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एक्सप्लेनर: मौत के इंजेक्शन दो बार लगने के बावजूद मृत्युदंड पाई महिला जिंदा बची, यह कैसे मुमकिन; अब आगे क्या?
Thu, 01 Oct 2026 04:07 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 01 Oct 2026 04:07 PM IST
सार
अमेरिका में क्रिस्टा पाइक को दो लीथल इंजेक्शन देने के बाद भी जान बच गई। जानें यह वैज्ञानिक व मेडिकल विफलता कैसे हुई, कानूनी विकल्प क्या हैं और भारत में सुप्रीम कोर्ट का इस पर क्या रुख है।
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लीथल इंजेक्शन से मृत्युदंड देने पर भारत में भी हुई है चर्चा।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अमेरिका में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहां बुधवार रात को मृत्युदंड पाई एक महिला की सजा को अंजाम देने में बड़ी गड़बड़ हो गई और उसे एक के बाद एक मौत के इंजेक्शन (लीथल इंजेक्शन) की दो डोज दिए जाने के बाद भी उसकी जान बच गई। जिस महिला क्रिस्टा पाइक की सजा को अंजाम दिया गया था, उस पर 31 साल पहले अपनी एक सहपाठी की हत्या का आरोप लगा था। अलग-अलग अदालतों ने इस मामले में सुनवाई की और आखिरकार टेनेसी राज्य को महिला की मौत की सजा के साथ आगे बढ़ने का आदेश दिया।
हालांकि, अब महिला के मौत के इंजेक्शन से बचने के बाद अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया में इस मामले की चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल, मौत के इंजेक्शन को मृत्युदंड का देने का सबसे आसान तरीका माना जाता रहा है। हालांकि, अब अमेरिका में इस घटना के बाद सजा के तरीके पर सवाल उठने लगे हैं।
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हालांकि, अब महिला के मौत के इंजेक्शन से बचने के बाद अमेरिका से लेकर पूरी दुनिया में इस मामले की चर्चा शुरू हो गई है। दरअसल, मौत के इंजेक्शन को मृत्युदंड का देने का सबसे आसान तरीका माना जाता रहा है। हालांकि, अब अमेरिका में इस घटना के बाद सजा के तरीके पर सवाल उठने लगे हैं।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर मौत के इंजेक्शन क्या होते हैं, जिन्हें मृत्युदंड की सजा पाए लोगों को दिया जाता है? यह किस तरह असर करते हैं? अमेरिकी महिला कैसे इन लीथल इंजेक्शन की दो डोज दिए जाने के बावजूद बच गई? क्या पहले कभी ऐसा हुआ है? मृत्युदंड की सजा पाया कोई व्यक्ति अगर इससे बच जाता है तो उसकी सजा का क्या होगा? भारत में इस तरह से मृत्युदंड की सजा देने पर क्या कहा गया है? आइये जानते हैं...
मौत का इंजेक्शन मृत्युदंड की सजा पाए कैदियों को दी जाने वाली एक चिकित्सा और रासायनिक विधि है। इसमें कैदी के शरीर में नस (आईवी लाइन) के माध्यम से घातक दवाओं की खुराक दी जाती है।
पेंटोबार्बिटल: अमेरिका के कई राज्यों (जैसे टेनेसी) में सिंगल-ड्रग प्रोटोकॉल के तहत केवल पेंटोबार्बिटल की भारी खुराक का इस्तेमाल किया जाता है।
सोडियम थायोपेंटल और अन्य दवाइयां: इससे पहले तीन दवाओं के संयोजन या सोडियम थायोपेंटल जैसी बेहोशी पैदा करने वाली (सेडेटिव) दवाओं का इस्तेमाल भी किया जाता रहा है।
क्या होते हैं मृत्युदंड की सजा पाए लोगों को दिए जाने वाले मौत के इंजेक्शन?
