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Pithoragarh News: लाखों खर्च फिर भी गंडक की धारा में बह रहा उपेक्षा का मैल
Sat, 27 Jun 2026 10:51 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sat, 27 Jun 2026 10:51 PM IST
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चंपावत। पहाड़ों की गोद से निकलने वाली गंडक नदी क्रांतेश्वर क्षेत्र तक अपनी निर्मल धारा के साथ बहती है, लेकिन ताड़केश्वर घाट तक पहुंचते-पहुंचते इसका स्वरूप बदलने लगता है। कभी कलकल बहने वाली यह पौराणिक नदी अब कचरे, गंदगी और उपेक्षा के कारण अपनी पहचान खोने की ओर बढ़ रही है।
ताड़केश्वर घाट पर शवदाह किए जाने के बाद कई बार अधजली लकड़ियां, कपड़े और अन्य अवशेष नदी किनारे पड़े रह जाते हैं। इससे नदी की स्वच्छता प्रभावित होती है। इसके अलावा बढ़ती आबादी, निर्माण कार्यों और गंदे पानी की निकासी ने भी गंडक की निर्मलता के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
गंडक नदी को स्वच्छ बनाने के लिए नमामि गंगे और स्वच्छता पखवाड़े जैसे कई अभियान चलाए गए। लाखों रुपये खर्च कर सफाई प्रयास किए गए, लेकिन नदी का पुराना स्वरूप लौटाने में ये अभियान पूरी तरह सफल नहीं हो सके हैं। स्वच्छता अभियानों के दौरान कुछ हिस्सों में सफाई तो होती है, लेकिन नियमित संरक्षण के अभाव में स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है।
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चंपावत कैंपस क्षेत्र के पास एनएसएस स्वयंसेवी और समय-समय पर स्थानीय लोग व संगठन नदी सफाई अभियान चलाते हैं। बावजूद इसके डिप्टेश्वर तक पौराणिक महत्व वाली गंडक नदी को स्वच्छ बनाए रखना लगातार चुनौती बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अभियान नहीं बल्कि लोगों की भागीदारी और स्थायी व्यवस्था से ही नदी को बचाया जा सकता है।
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आबादी बढ़ने के बाद नदी की निर्मलता और अस्तित्व पर खतरा हो रहा है। वृहद स्तर पर जनजागरण कार्यक्रम चलाने की जरूरत है। हर व्यक्ति अगर अपनी नदी समझकर इसकी सफाई के लिए विचार नहीं करेगा तब तक अभियान चलाने का कोई फायदा नहीं होगा। शासन-प्रशासन को नदी में गंदा करने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए। तब जाकर कुछ असर होगा। चंपावत धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। नदी की स्वच्छता के लिए सार्थक प्रयास की जरूरत है।
डॉ. बीडी सुतेड़ी, शिक्षाविद्, चंपावत
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उत्तर वाहिनी गंडक नदी चंपावत की सबसे संवेदनशील नदी है। इसके संरक्षण के लिए उपाय करने होंगे। शहर का सारा गंदा पानी इसी नदी में छोड़ा जा रहा है। चंपावत के चारों ओर देवदार, बांज, बुरांश, उतीस आदि के जंगल भरपूर मात्रा में हैं। जल भी पर्याप्त मात्रा में आ रहा है लेकिन शहर में सीवर लाइन की व्यवस्था न होने के कारण से सीवर का पानी सीधे-सीधे नदी समा रहा है। सीवर लाइन को प्राथमिकता में लेते हुए इसके बचाव के उपाय करने चाहिए।
-डॉ. कमलेश सक्टा, पर्यावरणविद्, चंपावत
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ताड़केश्वर घाट पर शवदाह किए जाने के बाद कई बार अधजली लकड़ियां, कपड़े और अन्य अवशेष नदी किनारे पड़े रह जाते हैं। इससे नदी की स्वच्छता प्रभावित होती है। इसके अलावा बढ़ती आबादी, निर्माण कार्यों और गंदे पानी की निकासी ने भी गंडक की निर्मलता के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
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गंडक नदी को स्वच्छ बनाने के लिए नमामि गंगे और स्वच्छता पखवाड़े जैसे कई अभियान चलाए गए। लाखों रुपये खर्च कर सफाई प्रयास किए गए, लेकिन नदी का पुराना स्वरूप लौटाने में ये अभियान पूरी तरह सफल नहीं हो सके हैं। स्वच्छता अभियानों के दौरान कुछ हिस्सों में सफाई तो होती है, लेकिन नियमित संरक्षण के अभाव में स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है।
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चंपावत कैंपस क्षेत्र के पास एनएसएस स्वयंसेवी और समय-समय पर स्थानीय लोग व संगठन नदी सफाई अभियान चलाते हैं। बावजूद इसके डिप्टेश्वर तक पौराणिक महत्व वाली गंडक नदी को स्वच्छ बनाए रखना लगातार चुनौती बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अभियान नहीं बल्कि लोगों की भागीदारी और स्थायी व्यवस्था से ही नदी को बचाया जा सकता है।
आबादी बढ़ने के बाद नदी की निर्मलता और अस्तित्व पर खतरा हो रहा है। वृहद स्तर पर जनजागरण कार्यक्रम चलाने की जरूरत है। हर व्यक्ति अगर अपनी नदी समझकर इसकी सफाई के लिए विचार नहीं करेगा तब तक अभियान चलाने का कोई फायदा नहीं होगा। शासन-प्रशासन को नदी में गंदा करने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए। तब जाकर कुछ असर होगा। चंपावत धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। नदी की स्वच्छता के लिए सार्थक प्रयास की जरूरत है।
डॉ. बीडी सुतेड़ी, शिक्षाविद्, चंपावत
उत्तर वाहिनी गंडक नदी चंपावत की सबसे संवेदनशील नदी है। इसके संरक्षण के लिए उपाय करने होंगे। शहर का सारा गंदा पानी इसी नदी में छोड़ा जा रहा है। चंपावत के चारों ओर देवदार, बांज, बुरांश, उतीस आदि के जंगल भरपूर मात्रा में हैं। जल भी पर्याप्त मात्रा में आ रहा है लेकिन शहर में सीवर लाइन की व्यवस्था न होने के कारण से सीवर का पानी सीधे-सीधे नदी समा रहा है। सीवर लाइन को प्राथमिकता में लेते हुए इसके बचाव के उपाय करने चाहिए।
-डॉ. कमलेश सक्टा, पर्यावरणविद्, चंपावत