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NHAI: टोल लेने के बावजूद खराब सड़क देना 'सेवा में कमी', कोर्ट का फैसल- पीड़ित कार मालिक को देना होगा मुआवजा

Mon, 29 Jun 2026 09:24 PM IST
Amar Sharma ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amar Sharma Updated Mon, 29 Jun 2026 09:24 PM IST
सार

महाराष्ट्र के नागपुर स्थित जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एक अहम फैसले में कहा है कि टोल शुल्क वसूलने के बावजूद सड़क का उचित रखरखाव न करना 'सेवा में कमी माना जाएगा। आयोग ने यह फैसला उस मामले में सुनाया, जिसमें गड्ढों वाली सड़क के कारण एक वाहन क्षतिग्रस्त हो गया था।

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Consumer Commission Orders NHAI to Pay Compensation, Says Poor Roads Despite Toll Is Deficiency in Service
NHAI Ordered To Pay Compensation - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

टोल टैक्स चुकाने के बाद भी नेशनल हाईवे पर हिचकोले खाने और गड्ढों के कारण अपनी गाड़ी खराब होने की मार झेलने वाले आम वाहन चालकों के लिए एक राहत देने वाली खबर आई है। महाराष्ट्र के नागपुर में एक उपभोक्ता आयोग ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कहा है कि जब कोई अथॉरिटी ग्राहकों से टोल टैक्स वसूलती है, तो उसके बदले में अच्छी और सुरक्षित सड़कें देना उसकी कानूनी जिम्मेदारी है। ऐसा न करना और गड्ढों वाली बदहाल सड़कें देना सीधे तौर पर "सेवा में कमी" माना जाएगा।

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कोर्ट ने इस मामले में नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) को सीधे तौर पर जिम्मेदार मानते हुए एक कार मालिक को मुआवजा देने का कड़ा आदेश जारी किया है। जिसकी गाड़ी हाईवे पर बने एक गहरे और खतरनाक गड्ढे के कारण दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, नागपुर ने अपने फैसले में साफ कहा, "टोल वसूलना और उसके बाद भी खराब सड़क देना सेवा में बड़ी लापरवाही है।" 

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कार मालिक के साथ सफर के दौरान आखिर क्या हादसा हुआ था?

यह पूरा मामला एक साधारण सफर के दौरान हुई परेशानी से जुड़ा है, जो आखिरकार कोर्ट की दहलीज तक पहुंच गया:

  • तारीख और रूट: शिकायतकर्ता 2 अक्तूबर 2020 को अपनी कार से नागपुर (महाराष्ट्र) से छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) की यात्रा पर निकले थे। उन्होंने इसके लिए तय टोल टैक्स का भुगतान भी किया था।

  • गहरे गड्ढे ने बिगाड़ी गाड़ी की चाल: सफर के दौरान उनकी कार अचानक एक बहुत ही नुकीले और गहरे गड्ढे से टकरा गई। झटका इतना जोरदार था कि कार के स्टील व्हील का रिम बुरी तरह मुड़ गया और टायर अपनी जगह से बाहर निकल आया।

  • सफर में देरी और मानसिक परेशानी: कार मालिक को अपना आगे का सफर स्टेपनी (स्पेयर टायर) के भरोसे किसी तरह पूरा करना पड़ा। यही नहीं, गाड़ी की मरम्मत कराने के लिए उन्हें मजबूरन अपनी यात्रा को एक दिन और बढ़ाना पड़ा, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बर्बाद हुए। 

टोल प्लाजा और हाईवे अधिकारियों ने शिकायत पर क्या रुख अपनाया?

