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Bageshwar News: नदियों में रहस्य बनीं गुमशुदगियां, परिजनों की पथरा गईं आंखें

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Tue, 16 Jun 2026 10:47 PM IST
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Missing people in rivers remain a mystery, leaving family members stunned.
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बागेश्वर। उत्तराखंड के पर्वतीय अंचलों में प्राकृतिक आपदाएं जितनी बड़ी चुनौती हैं उतनी ही बड़ी चुनौती अब लापता लोगों की तलाश बनती जा रही है। बागेश्वर जिले में पिछले कुछ समय में नदी किनारों और दुर्गम ट्रेकिंग रूटों से गायब हुए लोगों का कोई सुराग न मिलना स्थानीय पुलिस और रेस्क्यू सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

पिछले वर्ष जुलाई से लेकर अब तक नदी किनारों से रहस्यमय ढंग से लापता हुए तीन लोगों की फाइलें आज भी अलमारी में धूल फांक रही हैं। अत्याधुनिक खोजी उपकरणों, ड्रोन और थर्मल कैमरों से लैस एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की टीमें भी इन मामलों में पूरी तरह खाली हाथ रही हैं।
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सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारा आपदा प्रबंधन और खोजी तंत्र केवल तात्कालिक राहत तक ही सीमित है? क्योंकि जब बात गहरे पानी या खाइयों में लापता लोगों को ढूंढने की आती है तो हफ्तों चले सर्च ऑपरेशन के बाद भी नतीजा शून्य ही नजर आता है। पहाड़ी जिलों में जल पुलिस की तैनाती न होना हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। जब इस विषय पर संबंधित अधिकारियों से बात की गई, तो उन्होंने पहाड़ी नदियों की व्यावहारिक और भौगोलिक चुनौतियों को सामने रखा।
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एक साल में तीन अनसुलझे केस
केस 1:
बीते साल तीन जुलाई को घर से दफ्तर के लिए निकले वन दरोगा कैलाश चंद्र पांडेय अचानक लापता हो गए। उनकी स्कूटी सरयू नदी के किनारे बरामद हुई थी। पुलिस और एसडीआरएफ की टीमों ने नदी किनारे लगातार खोजबीन अभियान चलाया लेकिन परिजनों की आंखें आज भी उनके इंतजार में पथरा गई हैं। 11 महीने बीतने और सोशल मीडिया से लेकर धरातल तक अभियान चलाने के बाद भी पुलिस वनकर्मी का सुराग लगाने में नाकाम रही है जिससे यह मामला एक अनसुलझी पहेली बन चुका है।

केस 2:
अपराध नियंत्रण और पुलिसिंग पर सबसे बड़ा दाग बीते साल 17 सितंबर को लगा जब चरस तस्करी के एक आरोपी को कपकोट थाने की पुलिस न्यायालय ले जा रही थी। आरोपी कपकोट-बागेश्वर मार्ग पर झटक्वाली के पास पुलिस की चलती गाड़ी से सरयू नदी की ओर कूदकर भाग गया। नौ महीने से अधिक का समय बीतने के बाद भी कपकोट पुलिस और खुफिया तंत्र के हाथ खाली हैं, जो सुरक्षा व्यवस्था की मुस्तैदी पर सवाल उठाता है।

केस 3:
बीते 29 मई को हाई-एल्टीट्यूड ट्रेकिंग रूट पिंडारी ग्लेशियर पर आए पर्यटक अभिषेक चौहान ट्रेक से लौटते समय छिल्याणी गधेरे के पास से अचानक गायब हो गए। इस मामले में शासन के निर्देश पर एसडीआरएफ और एनडीआरएफ की संयुक्त टीमों ने घाटी और उफनती नदियों का कोना-कोना खंगाला। सैटेलाइट ट्रैकिंग और आधुनिक रेस्क्यू उपकरणों का उपयोग किया गया, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा।

स्थानीय स्वयंसेवकों और तैराकों से ली जाएगी मदद
पहाड़ी क्षेत्रों की नदियां मैदानी इलाकों की तुलना में अत्यंत तीव्र वेग वाली और पथरीली होती हैं। यही कारण है कि पारंपरिक जल पुलिस मैदानों की अपेक्षा यहां कम सफल साबित होती है।

कोट
- भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए पहाड़ की नदियों में स्थानीय तैराक सबसे अधिक मददगार साबित होते हैं। आपदा प्रबंधन और सर्च ऑपरेशन को गति देने के लिए इस बार जनसहभागिता और स्थानीय युवाओं के हुनर को प्राथमिकता दी जा रही है। नदियों के किनारे नजर रखने, खोजबीन करने और किसी की जान बचाने वाले सजग नागरिकों को पुलिस प्रशासन की ओर से विशेष रूप से पुरस्कृत भी किया जाएगा। - जितेंद्र मेहरा, एसपी, बागेश्वर

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