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Varuthini Ekadashi 2026: वरूथनी एकादशी कल, जानिए इसका महत्व, पूजाविधि पुण्यफल और कथा

धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: Vinod Shukla Updated Sun, 12 Apr 2026 02:15 PM IST
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सार

वरुथिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। मान्यता है कि जितना पुण्य कन्यादान और वर्षों तक तप करने पर मिलता है, उतना ही पुण्य वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से मिलता है।

Varuthini Ekadashi 2026 Date Vrat Significance Katha and Benefits Full Details in Hindi
Varuthini Ekadashi 2026: वैशाख माह में कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहते हैं - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

Varuthini Ekadashi 2026: हिन्दू पंचांग के अनुसार हर माह में दो बार एकादशी तिथि पड़ती है, एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। इस प्रकार पूरे साल में 24 एकादशी तिथि पड़ती हैं। वैशाख माह में कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को वरुथिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस साल 13 अप्रैल, सोमवार को वरुथिनी एकादशी पड़ रही है। एकादशी तिथि 13 अप्रैल 2026 को सुबह 1 बजकर 16 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 14 अप्रैल को सुबह 1 बजकर 08 मिनट पर समाप्त होगी। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत अधिक महत्व होता है। एकादशी तिथि भगवान विष्णु को बहुत प्रिय होती है। इस दिन विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की जाती है।

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एकादशी का महत्व
एकादशी स्वयं विष्णुप्रिया है इसलिए इस दिन व्रत, जप-तप, दान-पुण्य करने से प्राणी श्री हरि का सानिध्य प्राप्त कर जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार एकादशी में ब्रह्महत्या सहित समस्त पापों का शमन करने की शक्ति होती है, इस दिन मन, कर्म, वचन द्वारा किसी भी प्रकार का पाप कर्म करने से बचने का प्रयास करना चाहिए, साथ ही तामसिक आहार के सेवन से भी दूर रहना चाहिए। पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्म इन्द्रियां और एक मन इन ग्यारहों को जो साध ले, वह प्राणी एकादशी के समान पवित्र और दिव्य हो जाता है।
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वरुथिनी एकादशी व्रत का महत्व
वरुथिनी एकादशी पर भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। मान्यता है कि जितना पुण्य कन्यादान और वर्षों तक तप करने पर मिलता है, उतना ही पुण्य वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से मिलता है। यह सौभाग्य देने वाली, सब पापों को नष्ट करने वाली तथा अंत में मोक्ष देने वाली है। यह एकादशी दरिद्रता का नाश करने वाली और कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली भी मानी गई है। इस दिन व्रत करने से घर में सुख-समृद्धि और सौभाग्य आता है।

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व्रत का फल और पुण्य
वरुथिनी एकादशी का फल दस हजार वर्ष तक तप करने के बराबर होता है। कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय एक मन स्वर्णदान करने से जो फल प्राप्त होता है वही फल वरुथिनी एकादशी के व्रत करने से मिलता है। वरुथिनी एकादशी के व्रत से अन्नदान तथा कन्यादान दोनों के बराबर फल मिलता है।

वामन अवतार की पूजा विधि
विष्णु भगवान के वामन अवतार की करें पूजा- इस दिन पीताम्बरधारी भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें और साथ ही यथाशक्ति श्री विष्णु के मंत्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' का जाप करते रहना चाहिए। रोली, मोली, पीले चन्दन, अक्षत, पीले पुष्प, ऋतुफल, मिष्ठान आदि अर्पित कर धूप-दीप से श्री हरि की आरती उतारकर दीप दान करना चाहिए। इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना बहुत फलदायी है। भक्तों को परनिंदा, छल-कपट, लालच, द्वेष की भावनाओं से दूर रहकर, श्री नारायण को ध्यान में रखते हुए भक्तिभाव से उनका भजन करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाने के बाद स्वयं भोजन करें।

वरुथिनी एकादशी की कथा
क्या है कथा- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान शिव ने क्रोधित होकर ब्रह्मा जी का पांचवां सिर काट दिया, तो उन्हें श्राप लग गया था। इस श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव ने वरुथिनी एकादशी का व्रत किया था। वरुथिनी एकादशी का व्रत करने से भगवान शिव श्राप और पाप दोनों से मुक्त हो गए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस एक दिन व्रत रखने का फल कई वर्षों की तपस्या के समान है।

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