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एक्सप्लेनर: हाईजैक से इंजन फेल होने तक, बड़े विमान संकट के वक्त पायलट और क्रू ने कब-कब बचाई यात्रियों की जान?

Thu, 01 Oct 2026 03:11 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Thu, 01 Oct 2026 03:11 PM IST
सार

कैप्टन स्मित मच्छार की सूझ-बूझ ने बीते दिन एक बड़ा विमान हादसा होने से टाल दिया। विमानन इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं, जब हाईजैक से लेकर इंजन फेल होने तक अलग-अलग परिस्थितियों में पायलट और क्रू ने यात्रियों को सुरक्षित बचाया। आइए ऐसी प्रमुख घटनाओं के बारे में जानते हैं।

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Explainer: From Hijackings to Engine Failures, How Pilots and Crew Saved Passengers
विमान हादसा जब टला - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में सह-पायलट ने कप्तान स्मित मच्छार पर चाकू से हमला कर दिया। घायल होने के बावजूद स्मित मच्छार ने हिम्मत नहीं छोड़ी और पायलट कक्ष का दरवाजा खोलने में कामयाब रहे। इसके बाद यात्रियों और चालक दल ने हमलावर को काबू करने में मदद की, जबकि दूसरे पायलटों ने विमान की कमान संभाली। विमान को सऊदी अरब के तबूक में सुरक्षित उतारा गया। इसमें 174 लोग (यात्री और क्रू) मौजूद थे।

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स्मित मच्छार के इस साहस की दुनियाभर में चर्चा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समेत कई नेताओं ने उनके साहस की सराहना की। विमानन इतिहास में ऐसे साहस की कई मिसालें हैं, जब पायलट और क्रू ने अपनी सूझ-बूझ से यात्रियों की जान बचाई, तो कई बार इसके लिए अपनी जान तक गंवा दी। आइए ऐसी प्रमुख घटनाओं के बारे में जानते हैं।

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Explainer: From Hijackings to Engine Failures, How Pilots and Crew Saved Passengers
नीरजा भनोट का साहस - फोटो : Amar Ujala

नीरजा भनोट ने यात्रियों को बचाते हुए दी जान

5 सितंबर 1986 को पैन एएम की उड़ान 73 मुंबई से न्यूयॉर्क जा रही थी। विमान पाकिस्तान के कराची हवाईअड्डे पर रुका हुआ था। इसी दौरान चार हथियारबंद आतंकवादी विमान में घुस गए और यात्रियों को बंधक बना लिया।

इस विमान में 379 यात्री और चालक दल के सदस्य सवार थे। आतंकवादियों ने विमान पर कब्जा कर लिया था। इसी विमान में 23 साल की नीरजा भनोट वरिष्ठ विमान परिचारिका थीं।



आतंकवादियों के विमान में घुसते ही नीरजा ने पायलट दल को खतरे की जानकारी देने में मदद की। इसके बाद पायलट विमान से बाहर निकलने में सफल रहे। इससे आतंकवादी विमान को अपनी इच्छा के मुताबिक दूसरे स्थान पर नहीं ले जा सके।

इसके बाद नीरजा यात्रियों के बीच रहीं और स्थिति संभालती रहीं। आतंकवादियों ने यात्रियों के पासपोर्ट इकट्ठा करने को कहा, ताकि अमेरिकी यात्रियों की पहचान की जा सके। नीरजा ने यात्रियों की मदद की और कई पासपोर्ट छिपाने में भूमिका निभाई।

करीब 17 घंटे तक यात्री विमान के अंदर बंधक रहे। इसके बाद विमान की बिजली चली गई और अंदर अंधेरा छा गया। इसी दौरान आतंकवादियों ने यात्रियों और चालक दल पर गोलीबारी शुरू कर दी। नीरजा ने आपातकालीन दरवाजा खोला और यात्रियों को बाहर निकालना शुरू किया। वह यात्रियों को रास्ता दिखाकर बाहर भेजती रहीं।

इसी दौरान उनके सामने तीन छोटे बच्चे आए। गोलीबारी के बीच नीरजा ने बच्चों को बचाने की कोशिश की और उन्हें बचाने के लिए खुद उनके सामने आ गईं। आतंकवादियों की गोलियों की चपेट में आने से नीरजा की मौत हो गई। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 23 साल थी। पैन एम 73 के अपहरण में कुल 20 लोगों की मौत हुई और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए।

