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Ram Mandir: राम मंदिर चढ़ावा चोरी ने खोल दीं वर्षों से सुलग रहीं नाराजगी की परतें, व्यापक बदलाव की उठी मांग

Sun, 19 Jul 2026 07:07 PM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या
अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या Published by: Bhupendra Singh Updated Sun, 19 Jul 2026 07:07 PM IST
सार

राम मंदिर चढ़ावा चोरी ने वर्षों से सुलग रहीं नाराजगी की परतें खोल दी हैं। अखाड़ों की उपेक्षा से नाराज संतों ने राम मंदिर ट्रस्ट में साधु-केंद्रित व्यवस्था और व्यापक बदलाव की मांग उठाई है। आगे पढ़ें पूरी खबर...

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theft of offerings at Ram Mandir has exposed layers of long simmering resentment
राम जन्मभूमि मुकदमे के प्रमुख पक्षकार रहे महंत धर्मदास - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच के बीच अब ट्रस्ट की कार्यप्रणाली को लेकर साधु-संतों और विभिन्न अखाड़ों का असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। यह विवाद अब केवल चोरी या वित्तीय गड़बड़ियों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ट्रस्ट के गठन, उसके संचालन, संतों की भूमिका, पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया तक पहुंच गया है।

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संतों का कहना है कि नवंबर 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद केंद्र सरकार की ओर से गठित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से अपेक्षा थी कि वह मंदिर निर्माण के साथ-साथ सनातन परंपरा और अखाड़ा व्यवस्था का भी सम्मान करेगा। लेकिन वर्षों से ट्रस्ट के संचालन में संतों की भूमिका सीमित होती चली गई, जिससे व्यापक असंतोष पैदा हुआ। 

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नृत्यगोपाल दास की भी भूमिका ट्रस्ट में सीमित

चढ़ावा प्रकरण के बाद यह असंतोष खुलकर सामने आ गया है। निर्मोही अखाड़े के महंत दिनेंद्र दास ट्रस्ट के सदस्य हैं, लेकिन अखाड़े से जुड़े संतों का आरोप है कि उनकी भूमिका केवल औपचारिक रह गई है। उनका कहना है कि महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी राय को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। राम मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास की भी भूमिका ट्रस्ट में सीमित ही नजर आती है।

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राम जन्मभूमि मुकदमे के प्रमुख पक्षकार रहे महंत धर्मदास ने मंदिर से संबंधित भूमि के स्वामित्व को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सनातन परंपरा के अनुसार मंदिर की संपत्ति ''भगवान श्रीरामलला विराजमान'' के नाम पर होनी चाहिए। उनका आरोप है कि कुछ मामलों में भूमि ट्रस्ट अथवा अन्य स्वरूपों में दर्ज की गई, जिस पर धार्मिक दृष्टि से पुनर्विचार होना चाहिए। उनका कहना है कि मंदिर जैसी सर्वोच्च धार्मिक संस्था में दान, चढ़ावा, लेखा और खर्च का संचालन पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास बना रहे।

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महंत विवेक आचारी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

संतों एवं अखाड़ों के हाथों में होनी चाहिए मंदिर की व्यवस्थाएं

महंत विवेक आचारी कहते हैं कि अयोध्या के प्रमुख मंदिरों का संचालन सदियों से साधु-संतों और अखाड़ों की परंपरा के अनुरूप होता आया है। पी कारनेगी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि जन्मस्थान (राम मंदिर) में 22 साधु रहते थे, जो पूरी व्यवस्था देखते थे। 

उनके अनुसार वर्तमान ट्रस्ट मॉडल में प्रशासनिक और संगठनात्मक ढांचा अधिक प्रभावी हो गया है, जबकि संतों की भूमिका सीमित कर दी गई है। ट्रस्ट वित्तीय प्रबंधन और लेखा व्यवस्था देख सकता है, लेकिन मंदिर की धार्मिक, आंतरिक और प्रशासनिक व्यवस्था संतों एवं अखाड़ों के हाथों में होनी चाहिए। उनका सुझाव है कि सभी संबंधित अखाड़ों और परंपराओं को प्रतिनिधित्व देकर सामूहिक व्यवस्था विकसित की जाए।

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