Artemis II: इंसान अंतरिक्ष में बनाएगा सबसे दूर जाने का नया रिकॉर्ड, जानें इस एतिहासिक मिशन की पांच खास बातें
NASA Artemis II Mission: क्या आप जानते हैं कि करीब 5 दशकों बाद इंसान अंतरिक्ष में अब तक की सबसे लंबी छलांग लगाने जा रहा है? नासा का एतिहासिक 'आर्टेमिस-2' मिशन सिर्फ चांद के करीब जाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह अपोलो 13 का पुराना रिकॉर्ड तोड़कर गहरे अंतरिक्ष में एक नया इतिहास रचने की तैयारी है। इस लेख में जानिए कि कैसे यह स्पेसक्राफ्ट बिना इंजन चालू किए चांद की ग्रेविटी से वापस धरती पर लौटेगा, सूरज की सतह जैसी भयंकर गर्मी सहेगा और कैसे चांद का यह पूरा सफर भविष्य में इंसानों को मंगल ग्रह पर भेजने की सबसे बड़ी और अहम रिहर्सल साबित होने वाला है।
विस्तार
पिछले 53 वर्षों में, इंसानों ने अंतरिक्ष में जितनी भी उड़ानें भरी हैं, वो पृथ्वी के काफी करीब ही रही हैं। लेकिन 6 अप्रैल को यह इतिहास बदल गया, जब नासा के 'आर्टेमिस-2' मिशन के चार अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में पहुंच गए। यह सिर्फ एक मिशन नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष विज्ञान में एक बहुत बड़ी छलांग है। आइए समझते हैं कि यह मिशन क्यों खास है और यह कौन-कौन से रिकॉर्ड तोड़ने वाला है।
1. टूटेगा 50 साल पुराना अपोलो 13 का रिकॉर्ड
ये चार एस्ट्रोनॉट्स पृथ्वी से 4,06,773 किलोमीटर दूर जाकर इंसान के जरिए अंतरिक्ष में सबसे दूर जाने का नया रिकॉर्ड बनाने वाले हैं। यह दूरी 1970 में 'अपोलो 13' मिशन के जरिए बनाए गए रिकॉर्ड यानी 4,00,171 किलोमीटर से करीब 2,500 किलोमीटर ज्यादा है।
2. कब होगा चांद का 'लूनर फ्लाईबाय'?
आर्टेमिस-2 के एस्ट्रोनॉट्स 7 अप्रैल 2026 को भारतीय समयानुसार रात 12:15 बजे चांद के बेहद करीब से गुजरना यानी अपना 'लूनर फ्लाईबाय' शुरू करेंगे। इस सफर की विशालता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जहां हमारा इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) धरती से सिर्फ 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर रहकर चक्कर लगाता है, वहीं चांद हमसे लगभग 3,84,633 किलोमीटर दूर है। इस एतिहासिक उड़ान में अंतरिक्ष यात्रियों की यह टीम न सिर्फ वहां तक पहुंचेगी, बल्कि चांद के उस अंधेरे हिस्से का भी चक्कर लगाएगी जो हमें धरती से कभी दिखाई नहीं देता। इतना ही नहीं, स्पेसक्राफ्ट चांद के भी पार उस गहरे अंतरिक्ष में जाएगा, जहां अपोलो युग के बाद से पिछले पांच दशकों में कोई भी इंसान नहीं पहुंचा है।
3. स्पेशक्राफ्ट का इंजन फेल होने के बावजूद सुरक्षित लौटेंगे अंतरिक्ष यात्री
आर्टेमिस-2 अंतरिक्ष में जिस खास रास्ते पर सफर कर रहा है, उसे विज्ञान की भाषा में 'फ्री-रिटर्न ट्रैजेक्टरी' कहा जाता है। इसका सीधा सा मतलब यह है कि स्पेसक्राफ्ट वापस धरती पर लौटने के लिए चांद के गुरुत्वाकर्षण का बेहतरीन इस्तेमाल करेगा। इसके लिए उसे अपना कोई इंजन चालू करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि चांद खुद इसे एक गुलेल की तरह वापस धरती की दिशा में धकेल देगा। यह तकनीक मिशन के लिए सुरक्षा का एक मास्टरस्ट्रोक है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि अगर किसी तकनीकी खराबी के चलते ओरियन स्पेसक्राफ्ट का मुख्य इंजन बीच रास्ते में फेल भी हो जाए, तब भी इस फ्री-रिटर्न मार्ग की बदौलत अंतरिक्ष यात्री पूरी तरह सुरक्षित धरती पर वापस लौट आएंगे।
4. डीप स्पेस का खतरा और रेडिएशन का टेस्ट
धरती से लगभग 2 हजार किलोमीटर ऊपर जाने के बाद पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की सुरक्षा खत्म हो जाती है। यह फील्ड हमें सूरज और गहरे अंतरिक्ष के खतरनाक रेडिएशन से बचाती है। आर्टेमिस-2 के एस्ट्रोनॉट्स को खतरनाक कॉस्मिक रेडिएशन का सामना करना पड़ेगा। इस मिशन का एक बड़ा मकसद यही है कि इस खतरनाक माहौल में इंसानी शरीर और स्पेसक्राफ्ट कैसे रिएक्ट करते हैं, इसकी गहराई से स्टडी की जाए।
5. वापसी में बनेगा रफ्तार का नया रिकॉर्ड
मिशन के अंत में जब ओरियन स्पेसक्राफ्ट अपना सफर पूरा करके धरती के वायुमंडल में वापस एंट्री करेगा तो उसकी स्पीड भी एक नया इतिहास रचेगी। यह स्पेसक्राफ्ट लगभग 40,200 किलोमीटर प्रति घंटा की बेतहाशा रफ्तार से धरती की तरफ लौटेगा और आपको बता दें कि आज तक कोई भी इंसानी स्पेसक्राफ्ट इतनी तेज गति से वापस नहीं आया है। इस जबरदस्त स्पीड की वजह से वायुमंडल में भारी घर्षण पैदा होगा। इसके चलते स्पेसक्राफ्ट की हीट शील्ड (गर्मी से बचाने वाली सुरक्षित परत) को लगभग 2,760°C तक का भयानक तापमान सहना होगा। इस भयानक गर्मी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह सूरज की सतह के तापमान का लगभग आधा है।
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