{"_id":"6a844565e52ecb6e8c0e4c90","slug":"bangladesh-india-relations-sheikh-hasina-extradition-tarique-rahman-india-visit-2026-08-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"हसीना के प्रत्यर्पण पर अड़ा बांग्लादेश: तारिक रहमान की भारत यात्रा पर पुनर्विचार, संबंधों में क्या चुनौतियां?","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
हसीना के प्रत्यर्पण पर अड़ा बांग्लादेश: तारिक रहमान की भारत यात्रा पर पुनर्विचार, संबंधों में क्या चुनौतियां?
Tue, 18 Aug 2026 05:13 PM IST
Devesh Tripathi
आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Tue, 18 Aug 2026 05:13 PM IST
सार
बांग्लादेश और भारत के रिश्तों में तनाव के बीच ढाका ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा पर दोबारा विचार करने की बात कही है। इसके साथ शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग को भी जोड़ा गया है। बांग्लादेश में नई सरकार को कानून-व्यवस्था, ऊर्जा और अर्थव्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विपक्ष भारत से दूरी और पाकिस्तान के करीब जाने की नीति पर सवाल उठा रहा है।
विज्ञापन
भारत-बांग्लादेश संबंधों के सामने नई चुनौतियां
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बांग्लादेश ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत यात्रा पर फिर से विचार करने की बात कही है और इसे पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की अपनी मांग से जोड़ा है। दिलचस्प बात यह है कि यह घटनाक्रम उसी महीने हुआ, जब हसीना ने खुद दिसंबर में स्वदेश लौटने की इच्छा जाहिर की थी।
बांग्लादेश के आधिकारिक बयान में हसीना की इस खास टिप्पणी का कोई जिक्र नहीं किया गया। हालांकि, उसने उस ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस की आलोचना की, जिसे हसीना ने एक दूरस्थ स्थान से आयोजित किया था।
भारत के साथ क्यों बदले बांग्लादेश के संबंध?
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय द्वारा रहमान की भारत यात्रा को खारिज किए जाने से एक दिन पहले ढाका के एक वरिष्ठ नौकरशाह, जो अब एक थिंक टैंक का नेतृत्व कर रहे हैं, ने देश के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक में लिखा कि भारत के साथ संबंध "फिलहाल ऐसे मोड़ पर हैं, जहां नए नजरिए से रिश्तों पर फिर से विचार करने की स्पष्ट जरूरत है।"
विज्ञापन
बांग्लादेश एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष और अमेरिका में बांग्लादेश के पूर्व राजदूत एम. हुमायूं कबीर ने रविवार को द डेली स्टार में लिखा कि दोनों देश "भूगोल, इतिहास और आपसी निर्भरता के कारण गहराई से जुड़े हुए हैं।" उन्होंने कहा कि "भारत की नए सिरे से रुचि को समझा जा सकता है।"
बांग्लादेश क्यों पकड़ रहा अलग राह?
उन्होंने कहा, "अब बदलाव यह है कि बांग्लादेश राजनीतिक या घरेलू कारणों से किसी एक साझेदार पर जरूरत से ज्यादा निर्भर नहीं रहेगा। इसके बजाय वह अपनी जरूरतों और हितों के अनुसार सभी के साथ काम करेगा।" यह विचार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व वाली सरकार पर दबाव बनाने के लिए एक वर्ग की ओर से उठाया गया है। सरकार को सत्ता में छह महीने पूरे हो चुके हैं और उसे घरेलू स्तर पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
मंगलवार को एक अन्य मीडिया रिपोर्ट ने सरकार के सामने मौजूद स्थिति को "दिखावे में मजबूत, कामकाज में कम" बताया। रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि सरकार को कानून-व्यवस्था और ऊर्जा के मामले में लोगों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है।
बीएनपी सरकार का क्यों हो रहा विरोध?
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री की लोगों के प्रति संवेदनशील सरकार की छवि बनाने की कोशिशों को उनकी पार्टी के कुछ नेताओं के आचरण से नुकसान पहुंच रहा है। इस बीच, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाने को लेकर सरकार की आलोचना कर रहा है। उसका कहना है कि यह उस भारत के साथ संबंधों की कीमत पर किया जा रहा है, जबकि बांग्लादेश ने 1971 में पाकिस्तान के दमन से आजादी हासिल की थी।
बांग्लादेश की एक प्रमुख इस्लामी राजनीतिक पार्टी जमात का स्वतंत्रता के विरोध को लेकर विवादित अतीत रहा है। हसीना सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था, जिसे मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में हटा दिया गया। फिलहाल यह संसद में प्रमुख विपक्षी ताकत है। जमात सरकार से जुलाई चार्टर लागू करने की भी मांग कर रही है। हालांकि, इस पर अभी कानूनी और संवैधानिक चुनौतियां बनी हुई हैं।
आर्थिक मोर्चे पर क्या है बांग्लादेश की स्थिति?
