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Venezuela Attack: मादुरों को हटाने से पहले कब-कब अमेरिका ने वेनेजुएला पर तेल भंडार को लेकर दबाव बनाया

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: संध्या Updated Tue, 06 Jan 2026 02:36 PM IST
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सार

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका ने वेनेजुएला में कोई कार्यवाई की है। बल्की यह विवाद दशकों पुराना है। पहले यहां के तेल में अमेरिकी कंपनियों का बहुत दखल था। लेकिन 1976 में राष्ट्रीयकरण के बाद यह दखल कम हुआ। जिसे आज तक अमेरिका वापस पाने की कोशिश कर रहा है। 

Venezuela Attack When and how did the US pressure Venezuela over its oil reserves before remove Maduro
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और सैन्य हिरासत में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो - फोटो : ANI
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विस्तार

अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला करने के बाद  राष्ट्रपति निकोलस मदुरो को बंधक बना लिया। यह हमला वेनेजुएला की तरफ से अचानक नहीं किया गया है बल्कि, अमेरिका कई समय से अलग अलग तरीके से इसकी तैयारी कर रहा था। हमले के बाद ट्रंप ने कहा कि अब अमेरिका वेनेजुएला को ‘चलाएगा’, इसके साथ उनके तेल को भी संसाधित करेगा। 

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उन्होंने कहा कि अमेरिकी कंपनियां वेनेजुएला के खराब हो चुके तेल उद्योग को नया करने के लिए अरबों डॉलर का निवेश करने को तैयार है। वेनेजुएला के पास 303 अरब बैरल का तेल भंडार है। यह दुनिया का सबसे बड़ा तेल और सऊदी अरब से भी ज़्यादा है। यह वैश्विक भंडार का लगभग 20 प्रतिशत है।

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वेनेजुएला में ट्रंप प्रशासन की सैन्य कार्रवाई कई मायनों में अभूतपूर्व थी। लेकिन वेनेजुएला के तेल भंडार और पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज और मदुरो के साथ अमेरिका के जिस तरह के संबंध थे, उसे देखते हुए यह हैरान करने वाला नहीं था । 

Venezuela Attack When and how did the US pressure Venezuela over its oil reserves before remove Maduro
अमेरिका-वेनेजुएला टकराव - फोटो : अमर उजाला

अमेरिकी निवेश का बढ़ना और फिर खत्म होना 

वेनेजुएला दक्षिण अमेरिका के उत्तरी तट पर स्थित है। यहां की आबादी लगभग 30 अरब है। यह कैलिफोर्निया से लगभग दोगुना है।  20वीं सदी की शुरु में तेल भंडार के कारण यह दक्षिण अमेरिका का सबसे अमीर देश थी। 

अमेरिकी कंपनियों सहित विदेशी कंपनियों ने वेनेजुएला के तेल के विकास में भारी निवेश किया। देश की राजनीति में भी उनका बड़ा हाथ था। अमेरिका वेनेजुएला के तेल भंडार को खुद नियंत्रित करना चाहता था। लेकिन मना करने के बावजूद वहां के नेताओं ने मुख्य निर्यात संसाधन को नियंत्रित करना शुरू किया। 1960 में पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन (OPEC) का गठन हुआ। इसमें वेनेजुएला प्रमुख देश बना और 1976 में अपने अधिकांश तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसका अमेरिका की कंपनियों पर बुरा असर पड़ा। इसने ट्रंप प्रशासन के हाल के दावों को हवा दी कि वेनेजुएला ने अमेरिकी तेल "चुराया" है।

इस राष्ट्रीयकरण के बाद वेनेजुएला को आर्थिक तौर पर कोई फायदा नहीं हुआ। तेल उद्योग के कुप्रबंधन के कारण 1988 में कर्ज संकट और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का हस्तक्षेप हुआ। फरवरी 1989 में काराकास में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे, और सरकार ने विद्रोह को कुचलने के लिए सेना भेज दी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अनुमानित 300 लोग मारे गए। 

इसके बाद वेनेजुएला के लोग दो वर्गों में बंट गया। अमीर लोग अमेरिका के साथ काम करना चाहते थे। वहीं मजदूर वर्ग अमेरिका से आजादी चाहता था। इस बंटवारे ने तब से वेनेजुएला की राजनीति को परिभाषित किया है।

