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Hindi News ›   Spirituality ›   Religion ›   Solah somvar vrat katha in hindi Know importance of 16 somvar vrat labh

Solah Somvar Vrat Katha: सोलह सोमवार व्रत में करें इस कथा का पाठ, पूर्ण होंगे सभी मनोरथ

Mon, 03 Aug 2026 01:59 PM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति मेहरा Updated Mon, 03 Aug 2026 01:59 PM IST
सार

Solah Somvar Vrat Katha: सोलह सोमवार के व्रत की शुरुआत श्रावण, चैत्र, वैशाख, कार्तिक या माघ माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से की जाती है। अविवाहित कन्याओं के लिए इसका विशेष महत्व माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं सोलह सोमवार व्रत की कथा...

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Solah somvar vrat katha in hindi Know importance of 16 somvar vrat labh
सोलह सोमवार व्रत कथा - फोटो : AI

विस्तार

Solah Somvar Vrat Katha: सोलह सोमवार का व्रत कोई भी श्रद्धालु रख सकता है, परंतु अविवाहित कन्याओं के लिए इसका विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से यह व्रत करने पर उन्हें मनचाहा जीवनसाथी मिलता है। इस व्रत की शुरुआत श्रावण, चैत्र, वैशाख, कार्तिक या माघ माह के शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से की जाती है। पूरे 16 सोमवार तक नियमपूर्वक व्रत रखने से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

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सोलह सोमवार व्रत कथा
प्राचीन काल की बात है। एक दिन भगवान शिव और माता पार्वती पृथ्वी लोक का भ्रमण करते हुए अमरावती नामक नगर में पहुंचे। उस नगर के राजा ने भगवान शिव के सम्मान में एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। महादेव को वह स्थान अत्यंत प्रिय लगा, इसलिए वे वहीं कुछ समय के लिए ठहर गए।

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एक दिन माता पार्वती ने हंसी-हंसी में भगवान शिव से कहा, “नाथ, आज हम चौसर खेलें।” दोनों के बीच खेल आरंभ हुआ। उसी समय मंदिर का पुजारी पूजा करने के लिए वहां पहुंचा। माता पार्वती ने पुजारी से मुस्कुराते हुए पूछा, “बताइए, इस खेल में विजय किसकी होगी?” पुजारी ने बिना सोचे-समझे उत्तर दिया, “भगवान शिव की ही जीत होगी।” लेकिन जब खेल समाप्त हुआ, तो विजय माता पार्वती की हुई। पुजारी की गलत भविष्यवाणी से माता पार्वती क्रोधित हो गईं और उन्होंने उसे कोढ़ होने का श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से वह पुजारी तुरंत रोगग्रस्त हो गया।
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कुछ समय पश्चात, स्वर्ग से कुछ अप्सराएं उस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आईं। वहां उन्होंने पुजारी को उस अवस्था में देखा और उसके दुख का कारण पूछा। पुजारी ने अपनी पूरी कथा उन्हें सुना दी। तब अप्सराओं ने उसे सोलह सोमवार व्रत का महत्व बताया और कहा कि यदि वह पूरे नियम और श्रद्धा के साथ यह व्रत करेगा, तो भगवान शिव उसकी सभी पीड़ाएं दूर कर देंगे।

पुजारी ने उनसे इस व्रत की विधि जानने की इच्छा प्रकट की। अप्सराओं ने बताया कि सोमवार के दिन उपवास रखें, दिनभर अन्न-जल का त्याग करें और संध्या के समय पूजा के बाद आधा सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाएं। साथ ही मिट्टी की तीन प्रतिमाएं तैयार करें और चंदन, अक्षत, घी, गुड़, दीपक तथा बेलपत्र से भगवान शिव की आराधना करें। पूजा के पश्चात चूरमा भगवान को अर्पित करें और फिर उसे तीन भागों में बांटें, एक भाग लोगों में वितरित करें, दूसरा भाग गाय को खिलाएं और तीसरा स्वयं ग्रहण कर जल पिएं।

इस विधि को लगातार सोलह सोमवार तक अपनाएं। सत्रहवें सोमवार को विशेष रूप से पांच सेर गेहूं के आटे का चूरमा बनाकर भगवान को भोग लगाएं और फिर उसे सभी में बांट दें। इस प्रकार श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने से भगवान शिव सभी इच्छाएं पूर्ण करते हैं। इतना कहकर अप्सराएं वापस स्वर्ग लोक लौट गईं।

पुजारी ने पूरे विश्वास के साथ इस व्रत को आरंभ किया और नियमपूर्वक पालन किया। धीरे-धीरे उसका रोग समाप्त हो गया और वह पूर्ण रूप से स्वस्थ हो गया। कुछ समय बाद भगवान शिव और माता पार्वती पुनः उसी मंदिर में आए। पुजारी को स्वस्थ देखकर माता पार्वती ने उससे उसके रोगमुक्त होने का कारण पूछा। तब पुजारी ने सोलह सोमवार व्रत की महिमा बताई।

यह सुनकर माता पार्वती ने भी यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से उनका पुत्र कार्तिकेय, जो उनसे रुष्ट था, पुनः आज्ञाकारी हो गया। कार्तिकेय ने जब इसका कारण पूछा, तो माता ने व्रत की पूरी विधि बताई। तब उन्होंने भी इस व्रत का पालन किया, जिससे उन्हें अपना खोया हुआ मित्र वापस मिल गया।