इस बीच, विश्व बैंक के बांग्लादेश डेवलपमेंट अपडेट में वित्त वर्ष 2026 में आर्थिक वृद्धि घटकर 3.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि "मध्य पूर्व में लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का बांग्लादेश पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।" इसमें महंगाई बढ़ने, ऊर्जा सब्सिडी बढ़ने से राजकोषीय गुंजाइश घटने और आयात लागत बढ़ने, निर्यात कमजोर होने तथा रेमिटेंस घटने से चालू खाते पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है।
मंगलवार की एक मीडिया रिपोर्ट में भी कहा गया कि सरकार के सामने महंगाई दर कम करना, राजस्व जुटाना और ऊर्जा संकट से निपटना बड़ी चुनौतियां हैं। अर्थशास्त्री फहमीदा खातून ने लिखा, "कुल मिलाकर, BNP सरकार के छह महीने पूरे होने के बाद भी अर्थव्यवस्था ने अभी तक कोई आशाजनक प्रदर्शन नहीं दिखाया है।"
शेख हसीना के वापस लौटने से बांग्लादेश की राजनीति में आएगा क्या बदलाव?
ऐसी स्थिति में ढाका हसीना की वापसी के दौरान किसी तरह की उथल-पुथल का जोखिम नहीं उठा सकता। इससे अस्थिरता पैदा हो सकती है, निवेशक प्रभावित हो सकते हैं और बांग्लादेश की कमजोर आर्थिक सुधार प्रक्रिया बाधित हो सकती है। हसीना ने दिसंबर में स्वदेश लौटने की घोषणा बांग्लादेश में "विजय माह" के रूप में मनाए जाने वाले समय के साथ की थी। यह 1971 के युद्ध में बांग्लादेश की मुक्ति की याद में मनाया जाता है।
उन्होंने भावनात्मक अपील करते हुए स्वीकार किया था कि उन्हें जेल या यहां तक कि मौत का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय दृढ़ता और बलिदान की भावना का आह्वान करते हुए खुद को ऐसी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की, जो देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए व्यक्तिगत जोखिम उठाने को तैयार है।
सियासी तनाव बढ़ने की आशंका
राजनीतिक रूप से हसीना की वापसी सरकार और अवामी लीग के बीच तनाव बढ़ा सकती है। अवामी लीग पर राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने पर प्रतिबंध है। लेकिन उनकी गिरफ्तारी से अशांति बढ़ सकती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो सकती है। वहीं, किसी भी तरह की बातचीत को सरकार की कमजोरी के रूप में देखा जा सकता है।
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के बयान के मुताबिक, भारत और बांग्लादेश ने 2013 में प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें 2016 में संशोधन किया गया। इसके अनुच्छेद 6 में कहा गया है कि राजनीतिक अपराधों के मामलों में प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है।
भारत से क्यों कर सकता है प्रत्यर्पण से इनकार?
