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पश्चिम एशिया संघर्ष: पानी बन रहा हथियार, खाड़ी में डीसैलीनेशन प्लांट्स पर खतरा; 10 करोड़ प्रभावित

Sat, 21 Mar 2026 04:50 AM IST
Devesh Tripathi अमर उजाला नेटवर्क, दुबई
अमर उजाला नेटवर्क, दुबई Published by: Devesh Tripathi Updated Sat, 21 Mar 2026 04:50 AM IST
सार

अरब प्रायद्वीप के देशों दुबई, दोहा, कुवैत सिटी, अबू धाबी की जल आपूर्ति पूरी तरह डीसैलीनेशन प्लांट्स पर निर्भर है। सऊदी अरब में 70% पीने का पानी इन्हीं संयंत्रों से आता है। कुवैत व ओमान में यह आंकड़ा 90% तक पहुंच जाता है।

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West Asia conflict Water becoming weapon Gulf desalination plants threatened 100 million affected
पश्चिम एशिया संघर्ष - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव के बीच एक नई और गंभीर चिंता उभरकर सामने आई है, पानी। दशकों तक तेल को क्षेत्र की सबसे अहम और संवेदनशील संपत्ति माना जाता रहा, लेकिन हालिया हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब डीसैलीनेशन यानी समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाले संयंत्र खाड़ी देशों की असली जीवनरेखा बन चुके हैं।
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ईरान में तेल डिपो पर हमलों और खाड़ी क्षेत्र में जल एवं ऊर्जा परिसरों के पास मिसाइल और ड्रोन हमलों ने इस बुनियादी ढांचे की असुरक्षा को उजागर कर दिया है, जिस पर लगभग 10 करोड़ लोगों की रोजमर्रा की जरूरतें निर्भर हैं। डिसैलीनेशन रेगिस्तान में जीवन की रीढ़ माना जाता है।
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अरब प्रायद्वीप के देश पूरी तरह डीसैलीनेशन प्लांट्स पर निर्भर
अरब प्रायद्वीप के देशों दुबई, दोहा, कुवैत सिटी, अबू धाबी की जल आपूर्ति पूरी तरह डीसैलीनेशन प्लांट्स पर निर्भर है। सऊदी अरब में 70% पीने का पानी इन्हीं संयंत्रों से आता है। कुवैत व ओमान में यह आंकड़ा 90% तक पहुंच जाता है।
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डीसैलीनेशन डिपेंडेंसी
पूरे क्षेत्र में लगभग 10 करोड़ लोग सीधे तौर पर डीसैलीनेटेड पानी पर निर्भर हैं। दुनिया के सबसे बड़े डीसैलीनेशन प्लांट्स में से कई खाड़ी और लाल सागर के तटों पर स्थित हैं। यह स्थिति एक नई वास्तविकता को जन्म देती है, जिसे विशेषज्ञ डीसैलीनेशन डिपेंडेंसी कहते हैं।


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स्थिर ढांचे हैं ये प्लांट्स इसीलिए मजबूरी भी
तेल पाइपलाइन या भंडारण टर्मिनलों के विपरीत, डीसैलीनेशन प्लांट्स को न तो आसानी से बदला जा सकता है और न ही बायपास किया जा सकता है। किसी बड़े संयंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचने पर उसकी मरम्मत में महीनों या उससे अधिक समय लग सकता है। यही वजह है कि ये जहां पर भी हैं, उनका संरक्षण संबंधित देशों की मजबूरी भी है।

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