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Cyber Crime: साइबर अपराधियों को हैकिंग से ही जवाब देगा अमेरिका, विदेशी गिरोहों पर होगी कार्रवाई
Sat, 15 Aug 2026 03:15 PM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला नेटवर्क, वाशिंगटन।
अमर उजाला नेटवर्क, वाशिंगटन।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sat, 15 Aug 2026 03:15 PM IST
सार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने निजी कंपनियों को दी हैक-बैक की मंजूरी, विदेशी साइबर गिरोहों के डिजिटल ठिकानों पर कर सकेंगी कार्रवाई।
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साइबर अपराध
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
साइबर अपराधियों के खिलाफ अमेरिका ने अब बचाव के साथ जवाबी हमला करने की रणनीति भी अपना ली है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हैक बैक कार्यक्रम को मंजूरी दी है, जिसके तहत जांची-परखी अमेरिकी निजी कंपनियां सरकार की निगरानी व मंजूरी के बाद विदेशी साइबर अपराधी गिरोहों के डिजिटल नेटवर्क में घुसकर उन्हें बाधित कर सकेंगी। यह अमेरिकी साइबर नीति में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
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अब तक साइबर हमलों के खिलाफ आक्रामक अभियान मुख्य रूप से अमेरिकी सरकारी एजेंसियों, खुफिया तंत्र और सेना के दायरे में रहे हैं। नई व्यवस्था में चुनी हुई निजी कंपनियां साइबर निगरानी और साइबर प्रभाव वाली कार्रवाई कर सकेंगी। इनमें विदेशी आपराधिक साइबर नेटवर्क की निगरानी, उन्हें बाधित करना, डिजिटल ढांचे को निष्क्रिय करना और कुछ मामलों में उसमें बदलाव करना शामिल हो सकता है।
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हर कार्रवाई पर सरकार की नजर
कंपनियों को सीधे खुली छूट नहीं दी गई है। उन्हें सरकारी कार्यक्रम के तहत जांच के बाद शामिल किया जाएगा और अभियान संघीय निगरानी में चलेंगे। भाग लेने वाली कंपनियों को कम से कम 10 लाख डॉलर का ऋण पत्र या वित्तीय व्यवस्था रखना होगा, ताकि नियम तोड़ने पर जवाबदेही तय की जा सके।
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निशाना विदेशी आपराधिक गिरोह, सरकारें नहीं
इस पहल का मुख्य लक्ष्य विदेशी साइबर-सक्षम आपराधिक संगठन हैं, जो रैनसमवेयर, ऑनलाइन ठगी और दूसरे साइबर अपराधों में शामिल हैं। विदेशी सरकारों को सीधे निशाना बनाने की अनुमति नहीं है।
गलत लक्ष्य बना तो बढ़ सकता है विवाद
इस नीति के साथ जोखिम भी हैं। साइबर अपराधी अक्सर किसी दूसरे देश के सर्वर या किसी निर्दोष संस्था के नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में गलत पहचान के आधार पर जवाबी कार्रवाई से अस्पताल, कंपनी या किसी अन्य संस्था का नेटवर्क प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञों को यह भी डर है कि किसी आपराधिक गिरोह और विदेशी सरकार के बीच संबंध की गलत पहचान अंतरराष्ट्रीय विवाद को जन्म दे सकती है।
सरकारी एजेंसियों का बोझ घटाने की कोशिश
अमेरिका का तर्क है कि साइबर अपराध की बढ़ती रफ्तार के बीच निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता और तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल जरूरी है। इससे सरकारी एजेंसियां अपनी सीमित क्षमता को बड़े राष्ट्र-स्तरीय साइबर खतरों पर केंद्रित कर सकेंगी। हालांकि, निजी कंपनियों को आक्रामक साइबर कार्रवाई में शामिल करने का यह प्रयोग आने वाले समय में साइबर युद्ध और अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए नई चुनौतियां भी खड़ी कर सकता है।
ताइवान पर एआई से साइबर हमला
ताइवान की सरकारी एजेंसियों पर जुलाई में हुए एक बड़े विदेशी साइबर हमले ने साइबर दुनिया में एआई के बढ़ते खतरे की चिंता बढ़ा दी है। जांच में सामने आया कि हमलावरों ने पारंपरिक तकनीकों के साथ एआई एजेंटों का इस्तेमाल कर सरकारी सिस्टम में सेंध लगाने की कोशिश की। रिपोर्टों के अनुसार हमले में एआई एजेंटों ने नेटवर्क की जानकारी जुटाने, कमजोरियां तलाशने और रणनीति बदलने जैसे काम किए।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, हमले में कई एआई एजेंटों ने समानांतर तरीके से सरकारी नेटवर्क की पड़ताल की। कम से कम 85 खाते प्रभावित हुए और 2,500 से अधिक कर्मचारियों के रिकॉर्ड निकाले जाने की बात सामने आई है। हमले का दायरा बाद में परमाणु सुरक्षा एजेंसी और ऊर्जा क्षेत्र तक भी पहुंचा। ताइवान ने हमले के मूल देश का आधिकारिक तौर पर नाम नहीं लिया है। हालांकि, जांचकर्ताओं ने चीनी भाषा के संकेतों के आधार पर चीन से संभावित संबंध की ओर इशारा किया है। यह घटना दिखाती है कि एआई अब केवल साइबर सुरक्षा का उपकरण नहीं, बल्कि हमलावरों के लिए स्वचालित हथियार जैसा माध्यम भी बनता जा रहा है।