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Bihar Bharat Tiwari Encounter: What did Bharat Tiwari do? Why did the Bihar Police carry out the encounter?
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Bihar Bharat Tiwari Encounter: क्या करता था भरत तिवारी? बिहार पुलिस ने क्यों किया एनकाउंटर?
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: Adarsh Jha Updated Sat, 20 Jun 2026 09:13 PM IST
"हो गई है पीर पर्वत-सी, पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।"
प्रसिद्ध कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां उस दर्द की आवाज हैं, जो व्यवस्था से निराश होकर बदलाव की मांग करती है। जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही, उसकी समस्याएं अनदेखी हो रही हैं और व्यवस्था उसके सवालों का जवाब नहीं दे रही, तब उसके भीतर एक बेचैनी जन्म लेती है। बिहार के भोजपुर के भरत भूषण तिवारी की कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस कहानी का अंत सवालों, गोलियों और विवादों के बीच हुआ।
17 जून 2026 की सुबह। भोजपुर जिले का शाहपुर थाना क्षेत्र। बिलौटी गांव अभी पूरी तरह जागा भी नहीं था कि गोलियों की आवाज ने पूरे इलाके को हिला दिया। कुछ ही घंटों बाद खबर आई कि फेसबुक लाइव पर सिस्टम से सवाल पूछने वाला 28-30 वर्षीय युवक भरत भूषण तिवारी पुलिस एनकाउंटर में घायल हुआ है और बाद में पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उसकी मौत हो गई है।
लेकिन आखिर भरत तिवारी कौन था?
एक बीएससी पास युवक। पिता बिहार पुलिस में ड्राइवर रह चुके थे। गांव के लोगों के अनुसार, पिछले एक-दो वर्षों से वह बाढ़, कटाव, सरकारी वादों और स्थानीय समस्याओं को लेकर सोशल मीडिया पर लगातार वीडियो बना रहा था। वह खुद को उन लोगों की आवाज बताता था, जिन्हें लगता था कि उनकी समस्याएं सत्ता तक नहीं पहुंच रहीं।
कहानी में पहला बड़ा मोड़ 16 जून को आया।
उस दिन भरत सोशल मीडिया पर एक पिस्टल के साथ लाइव दिखाई दिया। वीडियो तेजी से वायरल होने लगा। सूचना मिलने के बाद पुलिस उसके घर पहुंची। पुलिस और भरत के बीच करीब चार घंटे तक बातचीत चली। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही बना रहा कि जब पुलिस वहां पहुंच चुकी थी, तब उसे हिरासत में क्यों नहीं लिया गया? उसका हथियार जब्त क्यों नहीं किया गया? और आखिर पुलिस बिना किसी कार्रवाई के वापस क्यों लौट गई?
इसी सवाल ने अगले दिन की घटना को और रहस्यमय बना दिया।
17 जून की सुबह करीब 5 बजकर 10 मिनट। पुलिस के अनुसार उन्हें सटीक सूचना मिली कि भरत के पास अवैध हथियार है। स्थानीय पुलिस और विशेष बल ने उसके घर की घेराबंदी की। पुलिस का दावा है कि जैसे ही दरवाजा खुला, भरत ने तत्कालीन थानाध्यक्ष पर पिस्टल तान दी। पुलिसकर्मी पीछे हटे, जिसके बाद वह छत पर चढ़ गया और कई राउंड फायरिंग की।
पुलिस का कहना है कि आत्मरक्षा में जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी और उसके पैरों पर गोली चलाई गई।
लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है।
परिवार और ग्रामीणों का दावा है कि भरत ने फेसबुक लाइव के दौरान अपनी पिस्टल फेंक दी थी। वीडियो में उसे सरेंडर की बात करते हुए देखा गया। आरोप है कि लाइव बंद होने के बाद गोलियां चलीं और उसे कई गोलियां मारी गईं। परिवार का कहना है कि वह उस समय निहत्था था और मानसिक रूप से परेशान भी था।
यहीं से यह मामला एक सामान्य पुलिस कार्रवाई से निकलकर कथित फर्जी एनकाउंटर की बहस में बदल गया।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो ने इस विवाद को और गहरा कर दिया। पुलिस का कहना है कि भरत ने हथियार फेंकने के बाद फिर से उसे उठाने की कोशिश की थी। दूसरी ओर परिवार का आरोप है कि उसने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया था।
सवाल यह भी उठने लगा कि यदि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ था, जैसा कि पुलिस का दावा है, तो फिर उससे निपटने के लिए क्या वैकल्पिक उपाय अपनाए गए? क्या बातचीत, मनोवैज्ञानिक सहायता या गैर-घातक तरीकों का इस्तेमाल संभव था?
घटना के बाद भोजपुर में माहौल गरमा गया। ग्रामीणों ने आरा-बक्सर हाईवे जाम कर दिया। मोमबत्ती मार्च निकाले गए। कई जगह विरोध प्रदर्शन हुए और पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा।
प्रशासन ने भी तेजी दिखाई। शाहपुर थानाध्यक्ष, एक सब-इंस्पेक्टर और अन्य पुलिसकर्मियों सहित कई अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। हालांकि बताया गया कि यह कार्रवाई 16 जून की कथित लापरवाही को लेकर की गई है, न कि सीधे एनकाउंटर के लिए।
इस बीच भरत के पिता काशीनाथ तिवारी और भाई चंदन तिवारी पर भी अवैध हथियार रखने और संरक्षण देने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की गई। स्वयं भरत पर भी अवैध हथियार रखने, पुलिस पर फायरिंग और सरकारी काम में बाधा पहुंचाने के आरोप लगाए गए।
लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी।
मामले ने राजनीतिक रंग भी ले लिया। जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने वायरल वीडियो को संदेह पैदा करने वाला बताया और निष्पक्ष जांच की मांग की। पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने सवाल उठाया कि यदि आत्मसमर्पण हुआ था, तो गोली चलाने की जरूरत क्यों पड़ी। पूर्णिया सांसद पप्पू यादव ने भरत की तुलना भगत सिंह से करते हुए इसे व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वालों को दबाने का प्रयास बताया। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भी बिहार सरकार को घेरते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की।
आज, भरत भूषण तिवारी की मौत सिर्फ एक एनकाउंटर का मामला नहीं रह गई है। यह कहानी कई सवाल छोड़ गई है क्या वह एक हथियारबंद हमलावर था या व्यवस्था से निराश एक युवक? क्या पुलिस ने आत्मरक्षा में कार्रवाई की या कहीं कोई गंभीर चूक हुई? क्या वायरल वीडियो पूरी सच्चाई दिखाता है या कहानी का कोई हिस्सा अभी भी पर्दे के पीछे है?
दुष्यंत कुमार की कविता की तरह यहां भी एक पीड़ा है, एक बेचैनी है और एक मांग है सच्चाई सामने आने की। क्योंकि जब किसी मौत के बाद सवाल गोलियों से ज्यादा गूंजने लगें, तब समाज सिर्फ एक जवाब चाहता है आखिर उस सुबह बिलौटी गांव में सचमुच हुआ क्या था?
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