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Holashtak: होलाष्टक की पौराणिक कथा, प्रह्लाद की भक्ति और कामदेव दहन का रहस्य

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: विनोद शुक्ला Updated Mon, 23 Feb 2026 12:59 PM IST
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सार

होलाष्टक पर किसी भी तरह का शुभ करना वर्जित होता है। इस वर्ष 24 फरवरी से लेकर 03 मार्च तक होलाष्टक रहेगा, होलिका दहन के साथ ही होलाष्टक खत्म हो जाएगा। आइए जानते हैं होलाष्टक की क्या है कथा। 

Holi 2026 Holashtak Start Date Katha Holika Dahan Ka Importance
होलाष्टक 2026 - फोटो : amar ujala
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विस्तार

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक के आठ दिन होलाष्टक कहलाते हैं। धार्मिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह समय अत्यंत संवेदनशील माना गया है, इसलिए इन दिनों में विवाह, गृह प्रवेश, सगाई, नामकरण जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। इसके पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं भक्त प्रह्लाद की कथा और कामदेव दहन की कथा। इन दोनों प्रसंगों में भक्ति, तप और आत्मसंयम का गहरा संदेश छिपा है। 

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भक्त प्रह्लाद की कथा व अटूट भक्ति की परीक्षा

पुराणों के अनुसार असुरराज हिरण्यकशिपु ने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था। वरदान के प्रभाव से वह स्वयं को अजेय समझने लगा और उसने अपने राज्य में यह आदेश दे दिया कि सभी लोग उसी की पूजा करें। किंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह हर समय “नारायण” का जप करता और ईश्वर भक्ति को ही जीवन का उद्देश्य मानता था।

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पिता द्वारा बार-बार समझाने पर भी जब प्रह्लाद अपनी भक्ति से नहीं डिगा, तो हिरण्यकशिपु ने उसे कठोर दंड देने का निश्चय किया। मान्यता है कि फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से ही उस पर अत्याचार आरंभ हुए। कभी उसे ऊंचे पर्वत से गिराया गया, कभी विषैले सर्पों के बीच डाला गया, तो कभी हाथियों से कुचलवाने का प्रयास किया गया। उसे विष भी दिया गया, किंतु हर बार वह भगवान की कृपा से सुरक्षित बच गया।

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अंत में हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। योजना के अनुसार होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, परंतु वरदान का दुरुपयोग करने के कारण वह स्वयं जलकर भस्म हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच निकला। यह घटना पूर्णिमा की रात्रि को हुई, जिसे आज होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है। इन आठ दिनों को प्रह्लाद की कष्टपूर्ण परीक्षा का प्रतीक मानते हुए शुभ कार्यों से विरत रहने की परंपरा बनी।

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कामदेव दहन की कथा 

होलाष्टक से जुड़ी दूसरी कथा भगवान शिव और कामदेव से संबंधित है। पौराणिक वर्णन के अनुसार माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव गहन समाधि में लीन हो गए थे। उसी समय तारकासुर नामक असुर का अत्याचार बढ़ गया। देवताओं को ज्ञात था कि उसका वध केवल शिव-पुत्र द्वारा ही संभव है, इसलिए उन्होंने शिवजी की तपस्या भंग कराने का उपाय सोचा।

देवताओं के अनुरोध पर कामदेव ने अपने पुष्प बाण से भगवान शिव की समाधि में विघ्न डालने का प्रयास किया। जैसे ही शिवजी की ध्यानावस्था भंग हुई, उन्होंने क्रोध में अपनी तीसरी आंख खोल दी। उस दिव्य ज्वाला में कामदेव भस्म हो गए। उनकी पत्नी रति के विलाप करने पर शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें “अनंग” अर्थात सूक्ष्म रूप में पुनर्जीवन दिया। यह कथा दर्शाती है कि तप, संयम और आत्मनियंत्रण की शक्ति सर्वोपरि है।

होलाष्टक के दिनों को इसी कारण साधना और आत्मचिंतन का समय माना गया है। भोग-विलास और मांगलिक कार्यों से दूर रहकर व्यक्ति को अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण करने की प्रेरणा दी जाती है। इसी प्रकार भक्त प्रह्लाद की अडिग आस्था और कामदेव दहन की घटना, दोनों ही होलाष्टक के आठ दिनों को विशेष बनाती हैं और यह समझाती हैं कि यह समय बाहरी उत्सव से अधिक आंतरिक शुद्धि और भक्ति का है। 

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