उस मित्र ने भी जब इस चमत्कार का कारण जाना, तो विवाह की इच्छा से उसने सोलह सोमवार का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से वह विदेश पहुंचा, जहां एक राजा की पुत्री का स्वयंवर आयोजित हो रहा था। राजा ने शर्त रखी थी कि जिस व्यक्ति को हथिनी माला पहनाएगी, उसी से राजकुमारी का विवाह होगा। वह ब्राह्मण युवक भी वहां उपस्थित था। आश्चर्य की बात यह हुई कि हथिनी ने उसी के गले में माला डाल दी। इस प्रकार उसका विवाह राजकुमारी से बड़े धूमधाम से हुआ। 

एक बार राजकुमारी ने अपने पति से जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा, “नाथ, ऐसा कौन-सा पुण्य आपने किया था कि अनेक योग्य राजकुमारों के होते हुए भी स्वयंवर में हथिनी ने आपको ही अपना वर चुना?” इस पर ब्राह्मण कुमार ने विनम्रता से उत्तर देते हुए सोलह सोमवार व्रत की महिमा और उसकी पूरी विधि विस्तार से बताई। उनकी बात सुनकर राजकुमारी के मन में भी श्रद्धा जागी और उसने संतान प्राप्ति की इच्छा से इस व्रत को पूरी निष्ठा के साथ करना शुरू किया। व्रत के प्रभाव से उसे एक तेजस्वी, गुणवान पुत्र की प्राप्ति हुई।

जब वह पुत्र बड़ा हुआ, तो उसने अपनी माता से पूछा, “माता जी, मुझे पाने के लिए आपने कौन-सा पुण्य किया था?” तब राजकुमारी ने उसे भगवान शिव के सोलह सोमवार व्रत का महत्व समझाया। यह सुनकर उस युवक ने राज्य प्राप्ति की कामना से इस व्रत को आरंभ किया। उसकी भक्ति और श्रद्धा से प्रसन्न होकर शीघ्र ही राजा के दूत उसके पास पहुंचे और उसे राजकुमारी के लिए योग्य वर घोषित किया गया। समय आने पर उसका विवाह संपन्न हुआ और राजा के निधन के बाद वही ब्राह्मण कुमार राज्य का उत्तराधिकारी बन गया।

राजा बनने के बाद भी वह नियमित रूप से सोलह सोमवार व्रत करता रहा। एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह शिव मंदिर में पूजा की सामग्री लेकर साथ चले, लेकिन रानी ने स्वयं जाने के बजाय अपनी दासियों को भेज दिया। जब राजा ने पूजा पूरी की, तो आकाशवाणी हुई कि वह अपनी पत्नी को राज्य से बाहर निकाल दे, अन्यथा उसका विनाश निश्चित है। भगवान की आज्ञा मानते हुए राजा ने भारी मन से रानी का त्याग कर दिया।

रानी दुखी होकर इधर-उधर भटकने लगी। रास्ते में वह एक वृद्धा के पास पहुंची। उसकी दयनीय अवस्था देखकर वृद्धा ने उसे सूत की पोटली देकर बाजार भेजा, लेकिन रास्ते में तेज आंधी आई और पोटली उड़ गई। इससे नाराज होकर वृद्धा ने उसे वहां से भगा दिया। आगे चलकर वह एक तेली के घर पहुंची, पर वहां भी उसके स्पर्श से बर्तन टूट गए, जिससे उसे वहां से भी निकाल दिया गया।

प्यास से व्याकुल होकर जब वह नदी के पास पहुंची, तो नदी सूख गई। सरोवर पर गई, तो उसके छूते ही जल दूषित हो गया, फिर भी उसने वही पानी पी लिया। जिस वृक्ष के नीचे वह विश्राम करने जाती, वह सूख जाता। उसकी इस स्थिति को देखकर कुछ ग्वाले उसे एक संत के आश्रम में ले गए।

संत ने उसकी पूरी कथा सुनकर समझ लिया कि यह किसी गंभीर दोष का परिणाम है। उन्होंने उसे स्नेहपूर्वक आश्रय दिया और पूछा, “बेटी, तुमसे ऐसा कौन-सा अपराध हुआ है?” रानी ने बताया कि उसने अपने पति की आज्ञा का उल्लंघन किया और भगवान शिव की पूजा में जाने से इंकार कर दिया था।

तब संत ने उसे सोलह सोमवार व्रत करने की सलाह दी। रानी ने पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ व्रत पूरा किया। व्रत के प्रभाव से राजा को अपनी पत्नी की याद आई और उसने उसे खोजने के लिए दूत भेजे। दूतों ने आश्रम में रानी को खोज लिया और राजा को सूचना दी। राजा स्वयं वहां पहुंचा और संत से विनती कर रानी को अपने साथ ले जाने की अनुमति मांगी।

संत की आज्ञा से राजा और रानी वापस अपने राज्य लौट आए। नगरवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया। इसके बाद दोनों ने मिलकर प्रत्येक वर्ष सोलह सोमवार व्रत का पालन किया और सुख-शांति से जीवन बिताया। अंत समय में उन्हें शिवलोक की प्राप्ति हुई। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चे मन से किए गए व्रत और भक्ति से भगवान शिव सभी कष्टों को दूर कर भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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