Explainer: क्या है चीन का नकली सूरज, 582 टन का सबसे बड़ा मैग्नेट क्यों माना जा रहा गेमचेंजर?
चीन ने अपने 'आर्टिफिशियल सन' प्रोजेक्ट के लिए 582 टन का दुनिया का सबसे बड़ा सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट और सेंट्रल सोलनॉइड कॉइल सफलतापूर्वक परीक्षण कर लिया है। यह उपलब्धि नियंत्रित न्यूक्लियर फ्यूजन के जरिए भविष्य में स्वच्छ और लगभग असीमित ऊर्जा विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। आइए विस्तार से जानते हैं।
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विस्तार
दुनिया में स्वच्छ और लगभग असीमित ऊर्जा की खोज के बीच चीन का कृत्रिम सूरज प्रोजेक्ट लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। यह परियोजना परमाणु संलयन (Nuclear Fusion) के जरिए भविष्य में ऐसी ऊर्जा विकसित करने की कोशिश कर रही है, जो कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कर सके। हाल ही में इस परियोजना ने एक और बड़ी तकनीकी उपलब्धि हासिल की है, जिसके बाद यह फिर चर्चा में आ गई है। आइए जानते हैं कि आखिर यह प्रोजेक्ट क्या है, अभी क्यों चर्चा में है, इसका उद्देश्य क्या है और अब तक इसमें क्या-क्या हासिल हुआ है।
अभी क्यों चर्चा में है?
चीन ने अपने फ्यूजन रिएक्टर के लिए 582 टन वजनी दुनिया का सबसे बड़ा टोरॉयडल फील्ड सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट तैयार कर लिया है। इस मैग्नेट ने सभी तकनीकी परीक्षण सफलतापूर्वक पास कर लिए हैं। इसके साथ ही हाई-टेम्परेचर सुपरकंडक्टिंग सेंट्रल सोलनॉइड कॉइल का भी सफल परीक्षण हुआ है।
चीन का कहना है कि इन दोनों उपकरणों की मुख्य तकनीक पूरी तरह देश में विकसित की गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार ये दोनों फ्यूजन रिएक्टर के सबसे महत्वपूर्ण और सबसे जटिल हिस्सों में शामिल हैं। इनके सफल परीक्षण को नियंत्रित न्यूक्लियर फ्यूजन को केवल प्रयोगशाला के प्रयोग से आगे बढ़ाकर भविष्य के व्यावहारिक ऊर्जा स्रोत में बदलने की दिशा में बड़ी तकनीकी उपलब्धि है।
हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि चीन ने फ्यूजन से बिजली बनानी शुरू कर दी है। अभी यह परियोजना अनुसंधान और परीक्षण के चरण में है। पूरे रिएक्टर की असेंबली और लंबे समय तक संचालन सहित कई चरण अभी बाकी हैं।
क्या है चीन का 'आर्टिफिशियल सन'?
चीन का 'आर्टिफिशियल सन' एक्सपेरिमेंटल एडवांस्ड सुपरकंडक्टिंग टोकामक (EAST) नाम का एक प्रयोगात्मक न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर है। इसे चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज (CAS) के इंस्टीट्यूट ऑफ प्लाज्मा फिजिक्स (ASIPP) ने विकसित किया है। यह कोई कृत्रिम सूरज नहीं है, बल्कि एक ऐसी वैज्ञानिक परियोजना है जिसमें सूर्य के भीतर होने वाली न्यूक्लियर फ्यूजन प्रक्रिया को धरती पर नियंत्रित तरीके से दोहराने की कोशिश की जाती है।
सूर्य के भीतर हाइड्रोजन के परमाणु आपस में मिलकर हीलियम बनाते हैं और इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। यदि यही प्रक्रिया धरती पर सुरक्षित तरीके से नियंत्रित हो जाए तो भविष्य में लगभग असीमित, स्वच्छ और कार्बन-मुक्त ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
इस परियोजना का उद्देश्य क्या है?