मौत का इंजेक्शन मृत्युदंड की सजा पाए कैदियों को दी जाने वाली एक चिकित्सा और रासायनिक विधि है। इसमें कैदी के शरीर में नस (आईवी लाइन) के माध्यम से घातक दवाओं की खुराक दी जाती है।
1. इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयां
पेंटोबार्बिटल: अमेरिका के कई राज्यों (जैसे टेनेसी) में सिंगल-ड्रग प्रोटोकॉल के तहत केवल पेंटोबार्बिटल की भारी खुराक का इस्तेमाल किया जाता है।
सोडियम थायोपेंटल और अन्य दवाइयां: इससे पहले तीन दवाओं के संयोजन या सोडियम थायोपेंटल जैसी बेहोशी पैदा करने वाली (सेडेटिव) दवाओं का इस्तेमाल भी किया जाता रहा है।
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लीथल इंजेक्शन की केमिकल संरचना।
- फोटो : अमर उजाला
2. यह प्रक्रिया कैसे काम करती है?
- कैदी को एक स्ट्रेचर पर बांधा जाता है और उसकी नस में आईवी कैथेटर लगाया जाता है। सिरिंज के जरिए घातक रसायन को सीधे रक्तप्रवाह में पहुंचाया जाता है।
- घातक रसायन रक्तप्रवाह में पहुंचते ही सेंट्रल नर्वस सिस्टम को पूरी तरह से दबा देता है, जिससे व्यक्ति अचेत हो जाता है।
- दवा का पर्याप्त स्तर दिमाग के सांस नियंत्रित करने वाले केंद्र को निष्क्रिय कर देता है। इससे सांस लेने की प्रक्रिया रुक जाती है।
- ऑक्सीजन की कमी और दवा के तेज असर से दिल काम करना बंद कर देता है, जिसे कार्डियोवस्कुलर फेलियर कहते हैं और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।
- अगर पहली खुराक के बाद कैदी की मौत नहीं होती, तो उसे प्रोटोकॉल के तहत बैकअप सिरिंज (दूसरी खुराक) दी जाती है।
अमेरिकी महिला कैसे इन लीथल इंजेक्शन की दो डोज दिए जाने के बावजूद बच गई?
क्रिस्टा पाइक को पेंटोबार्बिटल की एक के बाद एक दो खुराकें दिए जाने के बाद भी वे जिंदा बच गईं, जिसके चलते उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचा गया है। टेनेसी के गवर्नर बिल ली ने इस घटना की विस्तृत स्वतंत्र जांच के आदेश दिए हैं और अंतिम आधिकारिक वजह स्थापित होना बाकी है। हालांकि, अमेरिकी मीडिया संस्थानों ने इसके पीछे कुछ आशंकाएं जताई हैं...1. नस (आईवी लाइन) की नाकामी
क्रिस्टा पाइक के वकीलों ने लीथल इंजेक्शन लगाए जाने से पहले ही चेतावनी दी थी कि उनकी नसें बहुत पतली हैं। माना जा रहा है कि प्रक्रिया के दौरान नस फटने या आईवी लाइन सही से न बैठने के कारण दवा सीधे मुख्य रक्तप्रवाह में प्रवेश नहीं कर सकी।
2. रक्त में दवा का अपर्याप्त स्तर
एमोरी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और मेडिकल एक्सपर्ट डॉ. जोएल जिवोट के मुताबिक, नस में गड़बड़ी की वजह से पेंटोबार्बिटल दवा पाइक के रक्तप्रवाह में उस स्तर तक पहुंच ही नहीं पाई, जो सांस रोकने और कार्डियोवस्कुलर फेलियर पैदा करने के लिए जरूरी होता है।
3. दवा की गुणवत्ता और क्षमता पर सवाल
क्रिस्टा पाइक की कानूनी टीम ने यह सवाल भी उठाया कि इस्तेमाल की गई पेंटोबार्बिटल दवा डिग्रेड या अपनी क्षमता खो चुकी हो सकती है, जिससे दो खुराक मिलने के बावजूद क्रिस्टा पूरी तरह अचेत नहीं हुईं।
4. सरकारी प्रोटोकॉल की सीमा
टेनेसी राज्य के नियमों के तहत पहली खुराक के विफल होने पर केवल एक बैकअप खुराक (दूसरी सिरिंज) देने का प्रावधान है। जब दोनों खुराक देने के बाद भी पाइक सांस लेती रहीं, खर्राटे भरती रहीं और उनका दिल धड़कता रहा, तो लिखित नियमों में आगे का कोई कानूनी कदम दर्ज नहीं था।
इसके चलते उनके मृत्युदंड की सजा को रोककर उन्हें तुरंत अस्पताल में आपातकालीन जीवनरक्षक देखभाल के लिए भेजा गया।
