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Supreme Court: बिना पैनिक बटन और ट्रैकिंग डिवाइस के टैक्सी-बस को नहीं मिलेगा परमिट, SC का राज्यों को निर्देश
ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Jagriti
Updated Thu, 14 May 2026 02:35 PM IST
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सार
National Road Safety Board: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं, बच्चों व वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक बेहद जरूरी कदम उठाया है। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के टैक्सी व अन्य पब्लिक वाहनों में VLTD और पैनिक बटन अनिवार्य रूप से लगने करने के निर्देश दिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
Supreme Court Road Safety Guidelines: देश में बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं और यात्रियों की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने एक बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि टैक्सी और अन्य पब्लिक सर्विस वाहनों में व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस यानी की VLTD और पैनिक बटन लगाने के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर अभी तक देश के एक प्रतिशत से भी कम पब्लिक सर्विस वाहनों में ट्रैकिंग सिस्टम लगाया है, तो यह बेहद चिंताजनक है।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि सभी नए और पुराने पब्लिक सर्विस वाहनों में VLTD और Panic Button लगाए जाएं। साथ ही यह प्रक्रिया समयबद्ध और सत्यापन योग्य हो। इसके साथ ही बिना इन फीचर्स के किसी वाहन को फिटनेस सर्टिफिकेट या ट्रांसपोर्ट परमिट न दिया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन फीचर्स की जानकारी वाहन एप में दर्ज होनी चाहिए।
महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर जोर
कोर्ट का कहना है कि यह सिस्टम खासतौर पर महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों व बच्चों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी होगा। इससे कभी कोई इमरजेंसी होने पर यह पैनिक बटन दबाते ही वाहन की लोकेशन तुरंत ट्रैक की जा सकेगी, जिससे मदद उस व्यक्ति तक आसानी से मदद मिल सकेगी।
वाहन कंपनियों को भी दिया सुझाव
इसी के साथ कोर्ट ने यह सुझाव भी दिया कि ऑटोमोबाइल कंपनियां वाहन निर्माण के दौरान ही VLTD और पैनिक बटन इंस्टॉल करें। इस मामले में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया को वाहन निर्माताओं के साथ चर्चा कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया गया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारत में लेन ड्राइविंग की स्थिति पर भी चिंता जताई। बेंच ने कहा कि भारत में लेन ड्राइविंग की कोई अवधारणा ही नहीं है। कोर्ट के अनुसार लेन अनुशासन सड़क हादसों को काफी हद तक कम कर सकता है। इसलिए सरकार को इस दिशा में गंभीर कदम उठाने चाहिए।
स्पीड गवर्नर नियमों पर भी नाराजगी
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों की आलोचना की। कहा कि उन्होंने स्पीड लिमिटिंग डिवाइस यानी स्पीड गर्वनर लगाने को लेकर भी रिपोर्ट जमा नहीं की गई। कोर्ट का मानना है कि वाहन निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि वाहनों में Speed Limiting Devices लगाए जाएं और सड़क सुरक्षा नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए।
नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड अब तक नहीं बना
सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना है कि पहले भी कई निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड का गठन अब तक नहीं हुआ है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को बोर्ड गठन के लिए अंतिम मौका देते हुए तीन महीने का समय दिया है।
किस मामले में हुई सुनवाई?
यह मामला साल 2012 में दायर एक PIL से जुड़ा है। यह याचिका एस राजशेखरन ने दाखिल की थी, जिसमें बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं, कमजोर रोड सेफ्टी सिस्टम और दुर्घटना के बाद बेहतर इलाज व्यवस्था की मांग उठाई गई थी। तब से सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर सड़क सुरक्षा को लेकर निर्देश जारी करता रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर नियम सख्ती से लागू हुए, तो आने वाले समय में भारत की टैक्सी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पहले से ज्यादा सुरक्षित बन सकती है।
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क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि सभी नए और पुराने पब्लिक सर्विस वाहनों में VLTD और Panic Button लगाए जाएं। साथ ही यह प्रक्रिया समयबद्ध और सत्यापन योग्य हो। इसके साथ ही बिना इन फीचर्स के किसी वाहन को फिटनेस सर्टिफिकेट या ट्रांसपोर्ट परमिट न दिया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि इन फीचर्स की जानकारी वाहन एप में दर्ज होनी चाहिए।
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महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर जोर
कोर्ट का कहना है कि यह सिस्टम खासतौर पर महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों व बच्चों की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी होगा। इससे कभी कोई इमरजेंसी होने पर यह पैनिक बटन दबाते ही वाहन की लोकेशन तुरंत ट्रैक की जा सकेगी, जिससे मदद उस व्यक्ति तक आसानी से मदद मिल सकेगी।
वाहन कंपनियों को भी दिया सुझाव
इसी के साथ कोर्ट ने यह सुझाव भी दिया कि ऑटोमोबाइल कंपनियां वाहन निर्माण के दौरान ही VLTD और पैनिक बटन इंस्टॉल करें। इस मामले में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया को वाहन निर्माताओं के साथ चर्चा कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया गया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भारत में लेन ड्राइविंग की स्थिति पर भी चिंता जताई। बेंच ने कहा कि भारत में लेन ड्राइविंग की कोई अवधारणा ही नहीं है। कोर्ट के अनुसार लेन अनुशासन सड़क हादसों को काफी हद तक कम कर सकता है। इसलिए सरकार को इस दिशा में गंभीर कदम उठाने चाहिए।
स्पीड गवर्नर नियमों पर भी नाराजगी
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई राज्यों की आलोचना की। कहा कि उन्होंने स्पीड लिमिटिंग डिवाइस यानी स्पीड गर्वनर लगाने को लेकर भी रिपोर्ट जमा नहीं की गई। कोर्ट का मानना है कि वाहन निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि वाहनों में Speed Limiting Devices लगाए जाएं और सड़क सुरक्षा नियमों को कड़ाई से लागू किया जाए।
नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड अब तक नहीं बना
सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना है कि पहले भी कई निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद नेशनल रोड सेफ्टी बोर्ड का गठन अब तक नहीं हुआ है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को बोर्ड गठन के लिए अंतिम मौका देते हुए तीन महीने का समय दिया है।
किस मामले में हुई सुनवाई?
यह मामला साल 2012 में दायर एक PIL से जुड़ा है। यह याचिका एस राजशेखरन ने दाखिल की थी, जिसमें बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं, कमजोर रोड सेफ्टी सिस्टम और दुर्घटना के बाद बेहतर इलाज व्यवस्था की मांग उठाई गई थी। तब से सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर सड़क सुरक्षा को लेकर निर्देश जारी करता रहा है। जानकारों का कहना है कि अगर नियम सख्ती से लागू हुए, तो आने वाले समय में भारत की टैक्सी और पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था पहले से ज्यादा सुरक्षित बन सकती है।
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