सीट का समीकरण: भाजपा-बसपा का गढ़ रही सीट पर 2022 में दौड़ी सपा की साइकिल, कैसा है चरथावल का चुनावी इतिहास?
मुजफ्फरनगर की चरथावल विधानसभा सीट का सियासी इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है। 1993 से यहां भाजपा या बसपा जीतते रहे। 2022 में इस सटी पर सपा को पहली बार जीत मिली। आइये जानते हैं इस सीट चुनावी इतिहास...
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विस्तार
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। हर सीट का अपना एक अलग महत्व है। जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, राज्य में राजनीतिक हलचल तेज हो रही है। राज्य की 403 विधानसभा सीटों पर अभी से चुनावी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। राज्य का इतिहास गवाह है कि यहां सत्ता की कुंजी केवल बड़े मुद्दों से ही नहीं, बल्कि हर सीट के छोटे, स्थानीय और सामाजिक समीकरणों को साधने से मिलती है। इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा सीट के इतिहास, सामाजिक ताने-बाने और उसके राजनीतिक परिदृश्य के बारे में विस्तार से हमारी खास सीरीज 'सीट का समीकरण' में बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात मुजफ्फरनगर जिले की चरथावल (Charthawal) विधानसभा सीट की। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इसका अब तक का इतिहास क्या रहा है।
पहले जानते हैं चरथावल सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश में कुल 75 जिले हैं। इन जिलों में एक जिला मुजफ्फरनगर है। जिले में कुल छह विधानसभा सीटें हैं। इनमें- बुढ़ाना, चरथावल, पुरकाजी, मुजफ्फरनगर, खतौली और मीरापुर शामिल हैं। 'सीट का समीकरण' की इस कड़ी में आज हम चरथावल विधानसभा सीट की बात करेंगे। चरथावल विधानसभा सीट का गठन वर्ष 1967 में हुआ था। इस विधानसभा क्षेत्र के पहले विधायक एच. चंद्रा थे, जिन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी।
सबसे पहले बात 2022 चुनाव की
2022 के चुनावों की बात करें तो भाजपा को चरथावल सीट से हार का सामना करना पड़ा था। 2022 के इन चुनावों में चरथावल विधानसभा सीट पर सपा के प्रत्याशी पंकज कुमार मलिक ने जीत हासिल की। इस चुनाव में सपा के पंकज कुमार को 97,363 वोट मिले थे। उन्होंने भाजपा की सपना कश्यप को हराया था। चुनाव में भाजपा की सपना कश्यप को 92,029 वोट मिले थे। वह दूसरे नंबर पर रही थीं, जबकि बसपा के सलमान सईद 25,131 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे।
चरथावल विधानसभा के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में मुस्लिम, अनुसूचित जाति (SC) और जाट मतदाताओं की भूमिका सबसे निर्णायक मानी जाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी मुस्लिम मतदाताओं की है, जो लगभग 39% हैं। इसके बाद अनुसूचित जाति (SC) के लगभग 19%, जाट लगभग 13%, कश्यप लगभग 10% और ठाकुर मतदाता लगभग 8% हैं। वहीं, बाकी अन्य जातियों के मतदाता हैं।
चरथावल विधानसभा सीट का इतिहास कैसा?
