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Oxford University and Astrazeneca Covid-19 vaccine has shown promising results, here is all you need to know
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चिम्पैंजी में पाए जाने वाले वायरस में बदलाव कर बनी वैक्सीन, जानें कोरोना की दवा के बारे में सब कुछ
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, लंदन
Published by: गौरव पाण्डेय
Updated Tue, 21 Jul 2020 10:34 AM IST
सार
दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और ब्रिटेन की प्रमुख फार्मास्यूटिकल कंपनी एस्ट्राजेनेका ने मिल कर कोरोना वायरस की एक संभावित वैक्सीन विकसित की है। इस वैक्सीन का मानव परीक्षण चल रहा है और शुरुआती दौर में इसके काफी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। इन परिणामों के आधार पर इस संभावित वैक्सीन को इस वायरस की काट समझा जाने लगा है। आइए जानते हैं इस वैक्सीन के बारे में...
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : पिक्साबे
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कोरोना की दवा की तलाश में सोमवार को एक उम्मीद की किरण दिखाई दी। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने वैक्सीन के शुरुआती ट्रायल में पाया कि यह दवा असरदार है। इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं।
वैज्ञानिकों ने कहा कि ट्रायल में पाया गया कि वैक्सीन ने 18 से 55 वर्ष की आयु के लोगों में दोहरी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न की है। इस तरह के शुरुआती परीक्षणों को आमतौर पर केवल सुरक्षा का मूल्यांकन करने के लिए किया जाता है, लेकिन इस मामले में विशेषज्ञ यह भी देखना चाह रहे थे कि इसकी किस तरह की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया होगी।
ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने पहली बार अप्रैल में लगभग 1,000 लोगों में वैक्सीन का परीक्षण शुरू किया था, जिनमें से आधे लोगों को वैक्सीन लगाई गई थी। सोमवार को इस वैक्सीन के ट्रायल के परिणामों को लेकर आई रिपोर्ट में कहा गया है कि वैक्सीन ने शुरुआती परीक्षण में लोगों में सुरक्षात्मक प्रतिरोधक प्रतिक्रिया उत्पन्न की है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन बीमारी और उसके प्रसार को कम करने के लिए बनाई गई है। आइए जानते हैं इस वैक्सीन से जुड़े कुछ प्रमुख तथ्य
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फार्मा कंपनी ने वैज्ञानिकों के साथ मिलकर किया विकसित
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
वैक्सीन को एजेडडी1222 ( AZD1222 ) नाम दिया गया है। इसे फार्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर विकसित कर रही है।
इस वैक्सीन का पहला मानव परीक्षण (ह्यूमन ट्रायल) यह संकेत करता है कि यह स्वस्थ वॉलंटियर पर प्रयोग के लिए सुरक्षित है।
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चिम्पैंजी के वायरस में किए गए जेनेटिक बदलाव
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coronavirus vaccine China
- फोटो : Social Media
इस वैक्सीन को चिम्पैंजी में सामान्य सर्दी जुकाम का कारण बनने वाले वायरस में जेनेटिक बदलाव लाकर तैयार किया गया है।
इसे वैज्ञानिक भाषा में वायरल वेक्टर कहते हैं। इसमें इस तरह बदलाव लाया गया है कि यह लोगों को संक्रमित न कर सके और कोरोना वायरस से लड़ने की क्षमता पैदा कर सके।
एंटीबॉडी और टी-सेल को करती है मजबूत
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : amar ujala
मनुष्य के इम्यून सिस्टम में रोगजनकों को खोजने और उन्हें खत्म करने के लिए दोहरी व्यवस्था होती है. एंटीबॉडी और टी-सेल। यह वैक्सीन दोनों पक्षों को मजबूत करती है।
एंटीबॉडी को निष्क्रिय करने से जो परमाणु उत्पन्न होते हैं वो संक्रमण रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इस वैक्सीन से शरीर की टी-कोशिकाओं में एक प्रतिक्रिया होती है जो कोरोना वायरस से लड़ने में मदद करती है।
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कई देशों में चल रहे ट्रायल
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Amar Ujala
दुनिया भर में चर्चा का केंद्र बना इस वैक्सीन का ट्रायल उन्नत चरण में है। ब्रिटेन के लगभग 10,000 लोगों के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील में इस वैक्सीन के ट्रायल किए जा रहे हैं।
अगर वैक्सीन का अंतिम ट्रायल भी सफल रहता है तो ऑक्सफोर्ड ने एस्ट्राजेनेका और ब्रिटिश सरकार के साथ वैक्सीन के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए करार किया है। एस्ट्राजेनेका पहले ही दो अरब खुराक बनाने की प्रतिबद्धता जता चुकी है।
इस वैक्सीन के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए वैश्विक भागीदारों में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भी शामिल है। हालांकि इसके लिए नियामक की मंजूरी जरूरी होगी।
एस्ट्राजेनेका ने दुनियाभर की सरकारों के साथ इस वैक्सीन की उपलब्धता के लिए करार किए हैं। कंपनी ने रहा है कि लाखों लोगों की जान लेने वाली इस महामारी के इलाज के लिए बनी वैक्सीन को लेकर वह मुनाफा कमाने की ओर ध्यान नहीं देंगे।
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