हादसे के बाद जब पीड़ित ने अपनी आवाज उठानी चाही, तो अधिकारियों ने हमेशा की तरह उसे नजरअंदाज करने की कोशिश की:

  • नहीं दी गई शिकायत पुस्तिका: अपनी वापसी यात्रा के दौरान जब पीड़ित ने टोल प्लाजा के कर्मचारियों से शिकायत दर्ज करने के लिए कंप्लेंट बुक मांगी, तो उन्होंने यह बहाना बनाकर मना कर दिया कि संबंधित प्रभारी अधिकारी वहां मौजूद नहीं हैं।

  • कानूनी नोटिस को भी किया गया अनदेखा: इसके बाद कार मालिक ने हाईवे अधिकारियों को एक औपचारिक नोटिस भेजा, जिसमें उन्होंने केवल अपनी गाड़ी की मरम्मत पर हुआ खर्च मांगा था। लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार, "अधिकारियों की जनता की समस्याओं को नजरअंदाज करने की आदत और प्रवृत्ति" होती है, इसलिए उन्होंने इस नोटिस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया। आखिरकार, थक-हारकर उन्होंने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। 

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एनएचएआई (NHAI) ने अपनी सफाई में अदालत में क्या दलील दी?

आयोग से नोटिस मिलने के बाद एनएचएआई की छिंदवाड़ा यूनिट ने लिखित जवाब दाखिल किया, जिसमें उन्होंने अजीबोगरीब दलीलें दीं:

  • गड्ढों की बात तो मानी, पर मौसम को कोसा: एनएचएआई ने यह बात तो स्वीकार की कि सड़क पर गड्ढे थे, लेकिन इसका दोष भारी बारिश और ट्रैफिक के भारी दबाव पर मढ़ दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि उस समय मरम्मत का काम चल रहा था।

  • कार मालिक से ही मांग लिया सबूत: अथॉरिटी ने शिकायतकर्ता को हुई असुविधा के लिए खेद तो जताया, लेकिन साथ ही केस को खारिज करने की मांग कर दी। उनकी दलील थी कि कार मालिक ने इस बात का कोई सबूत नहीं दिया है कि वह अपनी गाड़ी का नियमित मेंटेनेंस कराता था। 

उपभोक्ता अदालत ने एनएचएआई की दलीलों को क्यों खारिज कर दिया?

नागपुर उपभोक्ता आयोग ने एनएचएआई के बचाव को पूरी तरह से सिरे से खारिज कर दिया और उपभोक्ता कानून की ताकत को रेखांकित किया:

  • मेंटेनेंस रिकॉर्ड दिखाना जरूरी नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत कोई भी ग्राहक कानूनी रूप से अपनी गाड़ी के नियमित रखरखाव के रिकॉर्ड दिखाने के लिए बाध्य नहीं है। इस मामले में केवल यह साबित कर देना ही काफी है कि गाड़ी को सीधा नुकसान सड़क पर बने गड्ढे की वजह से हुआ था।

  • मुख्य यूनिट पर तय की जवाबदेही: अदालत ने इस पूरे मामले में दिल्ली स्थित एनएचएआई मुख्यालय और स्थानीय नागपुर कार्यालय के खिलाफ शिकायतों को खारिज कर दिया। लेकिन एनएचएआई की छिंदवाड़ा प्रोजेक्ट कार्यान्वयन इकाई को इस विशिष्ट रूट के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए पूरी लायबिलिटी उसी पर तय की। 

कोर्ट ने पीड़ित को कितना मुआवजा देने का आदेश दिया है?

उपभोक्ता आयोग ने एनएचएआई की लापरवाही पर कड़ा रुख अपनाते हुए शिकायतकर्ता के पक्ष में निम्नलिखित हर्जाना तय किया है:

  • मरम्मत और टोल रिफंड: कोर्ट ने एनएचएआई छिंदवाड़ा यूनिट को आदेश दिया कि वह वाहन की मरम्मत पर हुए खर्च और टोल की राशि के रूप में 1,030 रुपये का भुगतान करे।

  • मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का हर्जाना: पीड़ित को सफर के दौरान हुई मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के बदले 10,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया है।

  • अदालती खर्च की भरपाई: इसके अलावा मुकदमेबाजी की लागत (Litigation costs) के रूप में ₹5,000 अलग से देने होंगे। यानी एनएचएआई को कुल मिलाकर ₹16,030 चुकाने होंगे।


    45 दिनों का अल्टीमेटम

    नागपुर उपभोक्ता आयोग ने अपने फैसले के आखिर में एनएचएआई छिंदवाड़ा प्रोजेक्ट यूनिट को साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि वे उपभोक्ता को इस मुआवजे की पूरी राशि का भुगतान करने के लिए 45 दिनों की समयसीमा के भीतर कदम उठाएं।
     

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