण (कान) से हुआ था, इसलिए उनका नाम गोकर्णेश्वर पड़ा। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो व्यक्ति यहां निरंतर 40 दिनों तक शिव स्तोत्र का पाठ कर गन्ने के रस से अभिषेक करता है, उसके जीवन से रोग-व्याधियाँ दूर रहती हैं और घर में धन-लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
प्राचीन रक्षक स्वरूप पश्चिम दिशा में स्थित भूतेश्वर महादेव मंदिर को मथुरा के चार प्रमुख रक्षक महादेवों में स्थान प्राप्त है। यह मंदिर कृष्ण जन्मभूमि क्षेत्र के दक्षिण भाग में माना जाता है। यहाँ स्थापित शिवलिंग को नाग शासकों द्वारा प्रतिष्ठित बताया जाता है तथा पाताल देवी का विग्रह भी यहाँ पूजित है। पूर्व दिशा में बंगाली घाट के निकट स्थित पिपलेश्वर महादेव का मंदिर भी अत्यंत प्राचीन है। मान्यता है कि यहाँ के महादेव प्रेतबाधा और नकारात्मक शक्तियों पर नियंत्रण रखते हैं। समीप बहती यमुना की पावन धारा इस क्षेत्र की आध्यात्मिक गरिमा को और बढ़ा देती है। इस प्रकार मथुरा की चारों दिशाओं में स्थित ये शिवालय केवल मंदिर नहीं, बल्कि ब्रजभूमि की आध्यात्मिक परिधि हैं। यहाँ विराजमान शिव का क्षेत्रपाल स्वरूप यह संदेश देता है कि धर्म और आस्था की यह ज्योति अनादि काल से आज तक अखंड रूप से प्रज्वलित है।
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चारों दिशाओं में विराजमान शिव
मथुरा के कोतवाल मथुरा में भगवान शिव के चार प्राचीन मंदिर चारों दिशाओं में स्थित हैं। पूर्व दिशा में पिपलेश्वर महादेव, पश्चिम में भूतेश्वर महादेव, दक्षिण में रंगेश्वर महादेव और उत्तर में गोकर्णेश्वर महादेव का पावन धाम है। चारों दिशाओं में स्थित होने के कारण भगवान शिव को मथुरा का ‘कोतवाल’ कहा जाता है। लोकविश्वास है कि ये चारों शिवालय नगर की आध्यात्मिक रक्षा करते हैं और ब्रजभूमि को अदृश्य संकटों से सुरक्षित रखते हैं। यह व्यवस्था केवल धार्मिक परंपरा ही नहीं, बल्कि आस्था और संरक्षण का प्रतीक भी है।
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रंगेश्वर महादेव: खप्पर और जेहर पूजा की परंपरा
दक्षिण दिशा में स्थित रंगेश्वर महादेव मंदिर में खप्पर पूजा का विशेष महत्व बताया जाता है। यहाँ महाशिवरात्रि के अवसर पर ‘जेहर पूजा’ की परंपरा प्रचलित है। नवविवाहिताएँ संतान-सुख, विशेषकर पुत्र-प्राप्ति की कामना से यह पूजा श्रद्धा और विधि-विधान से करती हैं। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार, यहाँ सच्चे मन से की गई आराधना दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि और वंश-वृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती है। शिव की यह आराधना ब्रज की लोक-आस्था का अभिन्न अंग है।
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उत्तर दिशा में स्थित गोकर्णेश्वर महादेव मंदिर को अत्यंत प्राचीन और कृष्णकालीन बताया जाता है। मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान शिव कई बार ब्रजभूमि में पधारे थे। यहाँ विराजमान शिवमूर्ति को साक्षात महाकाल स्वरूप माना जाता है। यह मंदिर एक टीले पर स्थित है, जिसे गोकर्णेश्वर अथवा कैलाश कहा जाता है। लोककथा के अनुसार भगवान शिव का प्राकट्य गाय के कर्ण (कान) से हुआ था, इसलिए उनका नाम गोकर्णेश्वर पड़ा। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो व्यक्ति यहां निरंतर 40 दिनों तक शिव स्तोत्र का पाठ कर गन्ने के रस से अभिषेक करता है, उसके जीवन से रोग-व्याधियाँ दूर रहती हैं और घर में धन-लक्ष्मी का स्थायी वास होता है।
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भूतेश्वर और पिपलेश्वरप्राचीन रक्षक स्वरूप पश्चिम दिशा में स्थित भूतेश्वर महादेव मंदिर को मथुरा के चार प्रमुख रक्षक महादेवों में स्थान प्राप्त है। यह मंदिर कृष्ण जन्मभूमि क्षेत्र के दक्षिण भाग में माना जाता है। यहाँ स्थापित शिवलिंग को नाग शासकों द्वारा प्रतिष्ठित बताया जाता है तथा पाताल देवी का विग्रह भी यहाँ पूजित है। पूर्व दिशा में बंगाली घाट के निकट स्थित पिपलेश्वर महादेव का मंदिर भी अत्यंत प्राचीन है। मान्यता है कि यहाँ के महादेव प्रेतबाधा और नकारात्मक शक्तियों पर नियंत्रण रखते हैं। समीप बहती यमुना की पावन धारा इस क्षेत्र की आध्यात्मिक गरिमा को और बढ़ा देती है। इस प्रकार मथुरा की चारों दिशाओं में स्थित ये शिवालय केवल मंदिर नहीं, बल्कि ब्रजभूमि की आध्यात्मिक परिधि हैं। यहाँ विराजमान शिव का क्षेत्रपाल स्वरूप यह संदेश देता है कि धर्म और आस्था की यह ज्योति अनादि काल से आज तक अखंड रूप से प्रज्वलित है।