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एआई की दोहरी मार: पहले काम और अब निवेश के दांव पर कर्मचारी, आखिर कौन खा रहा लोगों की नौकरी?

Tue, 27 Oct 2026 01:49 PM IST
कुलदीप शर्मा टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुलदीप शर्मा Updated Tue, 27 Oct 2026 01:49 PM IST
सार

Microsoft के 60,000 कर्मचारियों को स्वएच्छिक बाय-आउट का ऑफर देने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। क्या AI सिर्फ काम बदल रहा है, या अब निवेश की कीमत भी नौकरियों से वसूली जा रही है? आखिर किसकी नौकरी सबसे पहले खतरे में? आइए जानते हैं।

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Microsoft Voluntary Buyout for 60 thousand Employees Is AI Taking Jobs or Eating Budgets AI job impact
प्रतीकात्म इमेज - फोटो : Amar Ujala Digital

विस्तार

Microsoft ने अपने लगभग 60000 कर्मचारियों को स्वैच्छिक बाय-आउट का ऑफर दिया है। खास बात ये है कि यह नंबर उसके वैश्विक वर्कफोर्स का करीब 27% है। कंपनी की चीफ पीपल ऑफिसर ने इसे बदलाव के प्रति कंपनी के नजरिए का हिस्सा बताया है जिसमें कर्मचारियों को ज्यादा फ्लैक्सीबिलिटी मिलती है। हांलाकि विश्लेषक इसे AI खर्च के बीच लेबर कॉस्ट घटाने की कोशिश की तरह देख रहे हैं।

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वो इसलिए भी कि कंपनी इस समय AI पर भारी खर्च कर रही है। हालांकि एआई का नौकरियों पर असर की ये खबर अकेली नहीं है। इस साल कई बड़ी कंपनियों में नौकरियों और AI के बीच सीधा संबंध दिखा है। यह असर पूरे विश्व में दो तरह से दिख रहा है. इसमें पहला काम के स्तर पर और दूसरा निवेश के स्तर पर। इसका मतलब ये है कि डायरेक्ट और इनडायरेक्ट दोनों ही तरह से एआई लगातार नौकरियों को प्रभावित कर रहा है।

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पहले स्तर पर कौन से कर्मचारी हो रहे प्रभावित?

पहला रास्ता सरल है और इसका असर साफ नजर भी आता है क्योंकि ये सीधा लोगों की नौकरियों पर असर डाल रहा है। पहले स्तर पर जो काम AI कर सकता है, उसके लिए लोगों की ह्यूमन वर्कफोर्स की कम जरूरत होती है यानी एक व्यक्ति कई लोगों का काम कर सकता है इसलिए लोग कम चाहिए। इसका सबसे साफ उदाहरण कस्टमर सपोर्ट का है। सेल्सफोर्स ने सपोर्ट की करीब 4000 नौकरियां घटाईं, जिससे वह टीम लगभग 9000 से 5000 रह गई और सीईओ मार्क बेनिऑफ ने कहा कि AI एजेंट काम संभाल रहे हैं। रिपोर्टस के मुताबिक कंपनी का कहना है कि AI एजेंट अब लगभग आधी कस्टमर बातचीत संभालते हैं।

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Amazon ने भी इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल किया था। उसकी एक वरिष्ठ अधिकारी ने AI की प्रगति को कम लोगों के साथ काम करने की एक वजह बताया था। क्लाउड कंपनी Rackspace ने जून में लगभग 750 कर्मचारी यानी कंपनी साइज के करीब 15% लोग घटा दिए थे और इसकी वजह AI की ओर बढ़ता फोकस बताया गया। यानी दोहराए जाने वाले, नियमित और लिखित-निर्देश वाले काम सबसे पहले प्रभावित हुए क्योंकि ये काम एआई को आसानी से सिखाए गए और इसका असर सीधा उन लोगों पर पड़ा जो अब तक ये काम कर रहे थे।

दूसरे स्तर पर सभी तरह के कर्मचारियों पर हो रहा असर

दूसरे स्तर पर एआई का असर डबल हो जाता है और ये सीधा एआई का असर दिखता भी नहीं है। इस स्तर पर नौकरियां इसलिए नहीं जाती कि AI उसका काम कर रहा है, बल्कि इसलिए कि कंपनी AI में पैसा झोंकने के लिए दूसरी जगह खर्च घटा रही है। इसका पैमाना बड़ा है। एक रिपोर्ट्स के मुताबिक Alphabet, Microsoft, Meta और Amazon इस साल मिलकर AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 700 अरब डॉलर खर्च करने वाली हैं। Microsoft के सीएफओ ने जुलाई में बताया था कि कंपनी अकेले 2026 में AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 175 अरब डॉलर खर्च करेगी।


इसी बीच कटौतियां की भी गईं। Meta ने मई में लगभग 8000 कर्मचारी यानी करीब 10% वर्कफोर्स कम कर दी थी और एक ट्रैकर के मुताबिक इसका मकसद AI खर्च के लिए जगह बनाना था। दिलचस्प बात यह है कि उसी दौरान Meta ने लगभग 7000 कर्मचारियों को नई AI भूमिकाओं में भेजा भी। यानी लोग हटे भी और दूसरी जगह भेजे भी गए। हालांकि Microsoft की चीफ पीपल ऑफिसर ने इसे बदलाव के प्रति कंपनी के नजरिए का हिस्सा बताया है जिसमें कर्मचारियों को ज्यादा फ्लैक्सीबिलिटी मिलती है। लेकिन विश्लेषक इसे AI खर्च के बीच लेबर कॉस्ट घटाने की कोशिश की तरह देख रहे हैं। इस दूसरे स्तर पर सबसे चिंता की बात यह है कि इसमें ऐसी नौकरियां भी प्रभावित हो सकती हैं जिनका काम AI कर ही नहीं रहा।

अप्रत्यक्ष रूप से कैसे हो रहा असर?

