भाजपा-अकाली गठबंधन पर संशय: पीएम-सुखबीर की मुलाकात से शुरू हुई चर्चाएं, सैनी के एक बयान से ठंडा पड़ा मामला
पंजाब में भाजपा और अकाली दल काफी समय तक गठबंधन में रहे हैं। राहें अलग होने के बाद 2024 में भाजपा को पंजाब में 18.56 फीसदी वोट मिले थे, जबकि अकाली दल का वोट शेयर 13.42 फीसदी रहा। दोनों को जोड़ने पर यह करीब 32 फीसदी बैठता है।
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पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के संभावित गठबंधन की अटकलों को फिलहाल झटका लगा है। हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और पंजाब भाजपा नेतृत्व के स्पष्ट बयानों ने गठबंधन की उम्मीदों पर विराम लगा दिया है।
भाजपा ने संकेत दिया है कि वह राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पार्टी का संदेश है कि उसका असली गठबंधन पंजाब की जनता के साथ है।
यह स्थिति ऐसे समय में बनी है जब शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद गठबंधन की चर्चाओं ने जोर पकड़ा था। हालांकि, दोनों पक्षों ने मुलाकात के बाद कोई औपचारिक घोषणा नहीं की थी। 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े गठबंधन की संभावित ताकत का संकेत देते हैं।
पंजाब जैसे बहुकोणीय चुनाव में यह संभावित संयुक्त आधार दोनों दलों को कई सीटों पर मजबूत मुकाबले में ला सकता है। 2024 में भाजपा 18.56 फीसदी वोट के बावजूद एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई थी, जबकि अकाली दल 13.42 फीसदी वोट के साथ एक सीट जीत सका।
गठबंधन की अटकलों पर विराम
नायब सैनी के बयान ने गठबंधन की चर्चाओं पर फिलहाल रोक लगा दी है। इससे अकाली दल के उन नेताओं की बेचैनी बढ़ी है जो पारंपरिक गठबंधन को चुनावी तौर पर बेहतर विकल्प मानते हैं। भाजपा नेतृत्व का यह रुख पंजाब की राजनीतिक फिजा को बदल रहा है। अकाली-भाजपा गठबंधन अब केवल राजनीतिक इच्छा नहीं, बल्कि दोनों दलों के लिए चुनावी गणित और अस्तित्व का सवाल बनता दिख रहा है। भाजपा का कहना है कि उसका असली गठबंधन पंजाब की जनता के साथ है।
2024 के आंकड़े और चुनावी गणित
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और अकाली दल अलग-अलग मैदान में थे। भाजपा का वोट मुख्य रूप से शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में मजबूत रहा। वहीं, अकाली दल का पारंपरिक आधार ग्रामीण और पंथक क्षेत्रों में रहा है। यही भौगोलिक पूरकता पुराने गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत थी। 2024 में भाजपा का वोट शेयर 2019 के 9.63 फीसदी से बढ़कर 18.56 फीसदी हो गया। जबकि अकाली दल का वोट शेयर 27.45 फीसदी से घटकर 13.42 फीसदी रह गया। गठबंधन समर्थकों का तर्क है कि अलग लड़ने पर वोट बंटता है, जिसका फायदा कांग्रेस या आम आदमी पार्टी को मिलता है।
गठबंधन की आवश्यकता और ऐतिहासिक संदर्भ
अकाली दल के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सिकंदर सिंह मलूका ने कहा है कि पंजाब को बचाने और चुनाव जीतने के लिए अकाली दल और भाजपा का गठबंधन जरूरी है। उनका तर्क है कि दोनों दलों का वोट आधार एक-दूसरे का पूरक रहा है। मलूका ने संकेत दिया है कि गठबंधन का अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर होना है। अकाली-भाजपा गठबंधन के इतिहास को देखें तो दोनों दलों ने साथ मिलकर कई चुनावों में मजबूत प्रदर्शन किया है। 1997 में गठबंधन ने 117 में से 93 सीटें जीती थीं। इसके बाद 2012 में गठबंधन ने 68 सीटें जीतीं।