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स्मृति विशेष: भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दौर के महानायक थे बलबीर सिंह, तीन ओलंपिक गोल्ड में निभाई ऐतिहासिक भूमिका
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: मयंक त्रिपाठी
Updated Mon, 25 May 2026 12:28 AM IST
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सार
बलबीर सिंह सीनियर भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दौर के सबसे महान खिलाड़ियों में शामिल थे, जिन्होंने लगातार तीन ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाई। 1952 हेलसिंकी ओलंपिक फाइनल में पांच गोल करने का उनका रिकॉर्ड आज भी पुरुष हॉकी ओलंपिक फाइनल में कायम है।
बलवीर सिंह
- फोटो : IANS
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विस्तार
भारतीय हॉकी के इतिहास में बलबीर सिंह का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। वह उस दौर के सबसे बड़े सितारों में शामिल रहे, जिसे भारतीय हॉकी का स्वर्णिम युग कहा जाता है। लगातार तीन ओलंपिक खेलों में भारतीय टीम को स्वर्ण पदक दिलाने में उनका योगदान बेहद अहम रहा।
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शुरुआती जीवन और हॉकी करियर की शुरुआत
बलबीर सिंह का जन्म 10 अक्तूबर 1924 को पंजाब के हरिपुर गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें हॉकी का शौक था और उन्होंने महज पांच साल की उम्र में खेलना शुरू कर दिया था। शुरुआत में वह गोलकीपर के रूप में खेले, फिर डिफेंस में अपनी भूमिका निभाई। बाद में जब उन्हें स्ट्राइकर के तौर पर खेलने का मौका मिला तो उनके खेल में नया निखार आया और वह तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगे।
बलबीर सिंह का जन्म 10 अक्तूबर 1924 को पंजाब के हरिपुर गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें हॉकी का शौक था और उन्होंने महज पांच साल की उम्र में खेलना शुरू कर दिया था। शुरुआत में वह गोलकीपर के रूप में खेले, फिर डिफेंस में अपनी भूमिका निभाई। बाद में जब उन्हें स्ट्राइकर के तौर पर खेलने का मौका मिला तो उनके खेल में नया निखार आया और वह तेजी से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगे।
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पंजाब को दिलाई बड़ी सफलता
बलबीर सिंह ने 1946 और 1947 में लगातार दो बार पंजाब को राष्ट्रीय हॉकी खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई। खास बात यह रही कि 1946 से पहले पंजाब को 14 वर्षों तक इस खिताब का इंतजार था। घरेलू स्तर पर शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्हें भारतीय टीम में जगह मिली।
बलबीर सिंह ने 1946 और 1947 में लगातार दो बार पंजाब को राष्ट्रीय हॉकी खिताब दिलाने में अहम भूमिका निभाई। खास बात यह रही कि 1946 से पहले पंजाब को 14 वर्षों तक इस खिताब का इंतजार था। घरेलू स्तर पर शानदार प्रदर्शन के दम पर उन्हें भारतीय टीम में जगह मिली।
ओलंपिक में बनाया स्वर्णिम इतिहास
भारतीय हॉकी के महान सेंटर-फॉरवर्ड माने जाने वाले बलबीर सिंह ने 1948 के लंदन ओलंपिक 1948, 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक 1952 और 1956 के मेलबर्न ओलंपिक 1956 में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने 1948 ओलंपिक में कुल आठ गोल किए, जबकि 1952 हेलसिंकी ओलंपिक में नौ गोल दागे। लंदन ओलंपिक फाइनल में उनके दो गोल भारत की जीत में निर्णायक साबित हुए।
भारतीय हॉकी के महान सेंटर-फॉरवर्ड माने जाने वाले बलबीर सिंह ने 1948 के लंदन ओलंपिक 1948, 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक 1952 और 1956 के मेलबर्न ओलंपिक 1956 में भारत को स्वर्ण पदक दिलाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने 1948 ओलंपिक में कुल आठ गोल किए, जबकि 1952 हेलसिंकी ओलंपिक में नौ गोल दागे। लंदन ओलंपिक फाइनल में उनके दो गोल भारत की जीत में निर्णायक साबित हुए।
हेलसिंकी ओलंपिक के फाइनल में नीदरलैंड के खिलाफ बलबीर सिंह ने अकेले पांच गोल किए थे। भारत ने यह मुकाबला 6-1 से जीता था। ओलंपिक पुरुष हॉकी फाइनल में किसी एक खिलाड़ी द्वारा किए गए सबसे ज्यादा गोल का यह रिकॉर्ड आज भी कायम है। वहीं, सेमीफाइनल में ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ उन्होंने शानदार हैट्रिक भी लगाई थी। 1956 मेलबर्न ओलंपिक में भारत ने पाकिस्तान को हराकर लगातार तीसरा गोल्ड मेडल जीता। उस मुकाबले में बलबीर सिंह चोटिल हाथ के बावजूद मैदान में उतरे थे।
एशियन गेम्स में भी दिखाया दम
बलबीर सिंह सीनियर 1958 एशियन गेम्स में रजत पदक जीतने वाली भारतीय टीम का भी हिस्सा रहे।
बलबीर सिंह सीनियर 1958 एशियन गेम्स में रजत पदक जीतने वाली भारतीय टीम का भी हिस्सा रहे।
संन्यास के बाद भी हॉकी से जुड़े रहे
1960 में हॉकी से संन्यास लेने के बाद भी उन्होंने भारतीय हॉकी की सेवा जारी रखी। वह टीम के साथ कोच, मैनेजर और चयनकर्ता के रूप में जुड़े रहे और युवा खिलाड़ियों का मार्गदर्शन किया।
पद्मश्री से हुए सम्मानित
भारतीय खेलों में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1957 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। उनके जीवन और भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दौर पर आधारित गोल्ड फिल्म भी बनी, जिसमें अक्षय कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
2020 में हुआ निधन
भारतीय हॉकी के इस महान खिलाड़ी का 25 मई 2020 को निधन हो गया। हालांकि, खेल जगत में उनका योगदान और उपलब्धियां आज भी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।
1960 में हॉकी से संन्यास लेने के बाद भी उन्होंने भारतीय हॉकी की सेवा जारी रखी। वह टीम के साथ कोच, मैनेजर और चयनकर्ता के रूप में जुड़े रहे और युवा खिलाड़ियों का मार्गदर्शन किया।
पद्मश्री से हुए सम्मानित
भारतीय खेलों में उनके अमूल्य योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1957 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। उनके जीवन और भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दौर पर आधारित गोल्ड फिल्म भी बनी, जिसमें अक्षय कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई थी।
2020 में हुआ निधन
भारतीय हॉकी के इस महान खिलाड़ी का 25 मई 2020 को निधन हो गया। हालांकि, खेल जगत में उनका योगदान और उपलब्धियां आज भी खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा बनी हुई हैं।