Car Features: कार के ये सात फीचर्स जो देखने में तो हैं शानदार, लेकिन इस्तेमाल बहुत कम होते हैं
आज भारत में नई कार खरीदना एक बिल्कुल अलग अनुभव बन गया है। आज के जमाने की कारों में फीचर्स की एक लंबी लिस्ट होती है। इसमें कोई शक नहीं कि यह सब बहुत रोमांचक लगता है। लेकिन बड़ी तस्वीर में और भी बहुत कुछ है।
विस्तार
आज भारत में नई कार खरीदना सिर्फ इंजन, माइलेज या सेफ्टी तक सीमित नहीं रहा। शोरूम में कदम रखते ही बड़ी स्क्रीन, हाई-टेक फीचर्स और लंबी फीचर लिस्ट ध्यान खींच लेती है। कई बार तो फीचर्स ही खरीदारी को लेकर ग्राहक का फैसला तय कर देते हैं।
लेकिन भारतीय सड़कें, ट्रैफिक, मौसम और रोजमर्रा की ड्राइविंग आदतें हमेशा इन फीचर्स के मुताबिक नहीं होतीं। नतीजा यह कि कुछ फीचर्स शुरुआती दिनों की उत्सुकता के बाद लगभग इस्तेमाल ही नहीं होते।
यहां ऐसे 7 पॉपुलर कार फीचर्स हैं, जो बुरे नहीं हैं, लेकिन भारत में कम ही काम आते हैं। आखिरी वाला फीचर सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है, फिर भी सबसे कम इस्तेमाल होता है।
1) जेस्चर कंट्रोल
जेस्चर कंट्रोल सुनने में बेहद फ्यूचरिस्टिक लगता है। हाथ हिलाइए और गाना बदल गया, डेमो में यह काफी आकर्षक दिखता है। लेकिन असली ड्राइविंग में यह अक्सर गलत समय पर रिस्पॉन्ड करता है या बिल्कुल करता ही नहीं। कभी-कभी यह ड्राइवर का ध्यान भी भटका देता है। इसी वजह से ज्यादातर लोग कुछ समय बाद इसे बंद कर देते हैं और टचस्क्रीन या स्टीयरिंग कंट्रोल पर लौट आते हैं।
2) पावर्ड टेलगेट
पावर्ड टेलगेट प्रीमियम एहसास देता है, खासकर जब दोनों हाथ भरे हों। लेकिन भारतीय हालात में इसकी धीमी स्पीड, सेंसर एरर और मामूली टक्कर के बाद महंगे रिपेयर का डर इसे कम पसंदीदा बना देता है। तंग पार्किंग या बेसमेंट में कई ड्राइवर मैनुअल बूट को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं।
3) रियर-सीट एंटरटेनमेंट स्क्रीन
पीछे लगी स्क्रीन फैमिली कारों में शानदार लगती हैं। हकीकत यह है कि आज हर किसी के पास स्मार्टफोन या टैबलेट है। बच्चे अपने डिवाइस पसंद करते हैं, बड़े भी। ऊपर से ये स्क्रीन जल्दी आउटडेटेड लगने लगती हैं और टूटने पर रिपेयर महंगा पड़ता है।
4) वॉयस कमांड
वॉयस कमांड का वादा है- हैंड्स-फ्री सुविधा। लेकिन शोर, अलग-अलग एक्सेंट और पहचान में गलती इसे झुंझलाहट भरा बना देती है। एक ही कमांड तीन बार बोलना पड़े, तो लोग जल्दी ही इसे इस्तेमाल करना छोड़ देते हैं।
5) वायरलेस चार्जिंग
वायरलेस चार्जिंग सुविधाजनक लगती है, लेकिन हर बार नहीं। यह केबल से धीमी होती है, फोन गर्म हो जाता है और खराब सड़कों पर फोन फिसलता रहता है। इसलिए ज्यादातर लोग पुराने भरोसेमंद वायर चार्जर पर ही टिके रहते हैं।
6) ऑटो पार्क असिस्ट
ऑटो पार्क असिस्ट तब अच्छा काम करता है जब पार्किंग लाइनें साफ हों और जगह पर्याप्त हो। भारतीय शहरों में तंग जगह, असमान सड़कें और अचानक आती-जाति ट्रैफिक इसे कन्फ्यूज कर देती है। अधिकतर ड्राइवर अपनी जजमेंट पर ज्यादा भरोसा करते हैं।
पैनोरमिक सनरूफ आज कॉम्पैक्ट एसयूवी और मिड-साइज कारों का सबसे बड़ा सेलिंग पॉइंट बन चुका है। लेकिन जहां गर्मियों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर चला जाता है, वहां यह ज्यादातर समय बंद ही रहती है। ब्लाइंड बंद, धूल-पॉल्यूशन की चिंता और लंबे समय की मेंटेनेंस- इन सबके चलते इसका असली इस्तेमाल बहुत कम होता है। अक्सर यह सिर्फ दोस्तों को दिखाने तक सीमित रह जाती है।
ये सभी फीचर्स कार को आकर्षक बनाते हैं और ब्रांड्स को भीड़ से अलग दिखाने में मदद करते हैं। लेकिन भारतीय ग्राहकों के लिए आज भी आरामदायक ड्राइव, भरोसेमंद इंजन, माइलेज और कम मेंटेनेंस जैसी बुनियादी बातें सबसे ऊपर रहती हैं। बाकी फीचर्स अक्सर बस शोरूम तक ही अच्छे लगते हैं।