नीरजा भनोट को उनके साहस के लिए भारत और विदेशों में कई सम्मान मिले। भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया। यह भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है। नीरजा को 1987 में यह सम्मान दिया गया। नीरजा अशोक चक्र पाने वाली पहली महिला और 2003 तक इसकी सबसे कम उम्र की प्राप्तकर्ता थीं।

उन्हें पाकिस्तान का तमगा-ए-पाकिस्तान भी दिया गया। पैन एम हिस्टोरिकल फाउंडेशन के अनुसार, 2006 में उन्हें अमेरिकी न्याय विभाग का विशेष साहस पुरस्कार भी दिया गया।

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Explainer: From Hijackings to Engine Failures, How Pilots and Crew Saved Passengers
विमान हादसा जब टला - फोटो : Amar Ujala

हडसन नदी में उतारा विमान, 155 लोगों की बची जान

15 जनवरी 2009 को अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित लागार्डिया हवाईअड्डे से यूएस एयरवेज की उड़ान 1549 ने उड़ान भरी। एयरबस ए320 में 150 यात्री और चालक दल के पांच सदस्य सवार थे। उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद विमान कनाडा गीज पक्षियों के बड़े झुंड से टकरा गया। कई पक्षी दोनों इंजनों में चले गए और दोनों इंजनों की शक्ति लगभग पूरी तरह खत्म हो गई।

विमान के कप्तान चेस्ली सली सलनबर्गर और सह-पायलट जेफ्री स्काइल्स ने तुरंत आपात स्थिति संभाली। दोनों इंजनों के बंद होने के बाद विमान को वापस लागार्डिया ले जाने की कोशिश की गई, लेकिन कम ऊंचाई के कारण वहां पहुंचना संभव नहीं था। टेटरबोरो हवाईअड्डे का विकल्प भी देखा गया, लेकिन वह भी संभव नहीं था।

इसके बाद कैप्टन सलनबर्गर ने हडसन नदी में विमान उतारने का फैसला किया। पक्षियों से टकराने के करीब साढ़े तीन मिनट बाद विमान नदी की सतह पर उतर गया।

विमान के पिछले हिस्से में पानी भरने लगा। यात्रियों को आगे और पंखों के ऊपर बने आपातकालीन निकास से बाहर निकाला गया। कुछ यात्री विमान के पंखों पर खड़े होकर बचाव नौकाओं का इंतजार करते रहे।

पहली बचाव नौका करीब तीन मिनट में पहुंच गई और कुछ ही देर में दूसरी नौकाएं भी वहां पहुंच गईं। करीब 26 मिनट के भीतर विमान में सवार सभी 155 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया। हादसे में कुछ लोग गंभीर रूप से घायल हुए।

अमेरिकी राष्ट्रीय परिवहन सुरक्षा बोर्ड की जांच के मुताबिक, दोनों पायलटों के बीच बेहतर समन्वय, कैप्टन का नदी में विमान उतारने का फैसला और केबिन क्रू की तेजी से की गई निकासी ने लोगों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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विमान हादसा जब टला - फोटो : Amar Ujala

उड़ान के बीच विमान की छत उड़ी, फिर भी सुरक्षित उतरा

28 अप्रैल 1988 को अमेरिका की अलोहा एयरलाइंस की उड़ान 243 हिलो से होनोलूलू जा रही थी। बोइंग 737-200 में 89 यात्री और चालक दल के छह सदस्य सवार थे। करीब 24 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान के दौरान विमान के ऊपरी यात्री हिस्से का करीब 18 फीट लंबा हिस्सा अचानक टूटकर अलग हो गया।

विमान का बड़ा हिस्सा खुल जाने से तेज हवा केबिन के अंदर आने लगी। यात्रियों और क्रू के सामने कुछ ही सेकंड में बेहद खतरनाक स्थिति पैदा हो गई। इस हादसे में मुख्य परिचारिका क्लैराबेल लैंसिंग विमान से बाहर गिर गईं और उनकी मौत हो गई। सात यात्रियों और एक अन्य परिचारिका को गंभीर चोटें आईं।