ईएएसटी परियोजना का मुख्य उद्देश्य भविष्य के फ्यूजन बिजलीघरों के लिए जरूरी तकनीक विकसित करना है। इसके प्रमुख उद्देश्य हैं;
- सूर्य जैसी न्यूक्लियर फ्यूजन प्रक्रिया को धरती पर दोहराना।
- फ्यूजन से बिजली उत्पादन की तकनीक विकसित करना।
- कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना।
- स्वच्छ और कार्बन-मुक्त ऊर्जा उपलब्ध कराना।
- करोड़ों डिग्री तापमान वाले प्लाज्मा को लंबे समय तक स्थिर रखना।
- आईटीईआर और भविष्य के फ्यूजन रिएक्टरों के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी आधार तैयार करना।
- भविष्य में अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए भी विश्वसनीय ऊर्जा स्रोत विकसित करना।
वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री पानी में मौजूद ड्यूटेरियम इस तकनीक का प्रमुख ईंधन है। अनुमान है कि समुद्री पानी के एक लीटर में मौजूद ड्यूटेरियम से लगभग 300 लीटर पेट्रोल के बराबर ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
न्यूक्लियर फ्यूजन क्या है?
न्यूक्लियर फ्यूजन वह प्रक्रिया है जिसमें दो हल्के परमाणु मिलकर एक भारी परमाणु बनाते हैं और इस दौरान बहुत अधिक ऊर्जा निकलती है। यही प्रक्रिया सूर्य और अन्य तारों के भीतर लगातार होती रहती है। वैज्ञानिक इसी प्रक्रिया को धरती पर नियंत्रित तरीके से दोहराने की कोशिश कर रहे हैं।
फ्यूजन तकनीक इतनी कठिन क्यों है?
फ्यूजन के लिए प्लाज्मा का तापमान 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस से अधिक रखना पड़ता है। इतने तापमान पर कोई भी धातु पिघल जाएगी। इसलिए प्लाज्मा को किसी बर्तन में नहीं रखा जा सकता। इसे केवल अत्यंत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की मदद से नियंत्रित रखा जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार केवल तापमान हासिल करना पर्याप्त नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती प्लाज्मा को हजारों सेकंड तक स्थिर और नियंत्रित रखना है, क्योंकि भविष्य में लगातार बिजली उत्पादन के लिए यही सबसे जरूरी शर्त है।
ईएएसटी कैसे काम करता है?
ईएएसटी एक टोकामक रिएक्टर है। इसका आकार डोनट जैसा होता है। इसके भीतर सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट की मदद से अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को गोलाकार रास्ते में नियंत्रित रखा जाता है, ताकि वह रिएक्टर की दीवारों को न छुए।
582 टन का सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट क्यों महत्वपूर्ण है?
टोरॉयडल फील्ड सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट फ्यूजन रिएक्टर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसका काम करोड़ों डिग्री गर्म प्लाज्मा को शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र के भीतर नियंत्रित रखना है। अगर प्लाज्मा रिएक्टर की दीवार से टकरा जाए तो पूरा प्रयोग विफल हो सकता है। वैज्ञानिक इसे "अदृश्य चुंबकीय पिंजरा" भी कहते हैं। इसकी प्रमुख विशेषताएं,
- लंबाई: 21 मीटर
- चौड़ाई: 12 मीटर
- ऊंचाई: 3.3 मीटर
- वजन: 582 टन
क्यों है यह मैग्नेट खास?
