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Champawat News: चंपावत से धारचूला... पुश्तैनी रास्तों पर निकला 600 भेड़ों का कारवां

संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत Updated Thu, 02 Apr 2026 11:14 PM IST
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From Champawat to Dharchula... A caravan of 600 sheep set out on ancestral routes
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चंपावत। उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में गर्मी की दस्तक के साथ ही ऋतु प्रवास की परंपरा शुरू हो गई है। मैदानी इलाकों की गर्मी से बचकर अब चरवाहे अपने पशुधन के साथ पिथौरागढ़ जिले के धारचूला स्थित ऊंचे बुग्यालों (घास के मैदानों) की ओर लौटने लगे हैं। 600 भेड़ों का एक विशाल झुंड चंपावत के ललुवापानी और बनलेख क्षेत्र से होकर गंतव्य की ओर रवाना हो गया है।
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मूलरूप से अनुवाल कहे जाने वाले इन चरवाहों का जीवन प्रकृति के चक्र पर टिका है। मुख्य चरवाहे बहादुर ने बताया कि साल के छह महीने मैदानों में और छह महीने उच्च हिमालय में बिताना ही उनकी नियति और रोजगार है। उन्होंने बताया कि धारचूला पहुंचने में उन्हें करीब 30 दिन का समय लगता है। बहादुर ने बताया कि वह रोज पांच से सात किमी की दूरी तय करते हैं और शाम होते ही किसी सुरक्षित चरागाह पर अपना पड़ाव डाल देते हैं। उनका कहना है कि इस दौरान 30 से अधिक पड़ावों पर रुकना पड़ता है।
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एक चलता-फिरता कुनबा



600 भेड़ों के इस बड़े कुनबे को संभालने के लिए बहादुर के साथ पांच अन्य लोग शामिल हैं। सुरक्षा के लिए उनके पास चार भोटिया कुत्ते हैं जो भेड़ों को जंगली जानवरों से बचाने में माहिर होते हैं। राशन और अन्य जरूरी सामान ढोने के लिए पांच घोड़े भी हमेशा साथ रहते हैं।

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पुश्तैनी रास्तों को प्राथमिकता

बहादुर के अनुसार नेशनल हाईवे पर इतनी बड़ी संख्या में भेड़ों को ले जाना कठिन होता है। इससे यातायात बाधित होता है और पशुओं के लिए भी खतरा बना रहता है। हम कोशिश करते हैं कि आबादी वाले इलाकों को रात के समय ही पार कर लें ताकि आम जनता को असुविधा न हो। उनका कहना है कि भेड़ पालन और ऊन का कारोबार ही इस समुदाय की आजीविका का मुख्य साधन है। यह सफर न केवल उनके रोजगार की मजबूरी है बल्कि उनकी सदियों पुरानी संस्कृति का हिस्सा भी है।
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