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राज्यसभा का बदलता भूगोल: मोदी सरकार के 'विधायी विजय' का नया अध्याय

Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 19 Feb 2026 04:06 PM IST
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सार

भूमि अधिग्रहण बिल से लेकर शुरूआती दौर के श्रम सुधारों तक, राज्यसभा विपक्ष के लिए एक अभेद्य 'चेक पोस्ट' की तरह रही।

The changing geography of the Rajya Sabha A new chapter in the Modi government legislative victory
पीएम मोदी - फोटो : PTI
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विस्तार

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद के दोनों सदनों की अपनी विशिष्ट भूमिका और गरिमा है। लोकसभा जहाँ जनता की सीधी आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं राज्यसभा को राज्यों की परिषद के रूप में एक 'निरीक्षक सदन' माना जाता है।

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पिछले एक दशक के राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर डालें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को लोकसभा में तो बहुमत मिला, लेकिन राज्यसभा में संख्या बल की कमी अक्सर उसके बड़े सुधारों की राह में रोड़ा बनती रही। ऊपरी सदन में विपक्ष ने एकजुट होकर सरकार के कई महत्वपूर्ण विधेयकों को न केवल धीमा किया, बल्कि कई बार उन्हें स्थायी समितियों या ठंडे बस्ते में भेजने पर मजबूर कर दिया।
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भूमि अधिग्रहण बिल से लेकर शुरूआती दौर के श्रम सुधारों तक, राज्यसभा विपक्ष के लिए एक अभेद्य 'चेक पोस्ट' की तरह रही। लेकिन 16 मार्च 2026 को होने वाले राज्यसभा चुनाव इस पूरी राजनीतिक बिसात को बदलने जा रहे हैं। वर्तमान राजनीतिक अंकगणित और राज्यों की विधानसभाओं की स्थिति चीख-चीख कर कह रही है कि अब राज्यसभा में एनडीए की ताकत निर्णायक रूप से बढ़ने वाली है।

चुनावी गणित और राज्यों की बदलती राजनीतिक तस्वीर

आगामी 16 मार्च को 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के लिए होने वाले चुनाव महज सीटों का फेरबदल नहीं हैं, बल्कि यह केंद्र सरकार के तीसरे कार्यकाल की विधायी शक्ति का लिटमस टेस्ट है।

इन 37 सीटों में से भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को कम से कम आधी या उससे अधिक सीटें मिलने की प्रबल संभावना है। यदि हम भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टि से देखें, तो महाराष्ट्र, असम, हरियाणा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भाजपा की पकड़ पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है।

महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले दो वर्षों में जो उथल-पुथल मची, उसने विपक्षी महा विकास अघाड़ी को कमजोर किया है और महायुति गठबंधन को विधानसभा में वह संख्या बल प्रदान किया है जिससे वे राज्यसभा की अधिकतम सीटें जीत सकें। इसी तरह असम और हरियाणा में भाजपा की सांगठनिक मजबूती और विपक्षी बिखराव ने पार्टी के लिए रास्ता साफ कर दिया है।

ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में भी, जहाँ क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण है, वहां भी भाजपा अपने रणनीतिक कौशल से अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहेगी। यह चुनाव परिणाम राज्यसभा के भीतर उस पारंपरिक अवरोध को खत्म कर देंगे जो विपक्ष ने पिछले दस वर्षों से खड़ा कर रखा था।

विधायी बाधाओं का अंत और सुधारों की नई गति

राज्यसभा में एनडीए की संख्या बढ़ने का सबसे सीधा और गहरा प्रभाव देश की विधायी प्रक्रिया पर पड़ेगा। अब तक मोदी सरकार को किसी भी बड़े कानून को पारित कराने के लिए बीजू जनता दल (BJD) या वाईएसआर कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दलों के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ता था।

यह निर्भरता अक्सर नीतिगत समझौतों या देरी का कारण बनती थी। लेकिन अब, सरकार अपने दम पर या अपने कोर सहयोगियों के साथ मिलकर उन विधेयकों को आगे बढ़ा सकेगी जो अब तक विवादास्पद मानकर टाल दिए जाते थे। इसमें आर्थिक सुधारों की वह लंबी सूची शामिल है जो भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए आवश्यक है।

श्रम कानूनों में व्यापक बदलाव, बिजली क्षेत्र के सुधार और बैंकिंग क्षेत्र में निजीकरण जैसे कदम अब बिना किसी बड़े विधायी अवरोध के आगे बढ़ सकेंगे। यह मोदी सरकार के 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे के साथ 'रिफॉर्म, परफॉर्म और ट्रांसफॉर्म' के मंत्र को साकार करने की दिशा में सबसे बड़ी संस्थागत जीत होगी।