लीथल इंजेक्शन की प्रक्रिया में गड़बड़ी की वजह से कैदियों के जीवित बचने के मामले पहले भी सामने आए हैं, लेकिन क्रिस्टा पाइक का मामला ऐतिहासिक रूप से बिल्कुल अलग है। क्रिस्टा पाइक के मामले से पहले कम से कम सात कैदी ऐसे रहे हैं, जिन्हें लीथल इंजेक्शन देने से पहले इसकी प्रक्रिया को बीच में ही रोकना पड़ा, क्योंकि मेडिकल टीम को दवा देने के लिए उपयुक्त नस नहीं मिल सकी।
क्रिस्टा पाइक की कानूनी टीम ने यह सवाल भी उठाया कि इस्तेमाल की गई पेंटोबार्बिटल दवा डिग्रेड या अपनी क्षमता खो चुकी हो सकती है, जिससे दो खुराक मिलने के बावजूद क्रिस्टा पूरी तरह अचेत नहीं हुईं।
4. सरकारी प्रोटोकॉल की सीमा
टेनेसी राज्य के नियमों के तहत पहली खुराक के विफल होने पर केवल एक बैकअप खुराक (दूसरी सिरिंज) देने का प्रावधान है। जब दोनों खुराक देने के बाद भी पाइक सांस लेती रहीं, खर्राटे भरती रहीं और उनका दिल धड़कता रहा, तो लिखित नियमों में आगे का कोई कानूनी कदम दर्ज नहीं था।
इसके चलते उनके मृत्युदंड की सजा को रोककर उन्हें तुरंत अस्पताल में आपातकालीन जीवनरक्षक देखभाल के लिए भेजा गया।
क्या पहले भी लीथल इंजेक्शन से बच गए हैं मृत्युदंड पाए लोग?
लीथल इंजेक्शन की प्रक्रिया में गड़बड़ी की वजह से कैदियों के जीवित बचने के मामले पहले भी सामने आए हैं, लेकिन क्रिस्टा पाइक का मामला ऐतिहासिक रूप से बिल्कुल अलग है। क्रिस्टा पाइक के मामले से पहले कम से कम सात कैदी ऐसे रहे हैं, जिन्हें लीथल इंजेक्शन देने से पहले इसकी प्रक्रिया को बीच में ही रोकना पड़ा, क्योंकि मेडिकल टीम को दवा देने के लिए उपयुक्त नस नहीं मिल सकी।
अमेरिका में मृत्युदंड के आंकड़े।
- फोटो : अमर उजाला
टोनी कारुथर्स (2026)
टेनेसी में ही मई 2026 में एग्जीक्यूशन टीम एक घंटे से ज्यादा तक कोशिश करने के बाद भी जरूरी बैकअप आईवी लाइन नहीं लगा पाई थी, जिसके बाद मौत की सजा टाल दी गई।
रोमेल ब्रूम (2009)
ओहायो में दो घंटे तक नस ढूंढने के प्रयास में नाकाम होने के बाद मौत की सजा का कार्यान्वयन रोक दिया गया था। वह 21वीं सदी में लीथल इंजेक्शन की कोशिश से बचने वाले पहले व्यक्ति बने थे।
थॉमस क्रीच (2024)
अमेरिका के इदाहो राज्य में नस न मिलने के कारण प्रक्रिया स्थगित की गई।
केनेथ स्मिथ और एलन मिलर
अलाबामा में लीथल इंजेक्शन के दौरान नसों की समस्या के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी थी। बाद में 2024 में अन्य तरीकों को मौत की सजा के लिए लागू किया गया।।
डोयले हैम (2018) और अल्वा कैंपबेल
नसों की पहुंच न मिलने के कारण इनके मृत्युदंड की तारीख टाल दी गई थी और बाद में दोनों की प्राकृतिक कारणों से मृत्यु हुई।
टेनेसी में ही मई 2026 में एग्जीक्यूशन टीम एक घंटे से ज्यादा तक कोशिश करने के बाद भी जरूरी बैकअप आईवी लाइन नहीं लगा पाई थी, जिसके बाद मौत की सजा टाल दी गई।
रोमेल ब्रूम (2009)
ओहायो में दो घंटे तक नस ढूंढने के प्रयास में नाकाम होने के बाद मौत की सजा का कार्यान्वयन रोक दिया गया था। वह 21वीं सदी में लीथल इंजेक्शन की कोशिश से बचने वाले पहले व्यक्ति बने थे।
थॉमस क्रीच (2024)
अमेरिका के इदाहो राज्य में नस न मिलने के कारण प्रक्रिया स्थगित की गई।
केनेथ स्मिथ और एलन मिलर
अलाबामा में लीथल इंजेक्शन के दौरान नसों की समस्या के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी थी। बाद में 2024 में अन्य तरीकों को मौत की सजा के लिए लागू किया गया।।
डोयले हैम (2018) और अल्वा कैंपबेल
नसों की पहुंच न मिलने के कारण इनके मृत्युदंड की तारीख टाल दी गई थी और बाद में दोनों की प्राकृतिक कारणों से मृत्यु हुई।
क्रिस्टा पाइक का मामला क्यों अलग?
