नाक में ऑक्सीजन की नली, बाइक पर बैठा एक बीमार व्यक्ति और पीछे रस्सी से बंधा ऑक्सीजन सिलेंडर। यह तस्वीर कोरोना काल की उन भयावह यादों को ताजा कर देती है, जब लोग सांसों के लिए संघर्ष कर रहे थे लेकिन गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के गिरारी गांव में रहने वाले भगत सिंह कुशराम के लिए ऑक्सीजन का यह संघर्ष आज भी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बना हुआ है। लीवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे भगत सिंह को ऑक्सीजन सिलेंडर भरवाने के लिए हर दो से तीन दिन में करीब 15 किलोमीटर दूर गौरेला जाना पड़ता है।
पेंड्रा क्षेत्र की ग्राम पंचायत गिरारी के भलवाही टिकरा मोहल्ले में रहने वाले भगत सिंह कुशराम का इलाज बिलासपुर के गनियारी अस्पताल में चल रहा है। बीमारी के कारण उन्हें सांस लेने के लिए ऑक्सीजन सपोर्ट की जरूरत पड़ती है। भगत सिंह के मुताबिक एक ऑक्सीजन सिलेंडर करीब ढाई से तीन दिन तक चलता है। सिलेंडर खत्म होने के बाद उन्हें किसी पड़ोसी की बाइक पर बैठकर उसे भरवाने के लिए गौरेला जाना पड़ता है।
गंभीर बीमारी से जूझ रहे व्यक्ति के लिए यह सफर कितना मुश्किल होता होगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। इसके बावजूद ऑक्सीजन की जरूरत पूरी करने के लिए उन्हें बार-बार यह परेशानी उठानी पड़ रही है। भगत सिंह का कहना है कि जिला प्रशासन की ओर से उन्हें बिजली से चलने वाली ऑक्सीजन जनरेटर मशीन उपलब्ध कराई गई है। हालांकि बिजली गुल होने और कम वोल्टेज की समस्या के कारण मशीन का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। ऐसे में मशीन मिलने के बावजूद उन्हें ऑक्सीजन सिलेंडर पर निर्भर रहना पड़ रहा है। यह स्थिति बताती है कि किसी मरीज को चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका नियमित और सुरक्षित संचालन सुनिश्चित करना भी जरूरी है। यदि बिजली की समस्या के कारण मशीन का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है तो मरीज को इसका पूरा लाभ कैसे मिलेगा?
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कोरोना काल में देश ऑक्सीजन की अहमियत और उसकी कमी से पैदा हुए संकट को देख चुका है। ऐसे में आज भी किसी गंभीर मरीज को ऑक्सीजन के लिए इस तरह संघर्ष करना पड़े, तो यह स्वास्थ्य सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। जरूरत है कि संबंधित अधिकारी ऑक्सीजन जनरेटर मशीन की तकनीकी जांच कराएं, बिजली और कम वोल्टेज की समस्या का समाधान तलाशें और आपात स्थिति के लिए वैकल्पिक व्यवस्था सुनिश्चित करें।
भगत सिंह कुशराम को राहत देने के लिए केवल मशीन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि जरूरत के समय उन्हें निर्बाध रूप से ऑक्सीजन मिल सके। अब सवाल यही है कि प्रशासन उनकी परेशानी दूर करने के लिए कब ठोस कदम उठाएगा, ताकि उन्हें हर दो से तीन दिन में ऑक्सीजन सिलेंडर भरवाने के लिए 15 किलोमीटर का मुश्किल सफर तय न करना पड़े।