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EV Industry Budget: चार्जिंग से बैटरी तक ईवी सेक्टर को टैक्स की मार, क्या सरकार हटाएगी IDS का रोड़ा?

ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जागृति Updated Fri, 16 Jan 2026 11:05 AM IST
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सार

GST on EVs: ईवी उद्योग ने आगामी केंद्रीय बजट से पहले सरकार से इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर को ठीक करने की गुहार लगाई है। इंडस्ट्री का कहना है कि मौजूदा टैक्स सिस्टम EV को ICE वाहनों के मुकाबले कम प्रतिस्पर्धी बना रहा है।

EV Industry Budget From charging batteries EV sector faces tax burdens will government remove hurdles
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : freepik
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विस्तार
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यूनियन बजट से पहले EV इंडस्ट्री ने इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर, जीएसटी असमानता और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर टैक्स राहत की मांग तेज कर दी है। वर्तमान में तैयार ईवी पर पांच प्रतिशत टैक्स है, जबकि उनके पार्ट्स पर 18 प्रतिशत तक जीएसटी लगता है, जिससे कंपनियों की लागत बढ़ रही है और ग्राहकों के लिए ICE (पेट्रोल-डीजल) गाड़ियां फिर से सस्ती होने लगी हैं।

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जानें क्या है पूरा मामला?

वर्तमान में एक तैयार इलेक्ट्रिक कार या स्कूटर बेचने पर कंपनी को केवल पांच प्रतिशत जीएसटी देना पड़ता है, लेकिन इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले स्पेयर पार्ट्स, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और मैग्नेटिक कोर जैसी चीजों पर कंपनियों को 18 प्रतिशत से 28 प्रतिशत तक जीएसटी चुकाना पड़ता है। इसका मतलब साफ है कि इनपुट यानी की कच्चा माल पर टैक्स ज्यादा है। मुकाबले आउटपुट यानी की तैयार माल के। इससे कंपनियों पर पैसा टैक्स रिफंड के चक्कर में फंस जाता है और वर्किंग कैपिटल की कमी हाे जाती है। जेनर्जाइज के सीईओ और को-फाउंडर के अनुसार इन कारणों से घरेलू मैन्युफैक्चरर्स प्रभावित हो रहे हैं।

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GST 2.0 से ICE वाहनों को बढ़त

जीएसटी 2.0 के तहत आईसीई सेगमेंट के कुछ हिस्सों में टैक्स दरों में बदलाव किया गया है, जिससे ईवी और आईसीई वाहनों के बीच कीमत का अंतर कम हो गया है। इसका असर ये हुआ है कि कुल लागत के लिहाज से आईसीई वाहन फिर से ग्राहकों के लिए ज्यादा आकर्षक बनते जा रहे हैं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर की वजह से ईवी कंपनियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का पूरा फायदा नहीं मिल पा रहा है। ईवी पर जीएसटी पांच प्रतिशत है, जबकि ज्यादातर इनपुट्स पर टैक्स ज्यादा है। 

क्या है इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर?

जब तैयार प्रोडक्ट पर टैक्स कम और उसके कच्चे माल या पार्ट्स पर टैक्स ज्यादा हो, तो उसे इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (IDS) कहते हैं। इस वजह से कंपनियों का इनपुट टैक्स क्रेडिट फंस जाता है, जिससे वर्किंग कैपिटल पर दबाव बढ़ता है।
22 सितंबर 2025 से पार्ट्स और कंपोनेंट्स पर जीएसटी 28 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया, जिससे ईवी इंडस्ट्री को कुछ राहत मिली। हालांकि, तैयार वाहन और इनपुट्स के बीच टैक्स असमानता अब भी बनी हुई है, जिससे लागत पूरी तरह कम नहीं हो पा रही है।

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चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को भी मिलना चाहिेए जीएसटी का फायदा

इंडस्ट्री का कहना है कि EV को बढ़ावा देने के लिए सिर्फ वाहन ही नहीं, बल्कि चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, चार्जिंग सर्विस और बैटरी स्वैपिंग को भी साफ जीएसटी का फायदा मिलना चाहिए। ईवाई इंडिया के पार्टनर सौरभ अग्रवाल के अनुसार ईवी को किफायती बनाए रखने के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरी स्वैपिंग सहित पूरे ईवी इकोसिस्टम को जीएसटी में स्पष्ट फायदा मिलना जरूरी है। इसी के साथ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की पीएम ई-ड्राइव योजना के तहत डिमांड इंसेंटिव उन सेगमेंट्स पर केंद्रित रहना चाहिए। यहां इलेक्ट्रिफिकेशन का असर सबसे ज्यादा है, जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट, शेयर्ड मोबिलिटी, कमर्शियल फ्लीट और लास्ट-माइल डिलीवरी।

सरकार के 2030 तक 30 प्रतिशत ईवी पैठ के लक्ष्य को हासिल करने के लिए इंडस्ट्री ने लगातार और संतुलित पॉलिसी सपोर्ट की मांग की है। इसमें डिमांड इंसेंटिव, सप्लाई साइड सपोर्ट, आर एंड डी और राज्य सरकारों की भागीदारी को अहम बताया गया है। अनिश्चित ग्लोबल ट्रेड माहौल को देखते हुए इंडस्ट्री ने कहा है कि जब तक PLI स्कीम के तहत घरेलू बैटरी सेल मैन्युफैक्चरिंग बड़े स्तर पर शुरू नहीं हो जाती, तब तक जरूरी बैटरी इनपुट्स पर ड्यूटी में छूट जारी रहनी चाहिए।

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