डेथ पेनाल्टी इंफॉर्मेशन सेंटर (डीपीआईसी) के मुताबिक, घातक दवा की खुराक पेंटोबार्बिटल शरीर में दिए जाने के बाद भी किसी कैदी का जीवित बच जाना अभूतपूर्व और अनूठा मामला है। पूर्व के सभी मामलों में निष्पादन टीम दवा दिए जाने से पहले ही नस न मिलने पर रुक गई थी। क्रिस्टा पाइक पहला ऐसा मामला है जहां प्रोटोकॉल के तहत घातक दवा की दो पूरी खुराकें (दोनों सिरिंज) दिए जाने के बाद भी कैदी जीवित रहा।
अगर मृत्युदंड पाए किसी व्यक्ति को सजा देने के दौरान कुछ गड़बड़ी हो जाती है या कोशिश विफल हो जाता है और वह बच जाता है, तो उसकी सजा और कानूनी स्थिति भी असर पड़ता है।
मृत्युदंड की सजा खुद समाप्त नहीं होती
मौत की सजा का एग्जीक्यूशन नाकाम होने या इस्तेमाल किए गए तरीके में गड़बड़ी आने से कैदी की मूल मृत्युदंड की सजा कानूनी रूप से रद्द या खत्म नहीं होती है। कैदी कानूनी तौर पर डेथ रो यानी मौत की सजा पर ही बना रहता है।
डेथ पेनाल्टी इंफॉर्मेशन सेंटर (डीपीआईसी) के मुताबिक, घातक दवा की खुराक पेंटोबार्बिटल शरीर में दिए जाने के बाद भी किसी कैदी का जीवित बच जाना अभूतपूर्व और अनूठा मामला है। पूर्व के सभी मामलों में निष्पादन टीम दवा दिए जाने से पहले ही नस न मिलने पर रुक गई थी। क्रिस्टा पाइक पहला ऐसा मामला है जहां प्रोटोकॉल के तहत घातक दवा की दो पूरी खुराकें (दोनों सिरिंज) दिए जाने के बाद भी कैदी जीवित रहा।
मृत्युदंड की सजा पाया कोई व्यक्ति अगर इससे बच जाता है तो उसकी सजा का क्या होगा?
