बदल रही है कमर्शियल वाहनों की तस्वीर: FY30 तक CNG, LNG और EV का बढ़ेगा दबदबा, ICRA की रिपोर्ट में बड़ा अनुमान
भारतीय वाणिज्यिक वाहन उद्योग में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पारंपरिक ईंधन की घटती लोकप्रियता के बीच सीएनजी और एलएनजी का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि आने वाली नई बढ़ोतरी में तेजी से केवल वैकल्पिक ईंधन वाहनों का ही दबदबा रहेगा।
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भारत का कमर्शियल व्हीकल उद्योग धीरे-धीरे पारंपरिक ईंधनों से निकलकर वैकल्पिक ईंधनों की ओर बढ़ रहा है। रेटिंग एजेंसी ICRA की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2030 (FY30) तक देश में CNG (सीएनजी) और LNG (एलएनजी) से चलने वाले कमर्शियल वाहनों की हिस्सेदारी 30-35 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह आंकड़ा FY26 में 25 प्रतिशत था।
रिपोर्ट के अनुसार, अगर इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) को भी इसमें शामिल किया जाए, तो FY30 तक कमर्शियल व्हीकल बाजार में वैकल्पिक ईंधनों की कुल हिस्सेदारी 40-45 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। FY26 में यह हिस्सेदारी 27 प्रतिशत दर्ज की गई थी।
CNG और LNG की हिस्सेदारी इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही है?
पिछले कुछ वर्षों में सीएनजी और एलएनजी ने कमर्शियल वाहन उद्योग में अपनी मजबूत जगह बनाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, FY21 में इनकी हिस्सेदारी सिर्फ 7 प्रतिशत थी, जो बढ़कर FY26 में 25 प्रतिशत हो गई।
ICRA का मानना है कि पारंपरिक ईंधनों के मुकाबले CNG और LNG अब एक व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरे हैं, इसलिए आने वाले वर्षों में इनका उपयोग और बढ़ सकता है।
EV की हिस्सेदारी कितनी बढ़ने की उम्मीद है?
रिपोर्ट में इलेक्ट्रिक कमर्शियल वाहनों को लेकर भी सकारात्मक अनुमान जताया गया है।
10-15% तक पहुंच सकती है हिस्सेदारी:
FY30 तक कमर्शियल वाहन बाजार में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी 10-15 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
बसें बनेंगी सबसे बड़ी ताकत:
इस वृद्धि में सबसे ज्यादा योगदान मीडियम और हेवी कमर्शियल व्हीकल श्रेणी की इलेक्ट्रिक बसों का रहने की संभावना जताई गई है।
डीजल का दबदबा क्यों घट रहा है?
कमर्शियल वाहन बाजार में डीजल की हिस्सेदारी लगातार कम हो रही है।
67% पर पहुंचा डीजल का हिस्सा:
FY21 में जहां डीजल की हिस्सेदारी 86 प्रतिशत थी, वहीं FY26 में यह घटकर 67 प्रतिशत रह गई।
रिपोर्ट के मुताबिक इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं-
सख्त उत्सर्जन नियम:
नए उत्सर्जन मानकों ने वैकल्पिक ईंधनों की ओर बदलाव को गति दी है।
कम कुल परिचालन लागत:
CNG, LNG और अन्य वैकल्पिक ईंधनों की कुल स्वामित्व लागत कई मामलों में अधिक आकर्षक साबित हो रही है।
वहीं, पेट्रोल की हिस्सेदारी FY26 में 10 प्रतिशत से कम रही और इसका उपयोग मुख्य रूप से लाइट कमर्शियल व्हीकल (LCV) सेगमेंट तक सीमित रहा।
कौन-से कमर्शियल वाहन सबसे तेजी से बदलेंगे?
ICRA के अनुसार, सभी वाहन श्रेणियों में बदलाव की गति समान नहीं होगी।
लाइट कमर्शियल व्हीकल (LCV):
FY30 तक इस श्रेणी में वैकल्पिक ईंधनों की हिस्सेदारी 50-55 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
मीडियम और हेवी कमर्शियल व्हीकल (M&HCV):
इस श्रेणी में वैकल्पिक ईंधनों की हिस्सेदारी 25-30 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
यानी छोटे कमर्शियल वाहनों में बदलाव की रफ्तार बड़े ट्रकों और भारी वाहनों की तुलना में ज्यादा तेज रहने की संभावना है।
किस ईंधन में सबसे ज्यादा बचत हो सकती है?