  1. भर्ती का धीमा पड़ना: जनवरी में द रजिस्टर ने लिखा कि भारत की चार बड़ी आउटसोर्सिंग कंपनियों ने पूरे साल में सिर्फ़ 3910 कर्मचारी जोड़े, जो उनके हिसाब से असामान्य रूप से धीमा है। जो नौकरी बनी ही नहीं, वह किसी छंटनी की सूची में नहीं दिखती।
  2. ग्राहकों का काम बदलना: एक रिपोर्ट के मुताबिक विश्लेषक बताते हैं कि अमेरिकी क्लाइंट कंपनियां या तो काम वापस अपने यहां ले जा रही हैं या उसे सीधे AI टूल्स से करा रही हैं, जिससे भारतीय आईटी कंपनियों के कुछ कॉन्ट्रैक्ट रद्द हो रहे हैं।
  3. बाजार का दबाव: जून में AI की आशंकाओं के बीच TCS और Infosys के शेयर गिरे और Nifty IT एक सत्र में करीब 5% टूटा। जब निवेशक डरते हैं, तो कंपनियों पर खर्च घटाने का दबाव बढ़ता है।
  4. भूमिकाओं का रूप बदलना: एक विश्लेषक के मुताबिक AI नौकरियों को पूरी तरह खत्म करने से ज्यादा भूमिकाओं को नया रूप दे रहा है और कुछ पदों पर भर्ती धीमी कर रहा है।

जहां मांग बढ़ी वहां क्या हुआ?

हालांकि तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। IBM के मुताबिक वह कटौती के साथ-साथ AI और हाइब्रिड-क्लाउड भूमिकाओं के लिए एंट्री-लेवल भर्ती तीन गुनी कर रही है। Infosys एडवांस्ड AI स्किल वाले इंजीनियरों को 21 लाख रुपये तक का सालाना पैकेज दे रही है, जो उसके मानक फ्रेशर पैकेज से कई गुना है। GCC यानी ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर भारत में नई भूमिकाएं जोड़ रहे हैं। मतलब मांग उन लोगों की बढ़ रही है जो AI के साथ काम करना जानते हैं।

भारत पर इसका कितना असर?

भारत का आईटी सेक्टर लगभग 58 लाख लोगों को रोजगार देता है। TCS ने 2026 के वित्त वर्ष में करीब 12200 नौकरियां घटाने की घोषणा की थी, जो ज्यादातर मध्यम और वरिष्ठ स्तर पर थीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक पांच बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों का कुल हेडकाउंट FY26 में 7000 से ज्यादा घटा है। साथ ही TCS, Infosys और Cognizant ने इस वित्त वर्ष में लगभग 80 हजार फ्रेशर लेने की योजना भी बताई है। यानी कटौती और भर्ती, दोनों साथ चल रही हैं, पर अलग-अलग स्तरों पर।

भारत पर कुल असर के आंकड़े अलग-अलग हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 25000 से 35000 नौकरियां प्रभावित हुईं, जबकि दूसरे विश्लेषण में इस साल की वैश्विक टेक छंटनियों में भारत का हिस्सा सिर्फ करीब 3170 बताया गया है। इस फर्क की वजह यह हो सकती है कि गिनती का तरीका अलग है, इसलिए एक आंकड़े को पक्का मानकर नहीं चला जा सकता।

क्या खतरा सच में बढ़ रहा है?

संकेत तो ऐसा ही कहते हैं लेकिन सावधानी के साथ। मार्च और अप्रैल में ही 36831 छंटनियां सीधे AI से जोड़ी गईं। जुलाई तक टेक कंपनियां इस साल लगभग 1.4 लाख नौकरियां घटा चुकी थीं। और अब Microsoft जैसी कंपनी 60 हजार लोगों को स्वच्छिक बाय-आउट का ऑफर दे रही है।

पर ये तीन बातें याद रखनी चाहिए

  1. कारण बताना और असली वजह होना: अलग कंपनियां AI का नाम इसलिए भी ले सकती हैं कि वह निवेशकों को पसंद आता है।
  2. ऑफर का मतलब छंटनी नहीं: पात्र कर्मचारियों को दिसंबर में तय करना है कि वे ऑफर लेंगे या नहीं, इसलिए असली संख्या अभी पता नहीं।
  3. ट्रैकर के आंकड़े अलग-अलग हैं और कई कटौतियों में AI के अलावा दूसरी वजहें भी होती हैं।

क्या है आगे का रास्ता?

AI का असर अब दो परतों में दिख रहा है। पहली परत में वह कुछ कामों में इंसान की जगह ले रहा है और दूसरी में उसके लिए जुटाई जा रही पूंजी दूसरी जगहों की नौकरियों पर दबाव डाल रही है। अगले कुछ महीनों में देखने की बात यह होगी कि Microsoft के ऑफर को कितने लोग लेते हैं, बड़ी कंपनियों का AI खर्च और छंटनी साथ-साथ कैसे चलते हैं और भारत में फ्रेशर भर्ती किस दिशा में जाती है।

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