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सूरज की ताकत धरती पर लाने की कोशिश में जर्मनी की डम्ब मशीन, सफलता दिलाएगी असीमित और सस्ती बिजली
अमर उजाला नेटवर्क, म्यूनिख/लंदन।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 04 May 2026 04:23 AM IST
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सार
स्टेलरेटर की सबसे बड़ी चुनौती उसके जटिल मैग्नेट हैं। ये मैग्नेट खास स्टील से बनते हैं और इन्हें बहुत सटीक आकार में ढालना पड़ता है। सियोर्टिनो मानते हैं कि पहला मैग्नेट बनाना बहुत महंगा और कठिन होगा, लेकिन अगर उत्पादन तेज और सस्ता किया जा सके तभी यह तकनीक व्यावहारिक बन पाएगी।
फ्यूजन ऊर्जा
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
दुनियाभर के वैज्ञानिक एक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं जो अगर सफल हो गई तो बिजली लगभग असीमित, सस्ती और बिना प्रदूषण के मिल सकती है। इसे कहा जाता है न्यूक्लियर फ्यूजन यानी वही प्रक्रिया जिससे सूरज ऊर्जा पैदा करता है। जर्मनी की स्टार्टअप कंपनी प्रोक्सिमा फ्यूजन एक अनोखा प्रयोग कर रही है।
कंपनी के सीईओ फ्रांसेस्को सियोर्टिनो इसे एक डम्ब मशीन कहते हैं। ऐसी मशीन जो एक बार सही ढंग से बन जाए तो माइक्रोवेव की तरह आसानी से चल सके। न्यूक्लियर फ्यूजन में हाइड्रोजन के छोटे-छोटे कण आपस में जुड़ते हैं और इस प्रक्रिया में बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। यही प्रक्रिया सूरज के भीतर चलती है। पृथ्वी पर इसे दोहराना बेहद कठिन है, क्योंकि इसके लिए ईंधन को बहुत ज्यादा तापमान पर गर्म करना पड़ता है, जिससे वह प्लाज्मा बन जाता है।
प्लाज्मा गैस जैसी एक अत्यधिक गर्म अवस्था होती है, जिसे नियंत्रित करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार अब तक ज्यादातर फ्यूजन प्रोजेक्ट टोकामक नाम की मशीन पर आधारित रहे हैं। यह डोनट के आकार की मशीन होती है यानी इसकी संरचना एक गोल छल्ले जैसी होती है, जिसके अंदर प्लाज्मा घूमता रहता है और शक्तिशाली मैग्नेट प्लाज्मा को नियंत्रित करते हैं। लेकिन प्रोक्सिमा फ्यूजन एक अलग और ज्यादा जटिल डिजाइन पर काम कर रही है, जिसे स्टेलरेटर कहा जाता है।
सबसे बड़ी चुनौती, जटिल मैग्नेट और लागत
स्टेलरेटर की सबसे बड़ी चुनौती उसके जटिल मैग्नेट हैं। ये मैग्नेट खास स्टील से बनते हैं और इन्हें बहुत सटीक आकार में ढालना पड़ता है। सियोर्टिनो मानते हैं कि पहला मैग्नेट बनाना बहुत महंगा और कठिन होगा, लेकिन अगर उत्पादन तेज और सस्ता किया जा सके तभी यह तकनीक व्यावहारिक बन पाएगी। कंपनी 2028–29 तक बड़े पैमाने पर मैग्नेट बनाने की तैयारी कर रही है।
यूरोप की बढ़त व भविष्य की दिशा
बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना में जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों का दशकों का अनुभव काम आ रहा है। सियोर्टिनो का मानना है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के कारण यूरोप इस रेस में आगे निकल सकता है। वहीं, ब्रिटेन के एसटीईपी प्रोजेक्ट से जुड़े रयान रैम्से कहते हैं कि सवाल यह नहीं है कि कौन-सी तकनीक दिलचस्प है, बल्कि यह है कि कौन वास्तव में बिजली उत्पादन कर पाएगी।
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कंपनी के सीईओ फ्रांसेस्को सियोर्टिनो इसे एक डम्ब मशीन कहते हैं। ऐसी मशीन जो एक बार सही ढंग से बन जाए तो माइक्रोवेव की तरह आसानी से चल सके। न्यूक्लियर फ्यूजन में हाइड्रोजन के छोटे-छोटे कण आपस में जुड़ते हैं और इस प्रक्रिया में बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। यही प्रक्रिया सूरज के भीतर चलती है। पृथ्वी पर इसे दोहराना बेहद कठिन है, क्योंकि इसके लिए ईंधन को बहुत ज्यादा तापमान पर गर्म करना पड़ता है, जिससे वह प्लाज्मा बन जाता है।
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प्लाज्मा गैस जैसी एक अत्यधिक गर्म अवस्था होती है, जिसे नियंत्रित करना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार अब तक ज्यादातर फ्यूजन प्रोजेक्ट टोकामक नाम की मशीन पर आधारित रहे हैं। यह डोनट के आकार की मशीन होती है यानी इसकी संरचना एक गोल छल्ले जैसी होती है, जिसके अंदर प्लाज्मा घूमता रहता है और शक्तिशाली मैग्नेट प्लाज्मा को नियंत्रित करते हैं। लेकिन प्रोक्सिमा फ्यूजन एक अलग और ज्यादा जटिल डिजाइन पर काम कर रही है, जिसे स्टेलरेटर कहा जाता है।
सबसे बड़ी चुनौती, जटिल मैग्नेट और लागत
स्टेलरेटर की सबसे बड़ी चुनौती उसके जटिल मैग्नेट हैं। ये मैग्नेट खास स्टील से बनते हैं और इन्हें बहुत सटीक आकार में ढालना पड़ता है। सियोर्टिनो मानते हैं कि पहला मैग्नेट बनाना बहुत महंगा और कठिन होगा, लेकिन अगर उत्पादन तेज और सस्ता किया जा सके तभी यह तकनीक व्यावहारिक बन पाएगी। कंपनी 2028–29 तक बड़े पैमाने पर मैग्नेट बनाने की तैयारी कर रही है।
यूरोप की बढ़त व भविष्य की दिशा
बीबीसी रिपोर्ट के अनुसार इस परियोजना में जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों का दशकों का अनुभव काम आ रहा है। सियोर्टिनो का मानना है कि मैन्युफैक्चरिंग क्षमता के कारण यूरोप इस रेस में आगे निकल सकता है। वहीं, ब्रिटेन के एसटीईपी प्रोजेक्ट से जुड़े रयान रैम्से कहते हैं कि सवाल यह नहीं है कि कौन-सी तकनीक दिलचस्प है, बल्कि यह है कि कौन वास्तव में बिजली उत्पादन कर पाएगी।
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