सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   US President Donald Trump Wars in Second Term from West Asia Iran War to Latin America to Africa explained new

वादे से पलटे ट्रंप?: अमेरिका को दुनियाभर के संघर्षों में उलझा रहे राष्ट्रपति, एशिया से अफ्रीका तक उतारी सेना

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 05 Jun 2026 06:58 AM IST
विज्ञापन
सार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2024 में राष्ट्रपति चुनाव की उम्मीदवारी तय होने के बाद से लगातार जनता से वादा किया कि वह अमेरिका को फॉरेवर वॉर्स यानी अनंत युद्ध से बाहर निकालेंगे और सिर्फ देश की सुरक्षा पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे। हालांकि, पहले कार्यकाल की तरह ही ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भी अमेरिका बाद एक युद्ध में फंसता जा रहा है। इनमें ईरान से लेकर सोमालिया तक के संघर्ष शामिल हैं। आइये जानते हैं ट्रंप के कार्यकाल में जारी ऐसे ही कुछ संघर्षों के बारे में...

US President Donald Trump Wars in Second Term from West Asia Iran War to Latin America to Africa explained new
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में कहां-कहां युद्ध में उलझा अमेरिका। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार

डोनाल्ड ट्रंप 2024 में चुनाव जीतने से पहले तक लगातार अमेरिकी जनता से नए-नए वादे करते आ रहे थे। फिर चाहे अमेरिका को नई आर्थिक ऊंचाइयों पर ले जाने का वादा हो या फिर अमेरिकी जनता को महंगाई से बचाने का। इन अधिकतर वादों में से कई पर या तो काम जारी है या स्थितियां ट्रंप के अनुकूल नहीं हैं। हालांकि, एक वादा जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति अब तक खुद ही पलटते दिखे हैं, वह वादा है अमेरिका को दुनियाभर में जारी संघर्षों से निकालने का। अगर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो सामने आता है कि ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका संघर्षों से निकलने के बजाय कुछ और नए युद्ध में उलझता ही चला गया। 
Trending Videos


ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने से पहले और इस दौरान दुनियाभर के युद्ध से अमेरिका को निकालने पर क्या वादे किए थे? कैसे ट्रंप धीरे-धीरे इन वादों से लगातार पलटे हैं? फिलहाल अमेरिका की सैन्य मौजूदगी को ट्रंप ने किस तरह बढ़ाया है? कैसे ट्रंप ने राष्ट्रपति के तौर पर अपने पहले कार्यकाल में भी कुछ ऐसे ही वादे तोड़े थे? आइये जानते हैं...
विज्ञापन
विज्ञापन

पहले जानें- अमेरिका को युद्ध से निकालने को लेकर क्या थे ट्रंप के वादे?

डोनाल्ड ट्रंप ने 2024 में अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी पेश करने के साथ चुनाव प्रचार के दौरान खुद को 'शांति के उम्मीदवार' के रूप में पेश किया था और अमेरिका को विदेशी युद्धों से बाहर निकालने को लेकर कई बड़े और स्पष्ट वादे किए थे।

अनंत संघर्षों का अंत: ट्रंप ने एक दशक तक लगातार यह वादा किया कि वह पश्चिम एशिया के लंबे संघर्षों और खत्म न होने वाले संघर्षों को रोकेंगे। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के शासन में जॉर्ज बुश की तरफ से शुरू किए गए इराक युद्ध को एक बड़ी गलती करार दिया था। ट्रंप का कहना था कि इसने पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने दूसरे देशों के मामलों में दखल और अराजकता की नीतियों को खत्म करने की बात कही थी।

अमेरिका फर्स्ट नीति और घरेलू फोकस:  ट्रंप की नीति का मुख्य मंत्र यह था कि अमेरिका को विदेशी सैन्य अभियानों और अन्य देशों की राजनीतिक लड़ाइयों में अपना खजाना और सैनिकों का खून नहीं बहाना चाहिए। उनका वादा था कि वह विदेशों की बजाय अमेरिका की घरेलू समस्याओं और प्राथमिकताओं पर संसाधनों को खर्च करेंगे। उन्होंने पश्चिम एशिया में खरबों डॉलर खर्च होने और हजारों जानें जाने पर कई बार दुख जताया।

