मानव तस्करी: स्थानीय एजेंटों की कड़ी खोलने से टूटेगा बड़ा नेटवर्क, सामने आ चुके हैं बड़े मामले
कुमाऊं के सीमावर्ती क्षेत्रों में मानव तस्करी के मामलों में पीड़ितों को बरामद कर बिचौलियों तक पहुंचने के बाद जांच आगे नहीं बढ़ पाती। मोबाइल संपर्क, बैंक लेनदेन और यात्रा विवरण की जांच से नेटवर्क की ऊपरी कड़ियों तक पहुंचा जा सकता है।
विस्तार
मानव तस्करी के मामलों में पीड़ितों को बरामद कर बिचौलियों तक पहुंचने के बाद जांच अक्सर आगे नहीं बढ़ पाती। कुमाऊं के सीमावर्ती क्षेत्रों में सामने आए मामलों को देखते हुए स्थानीय एजेंटों की पहचान कर उनके जरिए तस्करी के बड़े नेटवर्क की ऊपरी कड़ियों तक पहुंचने की चुनौती है।
तस्करी के नेटवर्क में स्थानीय एजेंट पीड़ित और मुख्य संचालकों के बीच अहम कड़ी होते हैं। ये एजेंट नौकरी, विदेश भेजने या कम समय में अधिक कमाई का लालच देकर लोगों को नेटवर्क तक पहुंचाते हैं। कई मामलों में पीड़ितों के दस्तावेज भी अपने कब्जे में ले लिए जाते हैं, जिससे उन्हें नेटवर्क की वास्तविक मंशा का पता नहीं चल पाता।
ऐसे मामलों में एजेंटों के मोबाइल संपर्क, बैंक खातों में लेनदेन, यात्रा विवरण और पीड़ितों से जुड़े दस्तावेज जांच की महत्वपूर्ण कड़ी बन सकते हैं। इनका विश्लेषण कर एजेंटों के संपर्कों और वित्तीय लेनदेन के जरिए नेटवर्क की अगली कड़ियों तक पहुंचा जा सकता है।
खुली सीमा और बदलते तरीके बढ़ा रहे चुनौती
भारत-नेपाल की खुली सीमा के कारण तस्करी के मामलों में निगरानी और सूचना साझा करना पुलिस व सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती है। इसके अलावा फर्जी नौकरी पोर्टल और सोशल मीडिया के जरिये भी लोगों को जाल में फंसाने के तरीके सामने आ रहे हैं। ऐसे मामलों में डिजिटल ट्रेल और फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाना जांच का अहम हिस्सा बन गया है।
ऊधमसिंह नगर और चंपावत संवेदनशील
कुमाऊं में ऊधमसिंह नगर और चंपावत को मानव तस्करी के मामलों में संवेदनशील माना जाता है। पूर्व में भी नेपाल और दूसरे राज्यों से लोगों को लाकर तस्करी किए जाने के मामले सामने आए हैं। 2025 में काशीपुर में पुलिस ने नौकरी का झांसा देकर लाए गए 32 नेपाली युवकों को मुक्त कराया था। इससे पहले 2022 में ऊधमसिंह नगर पुलिस ने तीन महिलाओं को मुक्त कर चार आरोपियों को गिरफ्तार किया था।
चार प्रमुख चुनौतियां
- डिजिटल ट्रेल: फर्जी जॉब पोर्टल और साइबर माध्यमों से संचालित नेटवर्क के आरोपियों तक पहुंचने के लिए डिजिटल साक्ष्य जुटाना।
- खुली सीमा: भारत-नेपाल की खुली सीमा पर तस्करी के पीड़ितों की पहचान और एजेंसियों के बीच त्वरित सूचना साझा करना।
- गवाही: दूसरे राज्यों और नेपाल के पीड़ितों की अदालत में गवाही सुनिश्चित करना।
- एजेंसी समन्वय: विभिन्न राज्यों की पुलिस, सुरक्षा एजेंसियों और संबंधित विभागों के बीच सूचनाओं का प्रभावी आदान-प्रदान।
पहले भी सामने आ चुके हैं बड़े मामले
2022: ऊधमसिंह नगर पुलिस ने हरियाणा, दिल्ली और नेपाल से युवतियों को लाकर देह व्यापार कराने के आरोप में चार लोगों को गिरफ्तार कर तीन महिलाओं को मुक्त कराया था।
2025: काशीपुर में पुलिस ने नौकरी का झांसा देकर लाए गए और एक मकान में बंधक बनाकर रखे गए 32 नेपाली युवकों को मुक्त कराया था। पुलिस ने इसे अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी नेटवर्क से जुड़ा मामला बताया था।
आधुनिक जांच पर जोर
सम्मेलन में तस्करी के नेटवर्क को तोड़ने के लिए आधुनिक जांच, साक्ष्य संकलन और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय पर चर्चा होगी। पीड़ितों के बचाव और पुनर्वास पर भी विशेष जोर रहेगा। -निवेदिता कुकरेती, आईजी कुमाऊं
आज छह राज्यों और नेपाल के प्रतिनिधि जुटेंगे
नेपाल से भारत तक फैले मानव तस्करी नेटवर्क पर रणनीति बनाने के लिए शुक्रवार को पंतनगर विश्वविद्यालय के गांधी हॉल में राज्यस्तरीय सम्मेलन होगा। इसमें उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा और पंजाब के पुलिस अधिकारी, सुरक्षा एजेंसियां, अर्द्धसैनिक बल, प्रशासन और एनजीओ से जुड़े 134 प्रतिनिधि शामिल होंगे। नेपाल की सामाजिक संस्था मैती के प्रतिनिधि भी सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। सम्मेलन में पीड़ितों की पहचान, रेस्क्यू, कानूनी कार्रवाई और सुरक्षित पुनर्वास के साथ विभिन्न राज्यों और एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत करने पर चर्चा होगी। जिले की 13 एएचटीयू के नोडल अधिकारी, बाल कल्याण पुलिस अधिकारी, श्रम, शिक्षा, महिला एवं बाल विकास विभाग, सीडब्ल्यूसी और विधिक सेवा प्राधिकरण के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे। सम्मेलन में एडीजी अपराध डॉ. वी. मुरुगेशन, पूर्व डीजी एनडीआरएफ पीएम नायर, एसडब्ल्यूआरसी बनबसा के संस्थापक जनक बहादुर चंद, मदद फाउंडेशन के संस्थापक राजेश मनी और शक्ति वाहिनी के संयोजक एवं सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता रविकांत समेत विशेषज्ञ भी मौजूद रहेंगे।