अगर मृत्युदंड पाए किसी व्यक्ति को सजा देने के दौरान कुछ गड़बड़ी हो जाती है या कोशिश विफल हो जाता है और वह बच जाता है, तो उसकी सजा और कानूनी स्थिति भी असर पड़ता है।
मृत्युदंड की सजा खुद समाप्त नहीं होती
मौत की सजा का एग्जीक्यूशन नाकाम होने या इस्तेमाल किए गए तरीके में गड़बड़ी आने से कैदी की मूल मृत्युदंड की सजा कानूनी रूप से रद्द या खत्म नहीं होती है। कैदी कानूनी तौर पर डेथ रो यानी मौत की सजा पर ही बना रहता है।
दोबारा एग्जीक्यूशन का प्रयास
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 1947 के ऐतिहासिक निर्णय- लुइसियाना एक्स फ्रांसिस बनाम रेसवेबर के मुताबिक, अगर सजा का कार्यान्वयन किसी मशीनी गड़बड़ी या अनपेक्षित दुर्घटना के कारण रुका है, तो राज्य दोबारा सजा देने की कोशिश कर सकता है।
अदालत का मानना था कि एक अनपेक्षित दुर्घटना के बाद दोबारा प्रयास करना डबल ज्योपार्डी यानी एक ही अपराध के लिए दोहरा दंड या क्रूरता नहीं माना जाता।
'क्रूर और असामान्य सजा' की कानूनी चुनौती
हालांकि, अमेरिका के सांविधानिक नियमों (संविधान के आठवें संशोधन) के तहत अब क्रूर और असामान्य सजा के खिलाफ अधिकार के तहत अगर एग्जीक्यूशन नाकाम होने के पीछे राज्य के पूरे प्रोटोकॉल या कानून में ही कोई गंभीर दोष पाया जाता है, तो कैदी के वकील इसे अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
अगर यह साबित होता है कि राज्य की प्रक्रिया बेहद यातना देने वाली या गंभीर जोखिम पैदा करती है, तो अदालत राज्य को उसी तरीके से दोबारा सजा आगे बढ़ाने से रोक सकती है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 1947 के ऐतिहासिक निर्णय- लुइसियाना एक्स फ्रांसिस बनाम रेसवेबर के मुताबिक, अगर सजा का कार्यान्वयन किसी मशीनी गड़बड़ी या अनपेक्षित दुर्घटना के कारण रुका है, तो राज्य दोबारा सजा देने की कोशिश कर सकता है।
अदालत का मानना था कि एक अनपेक्षित दुर्घटना के बाद दोबारा प्रयास करना डबल ज्योपार्डी यानी एक ही अपराध के लिए दोहरा दंड या क्रूरता नहीं माना जाता।
'क्रूर और असामान्य सजा' की कानूनी चुनौती
हालांकि, अमेरिका के सांविधानिक नियमों (संविधान के आठवें संशोधन) के तहत अब क्रूर और असामान्य सजा के खिलाफ अधिकार के तहत अगर एग्जीक्यूशन नाकाम होने के पीछे राज्य के पूरे प्रोटोकॉल या कानून में ही कोई गंभीर दोष पाया जाता है, तो कैदी के वकील इसे अदालत में चुनौती दे सकते हैं।
अगर यह साबित होता है कि राज्य की प्रक्रिया बेहद यातना देने वाली या गंभीर जोखिम पैदा करती है, तो अदालत राज्य को उसी तरीके से दोबारा सजा आगे बढ़ाने से रोक सकती है।
अमेरिका में लीथल इंजेक्शन पर सरकारों की नीतियां अलग-अलग।
- फोटो : अमर उजाला
4. प्रशासनिक जांच और सजा पर रोक
ऐसी घटनाओं के तुरंत बाद राज्य का प्रशासन कानूनी कदम उठाता है। राज्य के गवर्नर सजा पर अस्थायी रोक लगाते हैं और एक स्वतंत्र निष्पक्ष जांच के आदेश देते हैं, ताकि विफलता का सटीक कारण पता चल सके।
अगर राज्य दोबारा सजा देने के कदम की तरफ बढ़ना चाहता है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत में जाकर नया एग्जीक्यूशन वारंट हासिल करना होता है।
5. वैकल्पिक तरीके या विशेष समझौते
ऐसी घटनाओं के तुरंत बाद राज्य का प्रशासन कानूनी कदम उठाता है। राज्य के गवर्नर सजा पर अस्थायी रोक लगाते हैं और एक स्वतंत्र निष्पक्ष जांच के आदेश देते हैं, ताकि विफलता का सटीक कारण पता चल सके।
अगर राज्य दोबारा सजा देने के कदम की तरफ बढ़ना चाहता है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत अदालत में जाकर नया एग्जीक्यूशन वारंट हासिल करना होता है।
5. वैकल्पिक तरीके या विशेष समझौते
- कानून के तहत अगर लीथल इंजेक्शन के तरीका को असांविधानिक या अमान्य पाया जाता है, तो राज्य अन्य स्वीकृत तरीकों, जैसे- इलेक्ट्रोक्यूशन यानी बिजली की कुर्सी पर बिठाकर मौत देने का इस्तेमाल कर सकता है।
- कुछ मामलों में गवर्नर कैदी को राहत/स्थगन दे सकते हैं या राज्य कैदी के साथ कानूनी समझौता कर सकता है कि दोबारा मौत की सजा का कार्यान्वयन नहीं होगा।
क्या भारत में हुई हैं लीथल इंजेक्शन से मृत्युदंड देने पर चर्चा?