इसके बावजूद कैप्टन रॉबर्ट शॉ और फर्स्ट ऑफिसर मैडेलिन मिमी टॉम्पकिंस ने विमान का नियंत्रण बनाए रखा। कॉकपिट और विमान के दूसरे हिस्सों को हुए नुकसान के बावजूद पायलटों ने विमान की ऊंचाई कम की और उसे माउई के काहुलुई हवाईअड्डे की ओर मोड़ दिया।

कॉकपिट से एयर ट्रैफिक कंट्रोल को स्थिति की जानकारी दी गई और आपात लैंडिंग की तैयारी की गई। हादसे के करीब 13 मिनट बाद विमान काहुलुई हवाईअड्डे पर उतर गया।

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विमान हादसा - फोटो : Amar Ujala

पायलट की सूझबूझ से 185 लोगों की बची जान

19 जुलाई 1989 को यूनाइटेड एयरलाइंस की उड़ान 232 डेनवर से फिलाडेल्फिया जा रही थी। मैकडॉनल डगलस DC-10-10 विमान में 285 यात्री और 11 चालक दल के सदस्य सवार थे।

उड़ान के करीब एक घंटे बाद विमान में जोरदार धमाका हुआ। जांच करने पर पता चला कि विमान की पूंछ पर लगा नंबर दो इंजन फेल हो गया था। इंजन के टूटे हिस्सों ने विमान के तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाया। इससे विमान के सामान्य नियंत्रण लगभग पूरी तरह खत्म हो गए।

कप्तान अल हेंस और चालक दल ने विमान को नियंत्रित करने का दूसरा तरीका खोजा। विमान की दिशा और ऊंचाई को इंजन की शक्ति में बदलाव के जरिए सीमित रूप से नियंत्रित किया जा सकता था। इसी तरीके से चालक दल विमान को आयोवा के सिओक्स सिटी तक ले जाने में सफल रहा।

इसी दौरान विमान में मौजूद ऑफ-ड्यूटी पायलट डेनिस फिच कॉकपिट में पहुंचे। उन्होंने इंजन की शक्ति नियंत्रित करने में मदद की, जबकि कैप्टन हेंस और बाकी चालक दल विमान को संभालने में जुटे रहे।

विमान को सिओक्स गेटवे हवाईअड्डे पर उतारने की कोशिश की गई। लेकिन हाइड्रोलिक नियंत्रण नहीं होने के कारण विमान को मोड़ना और लैंडिंग के दौरान नियंत्रित करना बेहद मुश्किल था। विमान रनवे से टकराकर पलट गया और उसमें आग लग गई।

हादसे में 111 लोगों की मौत हुई, जबकि 185 लोग बच गए। इस घटना में बिना सामान्य नियंत्रण प्रणाली के विमान को सिओक्स सिटी तक ले जाना और आपात लैंडिंग की कोशिश करना चालक दल के सामने मौजूद असाधारण चुनौती को दिखाता है।

चारों इंजन बंद हुए, फिर भी पायलट ने विमान को सुरक्षित उतारा

24 जून 1982 को ब्रिटिश एयरवेज की उड़ान 9 लंदन से ऑकलैंड जा रही थी। बोइंग 747 विमान में 248 यात्री और 15 चालक दल के सदस्य सवार थे। विमान इंडोनेशिया के जावा द्वीप के ऊपर करीब 37 हजार फीट की ऊंचाई पर था।

अचानक विमान माउंट गालुंगगुंग ज्वालामुखी से निकली राख के बादल में पहुंच गया। कुछ ही देर में एक-एक करके विमान के चारों इंजन बंद हो गए। विमान की विंडस्क्रीन भी राख के कारण लगभग अपारदर्शी हो गई और कॉकपिट में धुआं और राख भरने लगी।

कप्तान एरिक मूडी और उनके चालक दल ने इंजन दोबारा शुरू करने की कोशिश की, लेकिन शुरुआत में सफलता नहीं मिली। विमान तेजी से नीचे आने लगा। चालक दल ने विमान को ग्लाइड करते हुए नीचे लाने का फैसला किया।

विमान के सामने पहाड़ी इलाका था, इसलिए पायलटों को ऊंचाई और दिशा दोनों पर लगातार नजर रखनी थी। करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इंजन दोबारा चालू होने लगे। कुछ प्रयासों के बाद चारों इंजन फिर से चलने लगे और विमान को जकार्ता की ओर मोड़ दिया गया।