विज्ञापन

अहम संघर्षों को तुरंत खत्म करने का दावा: एक उम्मीदवार के रूप में ट्रंप ने अपनी समझौता कराने की क्षमताओं का हवाला देते हुए दावा किया था कि वह पदभार ग्रहण करने के पहले ही दिन रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त कर देंगे। इसके अलावा उन्होंने गाजा युद्ध को भी तेजी से खत्म करने का वादा किया था।

अमेरिकी सेना को बेवजह न उलझाना: उन्होंने वादा किया था कि वह अपनी सेना को उन विदेशी इलाकों में लड़ने के लिए भेजकर कमजोर नहीं करेंगे, जहां अमेरिका का सीधा कोई मतलब नहीं है। ट्रंप का वादा था कि अमेरिकी सैनिकों को अब सिर्फ अमेरिकी सुरक्षा में ही लगाया जाएगा, न कि दूसरे देश के युद्धों में।

कैसे ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में लगातार जंगों में उलझा है अमेरिका?

अपने वादों से उलट डोनाल्ड ट्रंप ने बीते डेढ़ वर्ष के कार्यकाल में अमेरिका को कई नई जंगों में उलझाया है। हालिया समय में अमेरिका अपने पड़ोस में लातिन अमेरिकी क्षेत्र से लेकर एशिया तक में जारी युद्ध में अमेरिकी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर रहे हैं और लगातार तैनाती बढ़ाते आए हैं। 

1. एशिया

ईरान: ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका ने ईरान पर दो बार हमले किए हैं। जून 2025 में, अमेरिकी सेना ने इस्राइल के साथ मिलकर ईरानी परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी। इसके बाद फरवरी में भी अमेरिकी और इस्राइली सेनाओं ने हमले किए, जिसके जवाब में तेहरान ने पश्चिम एशिया में अमेरिकी सहयोगियों- यूएई, कुवैत, कतर, सऊदी अरब, आदि देशों पर जवाबी हमले किए। इन हमलों में ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों के साथ हथियारों को भी निशाना बनाया है। फिलहाल शांति समझौते के लिए बातचीत जारी है, लेकिन दोनों देशों के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में संघर्ष हुआ है। 

यमन: मार्च 2025 में अमेरिका ने यमन के हूती विद्रोहियों पर कई हमले किए थे। अमेरिका का कहना था कि उसने यह हमले इस्राइल की मदद करने और लाल सागर में समुद्री वाणिज्यिक मार्ग को बाधित होने से बचाने के लिए किए हैं। 

इराक: मार्च 2025 में ही अमेरिकी सेना ने इराक में आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के एक सरगना को मार गिराया। 

सीरिया: दिसंबर में अमेरिका ने सीरिया में आईएसआईएस के ठिकानों पर हमले किए। वह भी तब जब सीरिया में अमेरिका के समर्थन वाली सरकार पहले ही आईएसआईएस के मुकाबले में जुटी है। 

2. लातिन अमेरिका और आसपास के समुद्री क्षेत्र

कैरेबियाई सागर और पूर्वी प्रशांत: अमेरिका इस क्षेत्र में नशीले पदार्थों की तस्करी करने वालों और कथित नार्को-आतंकवादियों के खिलाफ सैन्य बल का आक्रामक इस्तेमाल कर रहा है। सितंबर में वेनेजुएला के पास ट्रेन डी अरागुआ ड्रग कार्टेल के 11 सदस्यों के मारे जाने के बाद से इन अमेरिकी हमलों में अब तक लगभग 207 लोग मारे जा चुके हैं।
 
वेनेजुएला: जनवरी में अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला की राजधानी कराकस में एक बड़ा अभियान चलाकर वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ लिया था। ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी सेना ने कई हफ्तों तक वेनेजुएला के आसपास नौसैनिक ब्लॉकेड लगाकर उस पर दबाव बनाया और बाद में मादुरो को गिरफ्तार कर उन्हें अमेरिका पहुंचा दिया। मादुरो को फिलहाल नार्को-आतंकवाद की साजिश के आरोपों में न्यूयॉर्क में हिरासत में रखा गया है।