 

शावेज का सत्ता में आना और गरीबों के लिए काम करना

ह्यूगो शावेज देश के राष्ट्रपति बनने से पहले मिलिट्री ऑफिसर थे। 1980 के दशक में उन्होंने सेना के अंदर समाजवादी गुट बनाया। उन्होंने सरकार के खिलाफ जोशीले भाषण देना शुरू किया। 1989 में सरकार विरोधी दंगो के बाद उन्होंने सरकार गिराने की योजना बनाना शुरू कर दिया। फरवरी 1992 में अमेरिका का समर्थन करने वाले राष्ट्रपति कार्लोस एंड्रेस पेरेज को हटाने की असफल कोशिश की। शावेज को दो साल के लिए जेल हुई, लेकिन 1998 में वह एक समाजवादी क्रांतिकारी प्लेटफॉर्म पर राष्ट्रपति पद के प्रमुख उम्मीदवार के तौर पर उभरे।

शावेज वेनेजुएला और लैटिन अमेरिकी राजनीति दोनों में एक बड़ी हस्ती बन गए। शावेज न सिर्फ वेनेजुएला में तेल से होने वाली कमाई का इस्तेमाल खाने, स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए सरकारी कार्यक्रमों को सब्सिडी देने के लिए जाने जाते थे। शावेज ने क्यूबा को अरबों डॉलर का तेल दिया, जिसके बदले में हजारों क्यूबा के डॉक्टर वेनेजुएला के हेल्थ क्लीनिक में काम करते थे। 

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वेनेजुएला के घटनाक्रम से भारत को हो सकता है फायदा - फोटो : पीटीआई

अमेरिका पर तख्तापलट भड़काने का आरोप है

अमेरिका शावेज का समर्थक नहीं था। अप्रैल 2002 में हिए तख्तापलट के कारण शावेज को कुछ समय के लिए सत्ता से हटना पड़ा। इसके बाद नए राष्ट्रपति, बिजनेसमैन पेड्रो कारमोना को नियुक्त किया। शावेज को गिरफ्तार कर लिया गया। अमेरिका के बुश प्रशासन ने तुरंत कारमोना को राष्ट्रपति के रूप में मान्यता दे दी। 

हालांकि, सिर्फ़ दो दिन बाद ही शावेज अपने लाखों समर्थकों के दम पर सत्ता में वापस आ गए। बुश प्रशासन तख्तापलट करवाने के आरोप में जांच के घेरे में आ गई। 

हालांकि अमेरिका ने इसमें शामिल होने से इनकार किया, लेकिन यह सवाल उठता रहा कि क्या अमेरिका को तख्तापलट की पहले से जानकारी थी। 

मादुरो पर पर दबाव बनाने रखा जारी 

मादुरो 2000 में सदन के लिए चुने गए और जल्दी ही शावेज के करीबी बन गए। वह 2012 में उपराष्ट्रपति बने और अगले साल शावेज की मौत के बाद, बहुत कम अंतर से अपना पहला चुनाव जीता। लेकिन मादुरो शावेज के जैसे नेता नहीं बन पाए। उन्हें मज़दूर वर्ग, सेना या पूरे क्षेत्र में ज्यादा समर्थन नहीं मिला। वेनेजुएला की आर्थिक स्थिति खराब हो गई, और महंगाई आसमान छूने लगी।

इसी बीच अमेरिकी सरकारें मादुरो पर दबाव डालती रहीं। ओबामा और ट्रंप के पहले कार्यकाल में वेनेजुएला पर प्रतिबंध लगाए गए। अमेरिका और उसके सहयोगियों ने 2018 के चुनाव में और फिर 2024 में मादुरो की जीत को मानने से इनकार कर दिया।

देखते ही देखते वेनेजुएला कई देशों से अलग हो गया। सरकार के पास चीन को तेल बेचने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। मादुरो ने ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान तख्तापलट और हत्या की कोशिश का भी आरोप लगया। 

अब, ट्रंप एक खुले ऑपरेशन में मादुरो को हटाने में समफल हुए हैं।  जिसमें इनकार करने की कोई कोशिश नहीं की गई। दावा किया जा रहा है कि जब तक अमेरिका का इस देश में आर्थिक हित है, वेनेजुएला की राजनीति में इसका दखल जारी रहेगा।

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