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Women's Reservation Bill: What is the Women's Reservation Bill, and what are the Opposition's demands?
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Women Reservation Bill: क्या है महिला आरक्षण बिल,विपक्ष की क्या है मांग?
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: Adarsh Jha Updated Fri, 10 Apr 2026 09:39 PM IST
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नारी शक्ति वंदन अधिनियम… क्या यह महिलाओं की राजनीति में भागीदारी बढ़ाने वाला ऐतिहासिक कदम है या फिर एक अधूरा वादा? 2029 से लागू करने की सरकार की नई योजना के पीछे क्या रणनीति है? 543 से 816 सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव किन राज्यों को प्रभावित करेगा? 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कितना सही है? और सबसे बड़ा सवाल क्या बिना ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा यह कानून न्यायसंगत है? आखिर विपक्ष इसे “चुनावी स्टंट” और “अधूरा बिल” क्यों बता रहा है? और क्या यह कानून सच में लोकतंत्र को संतुलित बनाएगा या नई राजनीतिक बहस छेड़ेगा? आइए इन तमाम सवालों के जावब और साथ में नारी शक्ति वंदन अधिनियम बारीकियों को इस वीडियो में समझते हैं।
भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से लाया गया नारी शक्ति वंदन अधिनियम (106वां संविधान संशोधन, 2023) एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। इस कानून का मूल उद्देश्य लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33% सीटों का आरक्षण सुनिश्चित करना है। लंबे समय से लंबित इस मुद्दे पर कानून बनने के बाद अब इसके क्रियान्वयन को लेकर नई बहस छिड़ गई है।
क्या है कानून और इसके मुख्य प्रावधान
इस अधिनियम के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी। खास बात यह है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों में भी एक-तिहाई हिस्सा महिलाओं को दिया जाएगा। यह आरक्षण फिलहाल 15 वर्षों के लिए लागू रहेगा, जिसे आगे बढ़ाया भी जा सकता है।
इसके अलावा, सीटों का रोटेशन हर परिसीमन (Delimitation) के बाद किया जाएगा, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों की महिलाओं को प्रतिनिधित्व का अवसर मिल सके।
अब ऐसे में सवाल ये उठ रहा है की सरकार का नया प्लान क्या है?
अप्रैल 2026 में केंद्र सरकार ने इस कानून को लागू करने के लिए बड़ा कदम उठाया है। 8 अप्रैल को कैबिनेट ने एक संशोधन प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसके तहत अब इस कानून को 2029 के आम चुनाव से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है।
सरकार की योजना के अनुसार:
* लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती है।
* इनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
* परिसीमन के लिए 2011 की जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल करने का प्रस्ताव है, ताकि प्रक्रिया में देरी न हो।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में “ऐतिहासिक और सभ्यतागत प्रतिबद्धता” बताया है और सभी दलों से विशेष सत्र में समर्थन की अपील की है। वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार 2029 में ही इसे लागू करना चाहती है और परिसीमन इसकी अनिवार्य शर्त है। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इसे “तीन दशक से लंबित काम को पूरा करने वाला कदम” बताया।
ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी हो जाता है की इसका प्रभाव क्या होगा?
इस कानून का सबसे बड़ा प्रभाव भारत की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के रूप में देखा जा रहा है। मौजूदा लोकसभा में केवल लगभग 14% महिला सांसद हैं, जबकि राज्यों में यह आंकड़ा करीब 10% के आसपास है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह कानून लागू होता है तो:
* संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में बड़ा इजाफा होगा।
* महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर अधिक संवेदनशील और प्रभावी नीति-निर्माण संभव होगा।
* लोकतंत्र अधिक संतुलित और समावेशी बनेगा।
सुनने में तो सब कुछ गुडी-गुडी लग रहा है तो फिर विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध? आइए समझते हैं।
विपक्ष इस बिल का सिद्धांततः समर्थन करता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन और प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है।
1. ओबीसी आरक्षण की मांग
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, “यह बिल अधूरा है, क्योंकि इसमें ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा नहीं है।” उनका कहना है कि बिना “कोटा के भीतर कोटा” के यह आरक्षण सामाजिक न्याय के लक्ष्य को पूरा नहीं करेगा।
2. सरकार की नीयत पर सवाल
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सरकार को पत्र लिखकर सर्वदलीय बैठक की मांग की और कहा कि इस मुद्दे पर स्पष्ट रोडमैप जरूरी है।
वहीं कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, “सरकार ने जनगणना और परिसीमन की शर्त जोड़कर जानबूझकर देरी की है, प्रधानमंत्री को महिलाओं से माफी मांगनी चाहिए।” उन्होंने 2026 के विशेष सत्र को “चुनावी स्टंट” करार दिया।
3. जनगणना और आधार पर विवाद
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा,
“जब गिनती ही गलत होगी तो आरक्षण कैसे सही होगा।”
उन्होंने आगे कहा, “पहले जनगणना कराई जाए, फिर महिला आरक्षण की बात उठाई जाए।”
अखिलेश यादव ने 2011 की जनगणना को आधार बनाने पर सवाल उठाते हुए कहा,
“महिला आरक्षण बिल का आधार ही निराधार है… जब भूमि में ही दोष होगा तो सच्ची फसल कैसे उगेगी।”
4. दक्षिण राज्यों की चिंता बढ़ी
विपक्ष का यह भी तर्क है कि सीटों की संख्या बढ़ाने से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारत की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर सियासी सहमति अभी दूर नजर आ रही है। सरकार इसे महिला सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसकी प्रक्रिया और मंशा पर सवाल खड़े कर रहा है।
अब 16 से 18 अप्रैल 2026 के विशेष सत्र में होने वाली बहस पर सबकी नजरें टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि यह कानून कितनी जल्दी और किस रूप में लागू हो पाता है।
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