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स्वच्छता के लिए सामुदायिक भागीदारी जरूरी : प्रो. रावत
संवाद न्यूज एजेंसी, ऋषिकेश
Updated Tue, 17 Mar 2026 02:05 AM IST
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स्वच्छता का समाजशास्त्र विषय पर विचार व्यक्त करते वक्ता। स्रोत जागरूक पाठक।
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श्री देव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय के पं. ललित मोहन शर्मा परिसर में समाजशास्त्र विभाग की ओर से एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में स्वच्छता का समाजशास्त्र विषय पर वक्ताओं ने व्याख्यान दिया।
परिसर के निदेशक और कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. महावीर सिंह रावत ने कहा कि स्वच्छता का समाजशास्त्र यह स्पष्ट करता है कि स्वच्छता सुधार के लिए केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं होते हैं। इसके लिए सामाजिक जागरूकता, व्यवहार परिवर्तन, सामुदायिक भागीदारी और प्रभावी नीतियों की भी आवश्यकता होती है।
प्रो. नील रतन ने कहा कि स्वच्छता केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना, जीवन शैली और सामुदायिक सहभागिता से भी गहराई से जुड़ी हुई है। भारत में लंबे समय तक खुले में शौच और मैला ढोने जैसी प्रथाएं सामाजिक संरचना और जातिगत विभाजन से जुड़ी रही हैं, जिनके समाधान के लिए सामाजिक परिवर्तन और व्यवहारिक सुधार आवश्यक थे। डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने कहा कि सुलभ शौचालय प्रणाली के तहत कम लागत वाले ट्विन-पिट शौचालयों के विकास ने मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने और स्वच्छता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस मौके पर प्रो. जेपी पचौरी, डॉ. अनिल एस वाघेला, प्रो. पीके सिंह, प्रो. हेमलता मिश्रा आदि ने विचार व्यक्त किया।
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परिसर के निदेशक और कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. महावीर सिंह रावत ने कहा कि स्वच्छता का समाजशास्त्र यह स्पष्ट करता है कि स्वच्छता सुधार के लिए केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं होते हैं। इसके लिए सामाजिक जागरूकता, व्यवहार परिवर्तन, सामुदायिक भागीदारी और प्रभावी नीतियों की भी आवश्यकता होती है।
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प्रो. नील रतन ने कहा कि स्वच्छता केवल तकनीकी व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह सामाजिक चेतना, जीवन शैली और सामुदायिक सहभागिता से भी गहराई से जुड़ी हुई है। भारत में लंबे समय तक खुले में शौच और मैला ढोने जैसी प्रथाएं सामाजिक संरचना और जातिगत विभाजन से जुड़ी रही हैं, जिनके समाधान के लिए सामाजिक परिवर्तन और व्यवहारिक सुधार आवश्यक थे। डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने कहा कि सुलभ शौचालय प्रणाली के तहत कम लागत वाले ट्विन-पिट शौचालयों के विकास ने मैला ढोने की प्रथा को समाप्त करने और स्वच्छता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस मौके पर प्रो. जेपी पचौरी, डॉ. अनिल एस वाघेला, प्रो. पीके सिंह, प्रो. हेमलता मिश्रा आदि ने विचार व्यक्त किया।