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रोबोट गेम्स: रेस में तोड़े रिकॉर्ड, घरेलू कामों में फिसड्डी, असल जिंदगी में ह्यूमनॉइड रोबोट क्यों पीछे?
Mon, 31 Aug 2026 11:07 AM IST
नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Mon, 31 Aug 2026 11:07 AM IST
सार
बीजिंग के वर्ल्ड ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स में रोबोट्स ने दौड़ और छलांग में रिकॉर्ड बनाए, लेकिन कई छोटे घरेलू काम करने में वे नाकाम रहे। यह साबित करता है कि असल जिंदगी में इंसानों के लिए उपयोगी बनने के लिए इन्हें अभी लंबा सफर तय करना है।
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बीजिंग में हुआ था वर्ल्ड ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स का आयोजन
- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक तकनीक ने मशीनों को पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर बना दिया है। चीन की राजधानी बीजिंग में हाल ही में संपन्न हुए दूसरे वर्ल्ड ह्यूमनॉइड रोबोट गेम्स इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। इस भव्य आयोजन में हिस्सा लेने वाले रोबोट्स ने सौ मीटर की दौड़ और ऊंची कूद जैसी एथलेटिक प्रतियोगिताओं में ऐसे शानदार रिकॉर्ड कायम किए, जिन्हें देखकर दुनिया हैरान रह गई। इन मशीनों ने अपनी शारीरिक क्षमता के मामले में अद्भुत विकास का प्रदर्शन किया। हालांकि, रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों को करने की जब बात आई तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखी।
घरेलू कामों में फेल हुए रोबोट्स
खेल के मैदान पर भले ही इन मशीनों ने अपना दबदबा दिखाया हो, लेकिन जब बात आम जीवन से जुड़े कामों की आई तो इनकी कमजोरियां सबके सामने आ गईं। इन्हीं धाकड़ मशीनों को जब किताबें व्यवस्थित करने, बिस्तर लगाने या एक छोटी सी कील ठोकने जैसी रोजमर्रा की चुनौतियां दी गईं, तो वे बुरी तरह संघर्ष करते नजर आए। इन छोटी-छोटी बातों ने साबित कर दिया कि मशीनी दुनिया अभी भी इंसानी व्यवहारिकता से काफी पीछे है।
असल दुनिया और प्रयोगशाला के बीच का फासला
नेचर पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रतियोगिता में छह सौ से अधिक टीमों ने भाग लिया था, जिनमें ज्यादातर चीन के विश्वविद्यालयों और प्रमुख तकनीकी कंपनियों के विशेषज्ञ शामिल थे। इस बार आयोजकों ने सिर्फ दौड़-भाग तक सीमित रहने के बजाय आम जीवन के कार्यों को भी चुनौती के रूप में रखा था। रोबोट्स का यह विरोधाभासी प्रदर्शन साफ बताता है कि उन्हें प्रयोगशाला और खेल के मैदान से निकालकर इंसानी जीवन का हिस्सा बनाने के लिए वैज्ञानिकों को अभी बहुत काम करना होगा।
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घरेलू कामों में फेल हुए रोबोट्स
खेल के मैदान पर भले ही इन मशीनों ने अपना दबदबा दिखाया हो, लेकिन जब बात आम जीवन से जुड़े कामों की आई तो इनकी कमजोरियां सबके सामने आ गईं। इन्हीं धाकड़ मशीनों को जब किताबें व्यवस्थित करने, बिस्तर लगाने या एक छोटी सी कील ठोकने जैसी रोजमर्रा की चुनौतियां दी गईं, तो वे बुरी तरह संघर्ष करते नजर आए। इन छोटी-छोटी बातों ने साबित कर दिया कि मशीनी दुनिया अभी भी इंसानी व्यवहारिकता से काफी पीछे है।
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असल दुनिया और प्रयोगशाला के बीच का फासला
नेचर पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रतियोगिता में छह सौ से अधिक टीमों ने भाग लिया था, जिनमें ज्यादातर चीन के विश्वविद्यालयों और प्रमुख तकनीकी कंपनियों के विशेषज्ञ शामिल थे। इस बार आयोजकों ने सिर्फ दौड़-भाग तक सीमित रहने के बजाय आम जीवन के कार्यों को भी चुनौती के रूप में रखा था। रोबोट्स का यह विरोधाभासी प्रदर्शन साफ बताता है कि उन्हें प्रयोगशाला और खेल के मैदान से निकालकर इंसानी जीवन का हिस्सा बनाने के लिए वैज्ञानिकों को अभी बहुत काम करना होगा।
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