भारत में मृत्युदंड के लिए लंबे समय से फांसी दिए जाने का तरीका अपनाया जा रहा है। मौजूदा समय में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता- बीएनएसएस, 2023 की धारा 393(5) प्रभावी है, जिसके तहत सजा-ए-मौत के लिए गर्दन से तब तक लटकाना जब तक मृत्यु न हो जाए ही एकमात्र मौत देने का वैधानिक तरीका है। इससे पहले सीआरपीसी में भी यही तरीका तय था। हालांकि, मृत्युदंड के एग्जीक्यूशन के कई और तरीकों पर भी बात हुई है। इनमें लीथल इंजेक्शन देने पर अदालत और सरकार के स्तर पर विस्तृत चर्चा हुई है।1. सुप्रीम कोर्ट का रुख
- सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हाल ही में वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए फांसी के प्रावधान को बरकरार रखा।
- अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक या प्रायोगिक डेटा नहीं है जो यह साबित करे कि लीथल इंजेक्शन, फांसी की तुलना में अधिक मानवीय या कम दर्दनाक है।
मौत की सजा
- फोटो : Amar Ujala
- कोर्ट ने प्रोजेक्ट 39ए (एनएलयू दिल्ली) की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों का जिक्र करते हुए कहा कि अमेरिका जैसे देशों में लीथल इंजेक्शन से मौत दिए जाने के दौरान उच्च दर पर विफलताएं दर्ज की गई हैं, जहां नस न मिलने या दवा के काम न करने जैसी गंभीर समस्याएं आती हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने 1983 के डीना बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि जब नियमबद्ध तरीके से फांसी दी जाती है, तो यह त्वरित, सरल और गरिमापूर्ण होती है।
- अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका फैसला भविष्य की संवैधानिक समीक्षा को रोकता नहीं है। यदि केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति बनाकर अन्य तरीकों की समीक्षा कर सकती है या भविष्य में नए वैज्ञानिक प्रमाण आने पर इस पर पुनर्विचार हो सकता है।
ये भी पढ़ें: Explainer: सजा-ए-मौत का तरीका बदलने वाली याचिका क्यों हुई खारिज, दुनिया में मृत्युदंड के कैसे-कैसे तरीके?
2. केंद्र सरकार का रुख
- केंद्र सरकार (अटॉर्नी जनरल) ने भी अदालत में हलफनामा दाखिल कर फांसी की प्रक्रिया का समर्थन किया और इसे लीथल इंजेक्शन या अन्य तरीकों की तुलना में अधिक सुरक्षित, त्वरित और निश्चित बताया।
- याचिकाकर्ता ने कैदियों को 'फांसी या लीथल इंजेक्शन' में से एक चुनने का विकल्प देने की मांग की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि कैदियों को ऐसा विकल्प देना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
- सेना, नौसेना और वायुसेना अधिनियमों में शूटिंग का विकल्प उपलब्ध है। इस पर सरकार और कोर्ट दोनों का मानना था कि सैन्य कानून विशेष परिस्थितियों और वर्ग के लिए हैं, उन्हें सामान्य नागरिकों के आपराधिक कानून पर लागू नहीं किया जा सकता।
- विधि आयोग ने अपनी 187वीं रिपोर्ट (2003) में लीथल इंजेक्शन को एक विकल्प के रूप में जोड़ने की सिफारिश की थी। हालांकि, संसद ने नए कानूनों (बीएनएसएस, 2023) को पारित करते समय इस सिफारिश को स्वीकार नहीं किया और केवल फांसी को ही एकमात्र जरिया बनाए रखा गया।