{"_id":"69f4ea75cdcac215ba0a28b4","slug":"fines-imposed-on-private-labs-were-manipulated-with-a-notice-of-rs-5-lakh-issued-and-a-press-note-showing-rs-25-lakh-bageshwar-news-c-8-1-hld1034-760910-2026-05-01","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bageshwar News: निजी लैबों पर जुर्माने की राशि में खेल, पांच लाख का थमाया नोटिस और प्रेस नोट में दिखाए ढाई लाख","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bageshwar News: निजी लैबों पर जुर्माने की राशि में खेल, पांच लाख का थमाया नोटिस और प्रेस नोट में दिखाए ढाई लाख
विज्ञापन
विज्ञापन
बागेश्वर। नगर की निजी पैथोलॉजी लैबों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग की हालिया कार्रवाई अब विवादों के घेरे में आ गई है। एसीएमओ डॉक्टर अमित मिश्रा के नेतृत्व में हुई इस कार्रवाई के दौरान जुर्माने की राशि को लेकर भारी विसंगति सामने आई है जिससे विभाग की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। जिन लैब संचालकों पर विभाग ने कार्रवाई की उन्हें मौके पर पांच लाख रुपये के जुर्माने का नोटिस थमाया गया।
इसके उलट विभाग की ओर से जारी आधिकारिक प्रेस नोट में जुर्माने की राशि केवल ढाई-ढाई लाख रुपये ही दर्शाई गई। एक ही कार्रवाई में जुर्माने की रकम का आधा हो जाना अब चर्चा का विषय बन गया है। जुर्माने की राशि में आए इस बड़े अंतर को लेकर जब विभाग और संबंधित अधिकारी डॉक्टर अमित मिश्रा से वार्ता की गई तो उन्होंने इसे लिपिकीय त्रुटि करार दिया। अधिकारी का कहना है कि टाइपिंग की गलती के कारण प्रेस नोट में आंकड़े गलत दर्ज हो गए थे। विभाग इसे महज एक मानवीय चूक बता रहा है लेकिन बुद्धिजीवियों और लैब संचालकों के बीच इसे लेकर कई तरह के संदेह पैदा हो रहे हैं। सवाल यह है कि क्या इतने संवेदनशील और गंभीर मामले में विभाग इतना लापरवाह हो सकता है। सरकारी दस्तावेज और प्रेस नोट के बीच लाखों रुपये का यह अंतर विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है। संवाद
Trending Videos
इसके उलट विभाग की ओर से जारी आधिकारिक प्रेस नोट में जुर्माने की राशि केवल ढाई-ढाई लाख रुपये ही दर्शाई गई। एक ही कार्रवाई में जुर्माने की रकम का आधा हो जाना अब चर्चा का विषय बन गया है। जुर्माने की राशि में आए इस बड़े अंतर को लेकर जब विभाग और संबंधित अधिकारी डॉक्टर अमित मिश्रा से वार्ता की गई तो उन्होंने इसे लिपिकीय त्रुटि करार दिया। अधिकारी का कहना है कि टाइपिंग की गलती के कारण प्रेस नोट में आंकड़े गलत दर्ज हो गए थे। विभाग इसे महज एक मानवीय चूक बता रहा है लेकिन बुद्धिजीवियों और लैब संचालकों के बीच इसे लेकर कई तरह के संदेह पैदा हो रहे हैं। सवाल यह है कि क्या इतने संवेदनशील और गंभीर मामले में विभाग इतना लापरवाह हो सकता है। सरकारी दस्तावेज और प्रेस नोट के बीच लाखों रुपये का यह अंतर विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है। संवाद
विज्ञापन
विज्ञापन