प्रत्यर्पण संधि में यह भी स्पष्ट किया गया है कि हत्या, गैर इरादतन हत्या, गंभीर चोट पहुंचाने वाला हमला, जान को खतरे में डालने के इरादे से विस्फोटक या आग्नेयास्त्र रखना और बहुपक्षीय संधि के दायित्वों का उल्लंघन जैसे कुछ अपराधों को "राजनीतिक अपराध" नहीं माना जाता। भारत को अब आधिकारिक तौर पर मामले में शामिल कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा। खासकर ऐसे समय में जब बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ मौत की सजा का खतरा बना हुआ है।
78 वर्षीय हसीना के सामने मौत की सजा का खतरा उस "डैमोक्लीज की तलवार" की तरह लटक रहा है। विडंबना यह है कि शेख मुजीबुर रहमान के परिवार में हसीना और उनकी बहन रेहाना ही जीवित बची हैं। 1975 में जब उनके परिवार के सदस्यों की हत्या हुई, तब दोनों विदेश में थीं।
शेख हसीना के परिवार को उतारा गया था मौत के घाट
बांग्लादेश के संस्थापक पिता के रूप में सम्मानित शेख मुजीब, उनकी पत्नी बेगम फजीलातुन्नेसा, बेटे शेख कमाल, शेख जमाल और 10 वर्षीय शेख रसेल की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। ढाका में हुए समन्वित हमलों में परिवार के अन्य सदस्यों की भी हत्या कर दी गई थी।
ऐसे में व्यावहारिक रूप से फिलहाल स्थिति पर नजर रखना और इंतजार करना ही उचित होगा।
विज्ञापन
बांग्लादेश के आधिकारिक बयान में हसीना की इस खास टिप्पणी का कोई जिक्र नहीं किया गया। हालांकि, उसने उस ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस की आलोचना की, जिसे हसीना ने एक दूरस्थ स्थान से आयोजित किया था।
विज्ञापन
भारत के साथ क्यों बदले बांग्लादेश के संबंध?
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय द्वारा रहमान की भारत यात्रा को खारिज किए जाने से एक दिन पहले ढाका के एक वरिष्ठ नौकरशाह, जो अब एक थिंक टैंक का नेतृत्व कर रहे हैं, ने देश के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक में लिखा कि भारत के साथ संबंध "फिलहाल ऐसे मोड़ पर हैं, जहां नए नजरिए से रिश्तों पर फिर से विचार करने की स्पष्ट जरूरत है।"
विज्ञापन
बांग्लादेश एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष और अमेरिका में बांग्लादेश के पूर्व राजदूत एम. हुमायूं कबीर ने रविवार को द डेली स्टार में लिखा कि दोनों देश "भूगोल, इतिहास और आपसी निर्भरता के कारण गहराई से जुड़े हुए हैं।" उन्होंने कहा कि "भारत की नए सिरे से रुचि को समझा जा सकता है।"
बांग्लादेश क्यों पकड़ रहा अलग राह?
उन्होंने कहा, "अब बदलाव यह है कि बांग्लादेश राजनीतिक या घरेलू कारणों से किसी एक साझेदार पर जरूरत से ज्यादा निर्भर नहीं रहेगा। इसके बजाय वह अपनी जरूरतों और हितों के अनुसार सभी के साथ काम करेगा।" यह विचार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के नेतृत्व वाली सरकार पर दबाव बनाने के लिए एक वर्ग की ओर से उठाया गया है। सरकार को सत्ता में छह महीने पूरे हो चुके हैं और उसे घरेलू स्तर पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है।
मंगलवार को एक अन्य मीडिया रिपोर्ट ने सरकार के सामने मौजूद स्थिति को "दिखावे में मजबूत, कामकाज में कम" बताया। रिपोर्ट में विश्लेषकों के हवाले से कहा गया कि सरकार को कानून-व्यवस्था और ऊर्जा के मामले में लोगों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना है।
बीएनपी सरकार का क्यों हो रहा विरोध?
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री की लोगों के प्रति संवेदनशील सरकार की छवि बनाने की कोशिशों को उनकी पार्टी के कुछ नेताओं के आचरण से नुकसान पहुंच रहा है। इस बीच, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन पाकिस्तान से नजदीकी बढ़ाने को लेकर सरकार की आलोचना कर रहा है। उसका कहना है कि यह उस भारत के साथ संबंधों की कीमत पर किया जा रहा है, जबकि बांग्लादेश ने 1971 में पाकिस्तान के दमन से आजादी हासिल की थी।
बांग्लादेश की एक प्रमुख इस्लामी राजनीतिक पार्टी जमात का स्वतंत्रता के विरोध को लेकर विवादित अतीत रहा है। हसीना सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था, जिसे मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में हटा दिया गया। फिलहाल यह संसद में प्रमुख विपक्षी ताकत है। जमात सरकार से जुलाई चार्टर लागू करने की भी मांग कर रही है। हालांकि, इस पर अभी कानूनी और संवैधानिक चुनौतियां बनी हुई हैं।
आर्थिक मोर्चे पर क्या है बांग्लादेश की स्थिति?