बड़े संवैधानिक और सामाजिक एजेंडे की ओर कदम

तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही मोदी सरकार ने यह संकेत दे दिए थे कि वह केवल शासन चलाने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन के लिए आई है। राज्यसभा में बढ़ती ताकत सरकार को उन 'साहसिक' फैसलों की ओर ले जाएगी जिनका जिक्र भाजपा के घोषणापत्रों में दशकों से रहा है। समान नागरिक संहिता एक ऐसा ही विषय है जिस पर देश भर में बहस छिड़ी हुई है।

लोकसभा में इसे पारित कराना कभी मुश्किल नहीं था, लेकिन राज्यसभा की बाधा ने हमेशा सरकार को सतर्क रहने पर मजबूर किया। अब जब उच्च सदन में संख्या बल अनुकूल होगा, तो यूसीसी जैसे संवेदनशील लेकिन महत्वपूर्ण कानून को विधायी जामा पहनाना आसान हो जाएगा। 

इसी कड़ी में 'एक राष्ट्र-एक चुनाव' का विचार भी अब केवल चर्चा का विषय नहीं रहेगा। हालांकि इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी और उसमें अभी भी दो-तिहाई बहुमत की चुनौती बनी रहेगी, लेकिन साधारण बहुमत के साथ सरकार इन मुद्दों पर विमर्श को आधिकारिक रूप से शुरू कर सकती है और विपक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में ला सकती है।

विपक्ष का संकट और लोकतांत्रिक संतुलन की चुनौती

राज्यसभा के इस बदलते स्वरूप ने विपक्षी गठबंधन 'INDIA' के सामने एक गंभीर अस्तित्वगत संकट खड़ा कर दिया है। लोकसभा चुनावों के दौरान जो एकजुटता कागजों पर दिखी थी, वह राज्यों की विधानसभाओं के भीतर राज्यसभा चुनावों के वक्त गायब नजर आती है।

कांग्रेस की सिमटती संख्या और क्षेत्रीय दलों की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियों ने विपक्ष को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ वे ऊपरी सदन में केवल विरोध दर्ज कराने की स्थिति में रह जाएंगे, न कि किसी प्रक्रिया को रोकने की।

यहां एक बड़ा सवाल लोकतांत्रिक संतुलन का भी उठता है। परंपरा के अनुसार राज्यसभा को इसलिए बनाया गया था ताकि लोकसभा के आवेशपूर्ण और जल्दबाजी में लिए गए फैसलों पर ठंडे दिमाग से विचार किया जा सके।

यदि राज्यसभा भी लोकसभा की ही कार्बन कॉपी बन जाएगी और वहां भी सरकार का पूर्ण वर्चस्व होगा, तो विधायी जांच-परख की वह प्रक्रिया कमजोर हो सकती है जो हमारे लोकतंत्र की खूबी रही है। विपक्ष को अब सदन के भीतर रणनीतिक विरोध के नए तरीके खोजने होंगे, अन्यथा उनकी आवाज केवल गैलरी तक सीमित रह जाएगी।

संस्थागत गरिमा का प्रश्न

16 मार्च के ये चुनाव केवल इस बारे में नहीं हैं कि कौन कितनी सीटें जीतता है, बल्कि यह इस बारे में हैं कि आने वाले वर्षों में भारत की संसद कैसे कार्य करेगी। एनडीए की बढ़ती ताकत सरकार को पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और आत्मविश्वास से लबरेज बनाएगी। 

प्रधानमंत्री मोदी के विजन 'विकसित भारत 2047' के लिए यह विधायी हाईवे तैयार करने जैसा है। लेकिन शक्ति के साथ जिम्मेदारी भी आती है। राज्यसभा की गरिमा इस बात में है कि वहां गहन चर्चा हो और हर कानून को बारिकी से परखा जाए।

सरकार को चाहिए कि वह अपनी बढ़ती ताकत का उपयोग सार्थक चर्चाओं के लिए करे, न कि केवल संख्या बल के आधार पर विधेयकों को पारित कराने के लिए। वहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं की यह जिम्मेदारी होगी कि वे इस बदले हुए शक्ति संतुलन में अपनी निष्पक्षता बनाए रखें।

अंततः, राज्यसभा का यह नया गणित भारत की राजनीति को एक नए युग की ओर ले जा रहा है जहाँ सरकार के पास निर्णय लेने की अभूतपूर्व शक्ति होगी और विपक्ष के पास खुद को फिर से प्रासंगिक बनाने की कठिन चुनौती।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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