हालांकि एक इंजन में दोबारा समस्या आई और उसे बंद करना पड़ा। इसके बाद भी चालक दल ने विमान को हलीम पेरदानाकुसुमा हवाईअड्डे तक पहुंचाया। खराब विंडस्क्रीन के कारण लैंडिंग आसान नहीं थी, लेकिन विमान सुरक्षित उतर गया और सभी 263 लोग बच गए।

खाई में गिरा विमान, फिर भी बच गई लोगों की जान

2 अगस्त 2005 को एयर फ्रांस की उड़ान 358 पेरिस से टोरंटो जा रही थी। एयरबस A340 में 297 यात्री और 12 चालक दल के सदस्य सवार थे।

टोरंटो पहुंचने से पहले चालक दल को खराब मौसम और आंधी-तूफान की जानकारी मिल चुकी थी। रनवे पर तेज बारिश हो रही थी और पहले उतर चुके एक विमान के चालक दल ने भी ब्रेकिंग की स्थिति खराब होने की सूचना दी थी।

इसके बावजूद उड़ान 358 ने लैंडिंग की प्रक्रिया जारी रखी। विमान रनवे के निर्धारित स्थान से काफी आगे जाकर जमीन पर उतरा। बारिश और गीले रनवे के कारण विमान की रफ्तार कम करना मुश्किल हुआ। रिवर्स थ्रस्ट लगाने में भी देरी हुई और विमान रनवे से बाहर निकल गया।

इसके बाद विमान हवाईअड्डे की सीमा के बाहर एक खड्ड में जा गिरा और उसमें आग लग गई। विमान के रुकते ही केबिन क्रू ने यात्रियों को तेजी से बाहर निकालना शुरू किया।

आग के आपातकालीन निकास तक पहुंचने से पहले सभी 309 लोग विमान से बाहर निकल चुके थे। हादसे में दो चालक दल के सदस्य और 10 यात्री गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन किसी की मौत नहीं हुई।

इस घटना में विमान को बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका तेजी से की गई आपात निकासी की रही। आग और दुर्घटना के बावजूद केबिन क्रू ने यात्रियों को बाहर निकालने में अहम भूमिका निभाई।

पायलट पर चाकू से हमला, फिर भी विमान सुरक्षित उतारा गया

23 जुलाई 1999 को ऑल निप्पॉन एयरवेज की उड़ान 61 ने टोक्यो के हानेडा हवाईअड्डे से साप्पोरो के लिए उड़ान भरी। बोइंग 747 में 503 यात्री और 14 चालक दल के सदस्य सवार थे।

उड़ान भरने के करीब 25 मिनट बाद एक यात्री ने करीब 20 सेंटीमीटर लंबे चाकू के बल पर एक फ्लाइट अटेंडेंट को कॉकपिट तक ले जाने के लिए मजबूर किया। उसने सह-पायलट को कॉकपिट से बाहर कर दिया और कप्तान नाओयुकी नागाशिमा को विमान का रुख बदलने का आदेश दिया।

कप्तान ने आदेश मानने से इनकार किया तो हमलावर ने उन पर चाकू से हमला कर दिया। इसके बाद उसने कुछ समय के लिए विमान का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। विमान की ऊंचाई तेजी से कम होकर करीब 300 मीटर तक पहुंच गई।

स्थिति को देखते हुए चालक दल के सदस्यों ने हमलावर को काबू करने की कोशिश शुरू की। इसी दौरान विमान में मौजूद छुट्टी पर चल रहे पायलट जुंजी यामाउची भी कॉकपिट में पहुंचे और विमान को संभालने में मदद की।

चालक दल ने हमलावर को काबू कर लिया और विमान को वापस हानेडा हवाईअड्डे की ओर मोड़ा गया। करीब 12 बजकर 14 मिनट पर विमान की आपात लैंडिंग कराई गई।

हमलावर को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन कप्तान नाओयुकी नागाशिमा की गंभीर चोटों के कारण मौत हो गई। विमान में सवार किसी यात्री की मौत नहीं हुई और बाकी यात्री व चालक दल सुरक्षित रहे।

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