क्यूबा: डोनाल्ड ट्रंप ने क्यूबा में राजनीतिक बदलाव का दबाव बनाने के लिए हाल के हफ्तों में क्यूबा के करीब अमेरिकी नौसेना का जमावड़ा काफी बढ़ा दिया है। न सिर्फ क्यूबा की तरफ जाने वाले तेल-गैस के टैंकरों को निशाना बनाया जा रहा है, बल्कि उसकी जरूरत के उत्पादों वाली शिपिंग को भी जब्त किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस आर्थिक दबाव के जरिए वह क्यूबा में सत्ता परिवर्तन का माहौल बनाना चाहते हैं, ताकि वहां की वामपंथी सरकार हट जाए। 

ग्रीनलैंड: अमेरिका ने हाल ही में ग्रीनलैंड को खरीदने या इस पर कब्जा करने की मंशा रखी है। वह भी तब जब ग्रीनलैंड पहले से ही अमेरिका के सहयोगी देश डेनमार्क के शासन में है। इसके बावजूद ट्रंप ने इसे भू-राजनीतिक मुद्दा बनाया है और यहां अपनी सेना की एक बड़ी टुकड़ी को तैनात रखा है। चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप ने लगातार ग्रीनलैंड को कब्जाने की मंशा के सवाल पर सीधे न नहीं कहा है। 

3. अफ्रीका

सोमालिया: ट्रंप की सत्ता में वापसी के बाद सोमालिया वह पहला देश था जहां अमेरिकी सेना ने हमला किया। इस साल आईएसआईएस और अल-शबाब के खिलाफ कम से कम 63 संयुक्त हवाई हमले किए जा चुके हैं।

नाइजीरिया: अमेरिका ने नाइजीरियाई अधिकारियों के साथ मिलकर आईएसआईएस के ठिकानों पर कई हवाई और जमीनी हमले किए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने इन हमलों को नाइजीरिया में ईसाइयों के उत्पीड़न से बचाव के रूप में सही ठहराया है।

कैसे पहले कार्यकाल में भी अपने वादों से मुकर चुके हैं ट्रंप?

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान भी अमेरिका के गैर-हस्तक्षेप की नीति लागू करने के वादों से यू-टर्न लिया था। तब भी उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान पश्चिम एशिया में सैन्य हस्तक्षेप को कम करने का संकेत दिया था। लेकिन राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को कम करने के बजाय और बढ़ा दिया।

1. अफगानिस्तान में हुआ था युद्ध का विस्तार: ट्रंप ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना को वापस बुलाने का वादा किया था। हालांकि, राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने 16 साल पुराने इस युद्ध को खत्म करने के बजाय और बढ़ा दिया और हजारों अतिरिक्त अमेरिकी सैनिकों को वहां भेजने की रणनीति को मंजूरी दे दी। उन्होंने अपने इस यू-टर्न पर खुद स्वीकार किया कि उनका मूल विचार बाहर निकलने का था, लेकिन ओवल ऑफिस की डेस्क के पीछे बैठने पर फैसले बहुत अलग होते हैं। बाद में अपने कार्यकाल के अंत में ट्रंप ने धीरे-धीरे अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान से बाहर निकालने की मंजूरी दे दी थी। 

2. सीरिया पर मिसाइल हमले: विदेशी में अमेरिकी सेना को उलझाने की आलोचना करने वाले ट्रंप ने सीरिया की बशर अल-असद के नेतृत्व वाली सरकार के एक एयरबेस पर 59 टॉमहॉक मिसाइलों से हमला किया था। यह सीरियाई गृहयुद्ध में अमेरिका का पहला सीधा हमला था, जिसने उसे रूस से सीधी टक्कर में ला दिया था। 

3. यमन और सोमालिया में रिकॉर्ड हवाई हमले: ट्रंप के पहले कार्यकाल में यमन में अल-कायदा को निशाना बनाते हुए इतने हवाई हमले किए गए, जितने उससे पिछले चार वर्षों में कुल मिलाकर भी नहीं हुए थे। इसी तरह सोमालिया में आतंकी गुटों के खिलाफ अमेरिकी हवाई हमले दोगुने से भी अधिक हो गए थे।