1967 में चरथावल सीट अस्तित्व में आई। तब यहां से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (SSP) को जीत मिली थी। चुनावों में एसएसपी की तरफ से एच चंद्रा ने कांग्रेस के उम्मीदवार एम सिंह को 3144 वोटों से हराकर जीत हासिल की थी।
1967 के बाद उत्तर प्रदेश में 1969 में ही दोबारा चुनाव कराने पड़े, क्योंकि 1967 के आम चुनाव के बाद बनी गठबंधन सरकार राजनीतिक अस्थिरता और दलबदल के कारण गिर गई थी।
1969 में हुए चुनावों में चरथावल सीट से भारतीय क्रांति दल (BKD) के नैन सिंह ने जीत हासिल की। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार हरीश चंद्रा को 18012 वोट से हराकर सीट पर कब्जा किया।
1974 में चरथावल सीट पर भारतीय क्रांति दल ने अपनी पकड़ बनाए रखी। इस सीट पर बीकेडी के प्रत्याशी नंदराम ने कांग्रेस के नैन सिंह को 6960 वोटों से हराया और सीट पर जीत हासिल की। हालांकि राज्य में कांग्रेस की सत्ता बनी रही।
1974 के चुनावों के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। इसके बाद जनता पार्टी की नई केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि कांग्रेस पार्टी देश की जनता का विश्वास खो चुकी है। इस आधार पर केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित कांग्रेस शासित 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर दिया और राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद राज्य में 1977 में दोबारा चुनाव हुए, जिसमें जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और राम नरेश यादव उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक सत्ता में नहीं रह सकी।
1977 का चुनाव
1977 के चुनाव में चरथावल सीट पर जनता पार्टी (जेएनपी) ने जीत हासिल की। इन चुनावों में जनता पार्टी के नंदराम ने कांग्रेस के फूल सिंह को 5674 वोटों से हराया।
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। 1980 में हुए इस चुनाव में कांग्रेस की लहर चरथावल सीट पर भी दिखी। यहां कांग्रेस के उम्मीदवार राम प्रसाद ने जनता पार्टी के राजाराम को 2400 से ज्यादा वोटों से हराया। इसके साथ ही इस सीट पर पहली बार कांग्रेस ने जीत हासिल की।
1985 का चुनाव
1980 के बाद राज्य में 1985 में चुनाव हुए। इस चुनाव में भी चरथावल सीट कांग्रेस के ही पास रही। 1985 के चुनावों में कांग्रेस के प्रत्याशी फूल सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी धरम सिंह को 28267 के भारी वोटों के अंतर से हराया और सीट पर कांग्रेस ने पकड़ बनाए रखी।
1985 के बाद राज्य में 1989 में चुनाव हुए। इस चुनाव में चरथावल सीट पर कांग्रेस के फूल सिंह सोदाई को हार का सामना करना पड़ा। 1989 के इन चुनावों में इस सीट पर पहली बार जनता दल के जीएस विनोद ने जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस के फूल सिंह को 14908 वोटों के अंतर से हराया।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में चरथावल विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा। 1991 के चुनाव में इस सीट पर जनता दल के जीएस विनोद ने दूसरी बार जीत हासिल की। इस चुनाव में दूसरे नंबर पर भाजपा प्रत्याशी शेर सिंह रहे, जबकि कांग्रेस के बुधन सिंह तीसरे नंबर पर रहे।
वहीं, 1993 और 1996 के चुनाव में चरथावल विधानसभा सीट पर भाजपा का दबदबा रहा। इस सीट पर 1993 में रणधीर सिंह ने भाजपा के प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल की। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के हरपाल सिंह गौतम को 5688 वोटों से हराया।
1996 में भी चरथावल विधानसभा सीट पर कड़े मुकाबले में भाजपा ने जीत हासिल की। इन चुनावों में भाजपा के रणधीर सिंह ने समाजवादी पार्टी (सपा) के दीपक कुमार को सिर्फ 244 वोटों से हराया।
इसके बाद राज्य में 2002 में चुनाव हुए। इन चुनावों में चरथावल विधानसभा सीट को पहली बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने अपने नाम किया। इन चुनावों में बसपा के प्रत्याशी उमा ने जीत हासिल की। उन्होंने सपा प्रत्याशी जीएस विनोद को मात्र 1245 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में चरथावल सीट पर भाजपा तीसरे और कांग्रेस चौथे नंबर पर रही।
2007 और 2012 का चुनाव
2007 और 2012 के चुनावों की बात करें तो चरथावल विधानसभा सीट पर बसपा ने अपनी पकड़ को बनाए रखा। 2007 के चुनावों में बसपा के अनिल कुमार ने भाजपा के रामपाल सिंह को 1800 से अधिक वोटों से हराया। वहीं, 2012 के चुनावों में बसपा के नूर सलीम राणा ने भाजपा के विजय कुमार को 12706 वोटों के भारी अंतर से हराया। 2012 के चुनाव में चरथावल से सपा के मुकेश कुमार चौधरी तीसरे नंबर पर रहे।
2017 का चुनाव
2017 के चुनाव की बात करें तो चरथावल विधानसभा सीट पर 1996 के बाद भाजपा ने वापसी की। इन चुनावों में भाजपा के प्रत्याशी विजय कुमार कश्यप ने जीत हासिल की। 2022 के चुनावों में चरथावल विधानसभा सीट पर सपा के प्रत्याशी पंकज कुमार मलिक ने जीत हासिल की। ये चरथावल में सपा की पहली जीत थी।