- दुनिया का सबसे बड़ा फ्यूजन रिएक्टर सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट।
- इसका आकार आईटीईआर के समान मैग्नेट से लगभग 1.3 गुना बड़ा है।
- इसकी ऊर्जा भंडारण क्षमता ITER के समान मैग्नेट से तीन गुना अधिक है।
- 98 हजार एम्पीयर (98 kA) करंट पर काम करता है।
- कुल ऊर्जा भंडारण क्षमता 120 गीगाजूल है।
- 16 ऐसे मैग्नेट मिलकर प्लाज्मा के केंद्र में 6.5 टेस्ला का चुंबकीय क्षेत्र बनाएंगे।
- अधिकतम चुंबकीय क्षेत्र 14.5 टेस्ला तक पहुंच सकता है।
- इसे माइनस 268.95 डिग्री सेल्सियस तापमान, उच्च करंट, तीव्र विकिरण और भारी यांत्रिक दबाव जैसी परिस्थितियों में लगभग 60 वर्षों तक काम करने के लिए डिजाइन किया गया है।
इसे बनाना इतना मुश्किल क्यों था?
इस मैग्नेट को विकसित करना इंजीनियरों के लिए सबसे कठिन चुनौतियों में से एक था। इसमें इस्तेमाल होने वाले नाइओबियम-टिन सुपरकंडक्टर की हीट ट्रीटमेंट के दौरान तापमान में केवल कुछ डिग्री का अंतर भी इसकी क्षमता को प्रभावित कर सकता है। वहीं, 10 मीटर से बड़े कॉइल में हर जगह समान तापमान बनाए रखना भी बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती थी।
वैज्ञानिकों ने इसके जॉइंट रेजिस्टेंस को केवल 0.04 नैनो-ओम तक सीमित किया, जिससे 100 किलोएम्पियर करंट पर भी लगभग कोई ऊर्जा हानि नहीं होती। कंडक्टर के नमूनों को 4.2 केल्विन तापमान पर 1,000 से अधिक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक और थर्मल चक्रों से गुजारा गया और इसके बाद भी उनका प्रदर्शन तय मानकों से बेहतर रहा।
सेंट्रल सोलनॉइड कॉइल क्या है?
मैग्नेट के साथ जिस हाई-टेम्परेचर सुपरकंडक्टिंग सेंट्रल सोलनॉइड कॉइल का परीक्षण हुआ, उसे फ्यूजन रिएक्टर का "पावर हार्ट" कहा जाता है। वैज्ञानिक इसे कार के स्पार्क प्लग की तरह बताते हैं, क्योंकि यही प्लाज्मा करंट शुरू करता है और पूरे रिएक्टर के संचालन को नियंत्रित करता है।
परीक्षण के दौरान इसमें स्थिर करंट प्रवाहित हुआ। इसकी ऊर्जा भंडारण क्षमता, चुंबकीय क्षेत्र बढ़ाने की गति और जॉइंट रेजिस्टेंस जैसे प्रमुख प्रदर्शन मानक अंतरराष्ट्रीय स्तर के पाए गए। यही कॉइल तय करती है कि फ्यूजन रिएक्टर सफलतापूर्वक शुरू होगा और लंबे समय तक स्थिर रह पाएगा या नहीं।
चीन के लिए यह उपलब्धि क्यों अहम है?
चीन के अनुसार इस परियोजना में इस्तेमाल हुई सुपरकंडक्टिंग टेप, उच्च-शक्ति क्रायोजेनिक स्टेनलेस स्टील, विशेष इन्सुलेशन सामग्री, स्ट्रक्चरल डिजाइन, प्रिसिजन वाइंडिंग, अल्ट्रा-लो रेजिस्टेंस जॉइंट और क्वेंच प्रोटेक्शन सिस्टम सहित पूरी तकनीक का 100% स्थानीयकरण कर लिया गया है। इससे किसी दूसरे देश की तकनीक पर निर्भरता लगभग समाप्त हो गई है। इस परियोजना के दौरान;
- 47 पेटेंट मिले।
- 25 औद्योगिक मानक विकसित हुए।
- सुपरकंडक्टिंग टेप की लागत 400 युआन प्रति मीटर से घटाकर 100 युआन प्रति मीटर की गई।
- इससे चीन की फ्यूजन तकनीक में आत्मनिर्भरता बढ़ी है।
इस परियोजना ने चीन में सुपरकंडक्टिंग सामग्री, विशेष धातुओं, सिस्टम इंटीग्रेशन और प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी पूरी घरेलू फ्यूजन इंडस्ट्री को भी मजबूत किया है। इससे चीन केवल अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं के लिए उपकरण बनाने वाला देश नहीं, बल्कि पूरी फ्यूजन तकनीक विकसित करने वाला देश बनने की दिशा में आगे बढ़ा है।
ईएएसटी परियोजना कब शुरू हुई?