4. विदेशी सैन्य ठिकानों को बनाए रखना: चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने विदेशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों की अहमियत और उन पर होने वाले खर्च पर सवाल उठाए थे, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन्होंने दुनिया भर में अमेरिकी सैन्य शक्ति और इन अड्डों को जस का तस बनाए रखा। 

ट्रंप के वादों से पलटने पर क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

विशेषज्ञों का मानना है कि डोनाल्ड ट्रंप का शांति के उम्मीदवार से एक आक्रामक सैन्य रुख अपनाने वाले राष्ट्रपति के रूप में बदलना उनकी बयानबाजी और वास्तविक नीतियों के बीच भारी विरोधाभास को दर्शाता है। अलग-अलग रक्षा, कूटनीतिक और विदेश नीति विशेषज्ञों ने ट्रंप के अपने वादों से पलटने पर अपने विचार रखे हैं।

ब्रेट मैकगर्क: पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी और विश्लेषक ब्रेट मैकगर्क ने कुछ समय पहले ही कहा था कि ट्रंप ने चुनाव के दौरान गाजा युद्ध को तेजी से खत्म करने और यूक्रेन युद्ध को सत्ता में आने के पहले ही दिन समाप्त करने का वादा किया था, लेकिन कार्यकाल के छह महीने बीत जाने के बाद दोनों मोर्चों पर शांति पहले से कहीं अधिक दूर दिखाई देती है। उन्होंने ट्रंप की कूटनीतिक और सैन्य नीतियों को असंगत बताया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि ट्रंप ने गाजा में मानवीय सहायता पहुंचाने के लिए बनाए गए यूएस एड (USAID) ढांचे को शुरुआत में ही खत्म कर दिया था, जिससे वहां का मानवीय संकट और गहरा गया। यूक्रेन के मामले में भी मैकगर्क ने कहा कि शुरुआत में ट्रंप की नीतियों के चलते रूस के राष्ट्रपति पुतिन के हौसले बढ़े, जिससे युद्ध के और लंबा खिंचने के हालात बन गए।

मोहम्मद बजी: न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ने इसी साल प्रकाशित अपने विश्लेषण में ईरान पर बड़े पैमाने पर किए गए हमलों को लेकर ट्रंप की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि अमेरिका फर्स्ट राष्ट्रपति, जिन्होंने विदेशी युद्धों का विरोध करके अपना राजनीतिक आधार बनाया था, अब सत्ता परिवर्तन के मकसद से खुद अपनी मर्जी का युद्ध छेड़ चुके हैं। बजी ने ट्रंप की तरफ से ईरान को अमेरिका के लिए अनुमानित खतरा बताने वाले दावों को बुनियादी तौर पर गलत और बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया बताया। उन्होंने ट्रंप की बयानबाजी की तुलना सीधे तौर पर जॉर्ज डब्ल्यू बुश से करते हुए कहा कि...

 

एंड्रयू लैथम: मैकलेस्टर कॉलेज में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर लैथम ने ट्रंप के बढ़ते वैश्विक सैन्य ऑपरेशनों का विश्लेषण करते हुए बताया कि ट्रंप सैन्य बल के प्रयोग को बुश-युग के नेताओं से बिल्कुल अलग नजरिए से देखते हैं। उनके मुताबिक, ट्रंप मानते हैं कि खतरे व्यक्तिगत हैं, सीमाएं मायने रखती हैं...और बल तब उपयोगी होता है जब यह नतीजे देता है। हालांकि, लैथम यह भी चेतावनी देते हैं कि अमेरिका फर्स्ट नीति नशीले पदार्थों या आतंकवाद से जुड़े किसी अचानक किए गए हमले को तो घरेलू रक्षा के रूप में सही ठहरा सकती है, लेकिन इसके तहत किसी लंबे युद्ध या बिना दिशा वाले सैन्य अभियान को जायज ठहराना बेहद मुश्किल है।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get latest World News headlines in Hindi related political news, sports news, Business news all breaking news and live updates. Stay updated with us for all latest Hindi news.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed