Horn OK Please: भारत में गाड़ियों का हॉर्न बनाना है सबसे बड़ी चुनौती, जानें Ford के CEO ने ऐसा क्यों कहा?
Ford CEO On Indian Honking: फोर्ड के सीईओ जिम फार्ले ने भारत की अनोखी कार हॉर्न संस्कृति को दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण बताया है। सोशल मीडिया पर शेयर किए गए एक वीडियो में उन्होंने कहा कि भारत में कार के हॉर्न सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं, इसलिए उन्हें बेहद मजबूत और टिकाऊ बनाना पड़ता है। फार्ले के मुताबिक, भारतीय सड़कों पर हॉर्न सिर्फ सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि ड्राइवर्स के बीच कम्युनिकेशन का भी अहम हिस्सा है। वीडियो में हॉर्न ओके प्लीज जैसे ट्रक मैसेज और अलग-अलग प्रकार के हॉर्न सिस्टम्स का भी जिक्र किया गया। फोर्ड सीईओ की यह टिप्पणी दिखाती है कि ऑटोमोबाइल कंपनियों को अलग-अलग देशों की ड्राइविंग आदतों के हिसाब से गाड़ियों को डिजाइन करना पड़ता है।
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फोर्ड के सीईओ जिम फार्ले ने भारत की अनोखी कार हॉर्न संस्कृति को दुनिया की सबसे 'चुनौतीपूर्ण' बताया है। सोशल मीडिया पर शेयर किए गए एक वीडियो में उन्होंने कहा कि भारत में कार के हॉर्न सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं, इसलिए उन्हें बेहद मजबूत और टिकाऊ बनाना पड़ता है।
Farley के मुताबिक, भारतीय सड़कों पर हॉर्न सिर्फ सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि ड्राइवर्स के बीच कम्युनिकेशन का भी अहम हिस्सा है। वीडियो में 'हॉर्न ओके प्लीज' जैसे ट्रक मैसेज और अलग-अलग प्रकार के हॉर्न सिस्टम्स का भी जिक्र किया गया। फोर्ड सीईओ की यह टिप्पणी दिखाती है कि ऑटोमोबाइल कंपनियों को अलग-अलग देशों की ड्राइविंग आदतों के हिसाब से गाड़ियों को डिजाइन करना पड़ता है।
फोर्ड सीईओ का दिलचस्प बयान
मशहूर कार कंपनी फोर्ड के सीईओ जिम फार्ले ने भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार और यहां की ड्राइविंग संस्कृति पर एक बेहद दिलचस्प टिप्पणी की है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो क्लिप में फार्ले ने बताया कि भारतीय सड़कों पर जिस तरह और जितनी बार हॉर्न का इस्तेमाल किया जाता है, वह दुनिया में कहीं और नहीं देखा जाता। इसी वजह से उनका मानना है कि भारत में गाड़ियों के लिए हॉर्न बनाना किसी भी कार निर्माता के लिए दुनिया का सबसे चुनौतीपूर्ण काम है।
वीडियो में क्या बोले फोर्ड के सीईओ?
वीडियो की शुरुआत में जिम फार्ले एक दिलचस्प सवाल उठाते हैं कि आखिर किस देश की गाड़ियों में सबसे मजबूत हॉर्न की जरूरत पड़ती है। इस सवाल का जवाब देते हुए वे खुद भारत का नाम लेते हैं और बताते हैं कि भारतीय सड़कों की परिस्थितियों को देखते हुए यहां के हॉर्न न केवल सबसे ज्यादा मजबूत होने चाहिए। बल्कि उनकी उम्र भी सबसे लंबी होनी चाहिए, क्योंकि किसी भी अन्य देश के मुकाबले भारत में इनका इस्तेमाल सबसे ज्यादा बार किया जाता है।
भारत में हॉर्न बजाना 'बातचीत' का एक तरीका है
फार्ले ने पश्चिमी देशों और भारत के ड्राइविंग व्यवहार के बीच एक बड़ा अंतर स्पष्ट करते हुए बताया कि जहां पश्चिमी देशों में हॉर्न का इस्तेमाल केवल इमरजेंसी या सुरक्षा के लिहाज से बहुत कम किया जाता है और बेवजह हॉर्न बजाना गलत माना जाता है, वहीं भारत में स्थिति पूरी तरह अलग है। उन्होंने कहा कि यहां हॉर्न बजाना ड्राइवरों के बीच आपस में 'बातचीत' करने का एक माध्यम बन गया है। भारतीय सड़कों पर भीड़-भाड़ के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने, सामने वाले को अलर्ट करने या ओवरटेक करने के लिए ड्राइवर लगातार हॉर्न का उपयोग करते हैं, जिससे यह गाड़ी का एक बेहद अहम और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला हिस्सा बन जाता है।
'हॉर्न ओके प्लीज' का भी हुआ जिक्र
चर्चा के दौरान वीडियो के सह-होस्ट ने भारतीय सड़कों की एक और खास बात का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि भारत में ट्रकों और कमर्शियल गाड़ियों के पीछे अक्सर हॉर्न ओके प्लीज लिखा होता है, जो पीछे वाली गाड़ी को ओवरटेक करते समय हॉर्न बजाने का न्योता देता है। इसके अलावा, भारतीय गाड़ियों में कई बार अलग-अलग तरह के हॉर्न भी लगाए जाते हैं।
कार कंपनियों के लिए क्या है सबक?
जिम फार्ले की बातों से एक बात साफ होती है कि दुनिया भर की कार बनाने वाली कंपनियों को किसी भी देश के हिसाब से अपनी गाड़ियों की इंजीनियरिंग बदलनी पड़ती है। भारत जैसे बाजार के लिए फोर्ड जैसी कंपनियों को यह पक्का करना होता है कि कार का हॉर्न और दूसरे पुर्जे इतने मजबूत हों कि वे यहां के रोजमर्रा के भारी इस्तेमाल को बिना खराब हुए वर्षो तक झेल सकें।