रिपोर्ट में विभिन्न श्रेणियों के ट्रकों की कुल स्वामित्व लागत (TCO) की भी तुलना की गई है।
11-12 टन इलेक्ट्रिक ट्रक:
इनकी कुल स्वामित्व लागत डीजल और CNG ट्रकों की तुलना में 15-25 प्रतिशत कम बताई गई है।
55 टन इलेक्ट्रिक ट्रक:
इनकी कुल लागत डीजल ट्रकों की तुलना में 10-15 प्रतिशत कम, लेकिन LNG ट्रकों की तुलना में 15-20 प्रतिशत अधिक रहने का अनुमान है।
रिपोर्ट के अनुसार, पीएम ई-ड्राइव स्कीम (PM E-Drive Scheme) के तहत मिलने वाले खरीद प्रोत्साहन इलेक्ट्रिक ट्रकों की शुरुआती खरीद लागत कम करने में मदद कर रहे हैं।
वाहन निर्माता किस दिशा में काम कर रहे हैं?
ICRA की सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और को-ग्रुप हेड किंजल शाह के अनुसार, भारतीय कमर्शियल वाहन निर्माता भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कई ईंधन तकनीकों पर एक साथ काम कर रहे हैं।
रिसर्च और डेवलपमेंट (R&D) में निवेश बढ़ रहा है:
कंपनियां अलग-अलग वैकल्पिक ईंधनों के अनुरूप अपने उत्पादों को तैयार करने के लिए अनुसंधान पर ज्यादा निवेश कर रही हैं।
मॉड्यूलर व्हीकल आर्किटेक्चर पर जोर:
निर्माता ऐसे प्लेटफॉर्म विकसित कर रहे हैं, जिनमें मुख्य पुर्जों को एक जैसा रखते हुए जरूरत के अनुसार अलग-अलग ईंधन तकनीकों को आसानी से शामिल किया जा सके।
क्या वाहन निर्माताओं के सामने चुनौतियां भी हैं?
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वैकल्पिक ईंधनों की बढ़ती हिस्सेदारी के साथ कंपनियों के सामने कुछ नई चुनौतियां भी आ सकती हैं।
डीजल उत्पादन क्षमता पर असर:
यदि वैकल्पिक ईंधनों का उपयोग तेजी से बढ़ता है, तो डीजल पावरट्रेन के लिए बनाई गई मौजूदा उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं हो पाएगा।
उत्पादन इकाइयों में बदलाव की जरूरत: मौजूदा फैक्ट्रियों को नए ईंधनों के अनुरूप ढाला जा सकता है, लेकिन इसकी लागत सभी तकनीकों में समान नहीं होगी।
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CNG और LNG प्लेटफॉर्म: बदलाव की लागत अपेक्षाकृत कम रहने की संभावना है।
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इलेक्ट्रिक, हाइड्रोजन इंटरनल कंबशन और हाइड्रोजन फ्यूल सेल वाहन: इन तकनीकों के लिए बदलाव की लागत अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है।
ICRA ने सबसे बड़ी चुनौती किसे बताया?
किंजल शाह के अनुसार, भारत जैसे लागत-संवेदनशील बाजार में कुल स्वामित्व लागत अब भी सबसे महत्वपूर्ण कारक बना हुआ है।
उन्होंने कहा कि वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देने की दिशा में काम जारी है, लेकिन वाहनों की ऊंची शुरुआती कीमत और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी अभी भी सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हैं।
रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष क्या है?
ICRA का मानना है कि भारतीय कमर्शियल वाहन उद्योग वैकल्पिक ईंधनों की ओर बदलाव के लिए तेजी से तैयार हो रहा है। इस बदलाव के पीछे बाजार की मांग, सरकारी नीतियां, तकनीकी विकास और परिचालन लागत जैसे कई कारक काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, भले ही कमर्शियल वाहन उद्योग की कुल बिक्री पर इस बदलाव का बड़ा असर न पड़े, लेकिन आने वाले वर्षों में बाजार में होने वाली नई वृद्धि का बड़ा हिस्सा CNG, LNG और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसे वैकल्पिक ईंधनों से आने की संभावना है।