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Amalaki Ekadashi 2026: 27 फरवरी को आमलकी एकादशी, जानिए व्रत, पूजन विधि और आंवले का रहस्य
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Wed, 25 Feb 2026 03:36 PM IST
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सार
Amalaki Ekadashi 2026: आमलकी एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। इस व्रत को करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और वह सहस्त्र गोदानों का फल प्राप्त कर लेता है।
Amalaki Ekadashi 2026
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Amalaki Ekadashi 2026: फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी 'आमलकी एकादशी' या 'रंगभरी एकादशी' के नाम से जानी जाती है। जो इस वर्ष 27 फरवरी को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार, एकादशी तिथि 27 फरवरी को रात 12:33 बजे शुरू होकर उसी दिन रात 10:32 बजे तक रहेगी, ऐसे में साल 2026 में यह व्रत 27 फरवरी, शुक्रवार को रखा जाएगा। उदय तिथि के अनुसार इसी दिन व्रत मान्य रहेगा।
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आमलकी एकादशी का महत्व
एकादशी तिथि विष्णुप्रिया तो है ही, इसके अलावा इस एकादशी का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि इस दिन ही भगवान शिव, माता पार्वती से विवाह के उपरांत पहली बार अपनी प्रिय काशी नगरी आए थे। पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने कहा है- कि जो प्राणी स्वर्ग और मोक्ष प्राप्ति की कामना रखते हैं,उनके लिए आमलकी एकादशी का व्रत अत्यंत श्रेष्ठ है। इस व्रत को करने से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है और वह सहस्त्र गोदानों का फल प्राप्त कर लेता है। यह एकादशी समस्त यज्ञों को करने से भी अधिक फल देने वाली है।
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आंवले के पूजन का रहस्य
आमलकी एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष की पूजा का खास विधान है क्योंकि इसी दिन सृष्टि के आरंभ में आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति हुई थी। पद्म पुराण के अनुसार भगवान विष्णु के मुख से चन्द्रमा के समान कांतिमान एक बिंदु पृथ्वी पर गिरा,उसी से आमलकी (आंवला) का महान दिव्य वृक्ष उत्पन्न हुआ,जो सभी वृक्षों का आदिभूत कहलाता है। भगवान विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए इसी समय अपनी नाभि से ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया।
देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष,नाग तथा निर्मल अन्तःकरण वाले महर्षियों को ब्रह्मा जी ने जन्म दिया। सभी देवताओं ने जब इस पवित्र वृक्ष को देखा तो उनको बड़ा विस्मय हुआ,इतने में आकाशवाणी हुई-''महर्षियो! यह सर्वश्रेष्ठ आमलकी का वृक्ष है जो विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
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इसके स्मरण मात्र से गोदान का फल मिलता है,स्पर्श करने से दोगुना और फल भक्षण करने से तिगुना फल प्राप्त होता है। इसके मूल में विष्णु,उसके ऊपर ब्रह्मा,तने में रूद्र,शाखाओं में मुनिगण,टहनियों में देवता,पत्तों में वसु,फूलों में मरुदगण एवं फलों में समस्त प्रजापति वास करते हैं।''अतः यह सब पापों को हरने वाला परम पूज्य वृक्ष है।
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परशुराम जी के स्वरूप में करें विष्णु भगवान की पूजा
एकादशी के दिन साधक को प्रातः व्रत का संकल्प लेकर परशुराम जी की मूर्ति या तस्वीर की पूजा बड़ी ही श्रद्धा से करनी चाहिए।साथ ही आंवले के वृक्ष का पूजन आदि करके 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ' मंत्र का उच्चारण करते हुए वृक्ष की यथाशक्ति परिक्रमा करनी चाहिए।अगर आसपास वृक्ष उपलब्ध नहीं हो तो आंवले का फल भगवान विष्णु को प्रसाद स्वरुप अर्पित करें।तत्पश्चात घी के दीपक या कपूर से श्री हरि कि आरती उतारें,विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें।
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व्रत नहीं रखने वाले क्या करें
जो लोग व्रत नहीं करते है वह भी इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करें और स्वयं भी खाएं।शास्त्रों के अनुसार आमलकी एकादशी के दिन आंवले का सेवन भी पापों का नाश करता है।
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