- 1998: परियोजना को मंजूरी मिली।
- 2000: निर्माण शुरू हुआ।
- 2005: असेंबली पूरी हुई।
- 2006: संचालन शुरू हुआ और पहला प्लाज्मा प्राप्त हुआ।
- 2007: परियोजना को सफल घोषित किया गया।
अब तक कौन-कौन सी बड़ी उपलब्धियां मिलीं?
- 2018: पहली बार 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस प्लाज्मा तापमान हासिल किया।
- 2021: 12 करोड़ डिग्री सेल्सियस तापमान 101 सेकंड और 16 करोड़ डिग्री तापमान 20 सेकंड तक बनाए रखा।
- 2022: 1,056 सेकंड तक लगातार उच्च तापमान वाला प्लाज्मा बनाए रखने का रिकॉर्ड बनाया।
- 2023: 403 सेकंड तक स्थिर प्लाज्मा बनाए रखकर विश्व रिकॉर्ड बनाया।
- 2025: 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान वाले प्लाज्मा को 1,066 सेकंड तक स्थिर रखकर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। यह उपलब्धि 22 चरणों के भौतिकी प्रयोगों और लगभग 1.6 लाख परीक्षणों के बाद हासिल हुई।
- 2026: दुनिया का सबसे बड़ा 582 टन सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट और सेंट्रल सोलनॉइड कॉइल सफल परीक्षण में पास हुए।
आईटीईआर से इसका क्या संबंध है?
आईटीईआर (इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर) फ्रांस में बन रहा दुनिया का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय फ्यूजन प्रोजेक्ट है। इसमें भारत, चीन, अमेरिका, यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और रूस सहित 35 देश शामिल हैं। चीन 2006 से इसका सदस्य है और परियोजना के 9% से अधिक प्रमुख उपकरणों के विकास और निर्माण की जिम्मेदारी निभा रहा है। ईएएसटी में विकसित तकनीकों का उपयोग आईटीईआर और भविष्य के फ्यूजन रिएक्टरों के विकास में किया जा रहा है।
आगे क्या?
चीन की तीन-चरणीय योजना के तहत 2027 के अंत तक 'बर्निंग प्लाज्मा एक्सपेरिमेंटल सुपरकंडक्टिंग टोकामक' को पूरा करने का लक्ष्य है। इसके बाद 2030 के आसपास फ्यूजन से बिजली उत्पादन की दिशा में अगला चरण शुरू करने की योजना है। अंतिम लक्ष्य चाइना फ्यूजन इंजीनियरिंग डेमोंस्ट्रेशन रिएक्टर (CFEDR) विकसित करना है, जिसे दुनिया का पहला फ्यूजन डेमोंस्ट्रेशन पावर स्टेशन बनाने की योजना है।
क्या अब चीन फ्यूजन से बिजली बनाने लगा है?
अभी नहीं। वैज्ञानिकों के अनुसार 582 टन के सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट और सेंट्रल सोलनॉइड कॉइल का सफल परीक्षण पूरे लक्ष्य का लगभग 80% हिस्सा पूरा होने जैसा है। हालांकि, पूरे रिएक्टर की असेंबली और अत्यधिक परिस्थितियों में लंबे समय तक परीक्षण अभी बाकी हैं। इसलिए व्यावसायिक स्तर पर फ्यूजन से बिजली उत्पादन में अभी समय लगेगा।