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Chamoli News: बदरीनाथ की पौराणिकता और सनातन परंपराओं पर हुआ मंथन
संवाद न्यूज एजेंसी, चमोली
Updated Thu, 14 May 2026 07:27 PM IST
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बदरीनाथ में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रतिभाग करते प्रोफेसर। स्रोत: जागरुक पाठक
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बदरीनाथ में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शुरू
22 राज्यों के 450 शोधार्थी और प्रोफेसर कर रहे हैं प्रतिभाग
संवाद न्यूज एजेंसी
बदरीनाथ। बदरीनाथ धाम में बृहस्पतिवार से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हो गया है। सम्मेलन में देशभर से पहुंचे विद्वानों, शोधार्थियों और संतों ने बदरीकाश्रम की आध्यात्मिक परंपराओं, पौराणिक महत्व और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तार से चर्चा की। उत्तराखंड संस्कृत विवि, केंद्रीय संस्कृत विवि जनकपुरी दिल्ली, केंद्रीय संस्कृत विवि देवप्रयाग और सोबन सिंह जीना विवि की ओर से आयोजित सम्मेलन का विषय भारतीय ज्ञान परंपरा : दिव्य भूमि बदरीकाश्रम रखा गया है। सम्मेलन में 22 राज्यों से आए 450 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं जिनमें शोधार्थी, प्रोफेसर और संस्कृत विद्वान शामिल हैं।
सम्मेलन का उद्घाटन उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग के निदेशक प्रो. पीवीबी सुब्रह्मण्यम, बदरीनाथ के धर्माधिकारी आचार्य स्वयंवर सेमवाल और योगी बालकनाथ ने संयुक्त रूप से किया। मुख्य वक्ता चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के महासचिव डॉ. बृजेश सती ने कहा कि बदरीनाथ धाम केवल एक तीर्थ नहीं बल्कि भारतीय सनातन संस्कृति, तप और ज्ञान की जीवंत धारा है। आदि गुरु शंकराचार्य ने जिस आध्यात्मिक चेतना को बदरीकाश्रम से पुनर्जीवित किया वही आज भी देश-दुनिया के श्रद्धालुओं को यहां तक खींच लाती है। यहां भगवान विष्णु तपस्वी रूप में विराजमान हैं और यह धाम भारतीय आध्यात्मिक चेतना का केंद्र माना जाता है। डॉ. सती ने बदरीनाथ मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, कपाट खुलने और बंद होने की विधियों, रावल परंपरा तथा तीर्थ पुरोहित व्यवस्था के बारे में भी जानकारी दी। सम्मेलन में होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश मेहता और प्रो. बनमाली विशवाल ने भी विचार रखे। डॉ. मनोज विश्नोई ने सम्मेलन में शोधार्थियों की ओर से भारतीय संस्कृति, वेद, पुराण, हिमालयी सभ्यता और बदरीकाश्रम पर आधारित शोधपत्र प्रस्तुत किए जा रहे हैं। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. प्रदीप सेमवाल ने बताया कि सम्मेलन में 22 राज्यों के 450 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। इसमें 100 शोधार्थी 200 प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर शामिल हैं। सम्मेलन में शोधार्थी की ओर से शोधपत्र पढ़े जा रहे हैं।
बदरीनाथ में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शुरू
22 राज्यों के 450 शोधार्थी और प्रोफेसर कर रहे हैं प्रतिभाग
संवाद न्यूज एजेंसी
बदरीनाथ। बदरीनाथ धाम में बृहस्पतिवार से तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हो गया है। सम्मेलन में देशभर से पहुंचे विद्वानों, शोधार्थियों और संतों ने बदरीकाश्रम की आध्यात्मिक परंपराओं, पौराणिक महत्व और भारतीय ज्ञान परंपरा पर विस्तार से चर्चा की। उत्तराखंड संस्कृत विवि, केंद्रीय संस्कृत विवि जनकपुरी दिल्ली, केंद्रीय संस्कृत विवि देवप्रयाग और सोबन सिंह जीना विवि की ओर से आयोजित सम्मेलन का विषय भारतीय ज्ञान परंपरा : दिव्य भूमि बदरीकाश्रम रखा गया है। सम्मेलन में 22 राज्यों से आए 450 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं जिनमें शोधार्थी, प्रोफेसर और संस्कृत विद्वान शामिल हैं।
सम्मेलन का उद्घाटन उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पांडेय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग के निदेशक प्रो. पीवीबी सुब्रह्मण्यम, बदरीनाथ के धर्माधिकारी आचार्य स्वयंवर सेमवाल और योगी बालकनाथ ने संयुक्त रूप से किया। मुख्य वक्ता चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत के महासचिव डॉ. बृजेश सती ने कहा कि बदरीनाथ धाम केवल एक तीर्थ नहीं बल्कि भारतीय सनातन संस्कृति, तप और ज्ञान की जीवंत धारा है। आदि गुरु शंकराचार्य ने जिस आध्यात्मिक चेतना को बदरीकाश्रम से पुनर्जीवित किया वही आज भी देश-दुनिया के श्रद्धालुओं को यहां तक खींच लाती है। यहां भगवान विष्णु तपस्वी रूप में विराजमान हैं और यह धाम भारतीय आध्यात्मिक चेतना का केंद्र माना जाता है। डॉ. सती ने बदरीनाथ मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं, कपाट खुलने और बंद होने की विधियों, रावल परंपरा तथा तीर्थ पुरोहित व्यवस्था के बारे में भी जानकारी दी। सम्मेलन में होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश मेहता और प्रो. बनमाली विशवाल ने भी विचार रखे। डॉ. मनोज विश्नोई ने सम्मेलन में शोधार्थियों की ओर से भारतीय संस्कृति, वेद, पुराण, हिमालयी सभ्यता और बदरीकाश्रम पर आधारित शोधपत्र प्रस्तुत किए जा रहे हैं। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. प्रदीप सेमवाल ने बताया कि सम्मेलन में 22 राज्यों के 450 प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। इसमें 100 शोधार्थी 200 प्रोफेसर व असिस्टेंट प्रोफेसर शामिल हैं। सम्मेलन में शोधार्थी की ओर से शोधपत्र पढ़े जा रहे हैं।
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