इस बीच, विश्व बैंक के बांग्लादेश डेवलपमेंट अपडेट में वित्त वर्ष 2026 में आर्थिक वृद्धि घटकर 3.9 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि "मध्य पूर्व में लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष का बांग्लादेश पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।" इसमें महंगाई बढ़ने, ऊर्जा सब्सिडी बढ़ने से राजकोषीय गुंजाइश घटने और आयात लागत बढ़ने, निर्यात कमजोर होने तथा रेमिटेंस घटने से चालू खाते पर दबाव बढ़ने की आशंका जताई गई है।
मंगलवार की एक मीडिया रिपोर्ट में भी कहा गया कि सरकार के सामने महंगाई दर कम करना, राजस्व जुटाना और ऊर्जा संकट से निपटना बड़ी चुनौतियां हैं। अर्थशास्त्री फहमीदा खातून ने लिखा, "कुल मिलाकर, BNP सरकार के छह महीने पूरे होने के बाद भी अर्थव्यवस्था ने अभी तक कोई आशाजनक प्रदर्शन नहीं दिखाया है।"
शेख हसीना के वापस लौटने से बांग्लादेश की राजनीति में आएगा क्या बदलाव?
ऐसी स्थिति में ढाका हसीना की वापसी के दौरान किसी तरह की उथल-पुथल का जोखिम नहीं उठा सकता। इससे अस्थिरता पैदा हो सकती है, निवेशक प्रभावित हो सकते हैं और बांग्लादेश की कमजोर आर्थिक सुधार प्रक्रिया बाधित हो सकती है। हसीना ने दिसंबर में स्वदेश लौटने की घोषणा बांग्लादेश में "विजय माह" के रूप में मनाए जाने वाले समय के साथ की थी। यह 1971 के युद्ध में बांग्लादेश की मुक्ति की याद में मनाया जाता है।
उन्होंने भावनात्मक अपील करते हुए स्वीकार किया था कि उन्हें जेल या यहां तक कि मौत का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने राष्ट्रीय दृढ़ता और बलिदान की भावना का आह्वान करते हुए खुद को ऐसी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की, जो देश के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए व्यक्तिगत जोखिम उठाने को तैयार है।
सियासी तनाव बढ़ने की आशंका
राजनीतिक रूप से हसीना की वापसी सरकार और अवामी लीग के बीच तनाव बढ़ा सकती है। अवामी लीग पर राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने पर प्रतिबंध है। लेकिन उनकी गिरफ्तारी से अशांति बढ़ सकती है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हो सकती है। वहीं, किसी भी तरह की बातचीत को सरकार की कमजोरी के रूप में देखा जा सकता है।
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय के बयान के मुताबिक, भारत और बांग्लादेश ने 2013 में प्रत्यर्पण संधि पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें 2016 में संशोधन किया गया। इसके अनुच्छेद 6 में कहा गया है कि राजनीतिक अपराधों के मामलों में प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है।
भारत से क्यों कर सकता है प्रत्यर्पण से इनकार?
प्रत्यर्पण संधि में यह भी स्पष्ट किया गया है कि हत्या, गैर इरादतन हत्या, गंभीर चोट पहुंचाने वाला हमला, जान को खतरे में डालने के इरादे से विस्फोटक या आग्नेयास्त्र रखना और बहुपक्षीय संधि के दायित्वों का उल्लंघन जैसे कुछ अपराधों को "राजनीतिक अपराध" नहीं माना जाता। भारत को अब आधिकारिक तौर पर मामले में शामिल कानूनी और न्यायिक प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ना होगा। खासकर ऐसे समय में जब बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ मौत की सजा का खतरा बना हुआ है।
78 वर्षीय हसीना के सामने मौत की सजा का खतरा उस "डैमोक्लीज की तलवार" की तरह लटक रहा है। विडंबना यह है कि शेख मुजीबुर रहमान के परिवार में हसीना और उनकी बहन रेहाना ही जीवित बची हैं। 1975 में जब उनके परिवार के सदस्यों की हत्या हुई, तब दोनों विदेश में थीं।
शेख हसीना के परिवार को उतारा गया था मौत के घाट
बांग्लादेश के संस्थापक पिता के रूप में सम्मानित शेख मुजीब, उनकी पत्नी बेगम फजीलातुन्नेसा, बेटे शेख कमाल, शेख जमाल और 10 वर्षीय शेख रसेल की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। ढाका में हुए समन्वित हमलों में परिवार के अन्य सदस्यों की भी हत्या कर दी गई थी।
ऐसे में व्यावहारिक रूप से फिलहाल स्थिति पर नजर रखना और इंतजार करना ही उचित होगा।