Biofuel: अमेरिका में भारत की तर्ज पर बायोफ्यूल को बढ़ावा, जानें ट्रंप के फैसले से ऑटो सेक्टर में क्या बदलेगा?
Trump Biofuel Policy: अमेरिका में ट्रंप सरकार ने भारत की तर्ज पर फ्यूल में बायोफ्यूल ब्लेंडिंग बढ़ाने का बड़ा फैसला लिया है। इस कदम से जहां किसानों की लॉटरी लग गई है, वहीं तेल कंपनियों की लागत बढ़ने से आम जनता के लिए पेट्रोल महंगा होने का डर सता रहा है। साथ ही E15 पेट्रोल को लेकर भी बहस छिड़ गई है। जानिए ऑटोमोबाइल सेक्टर और आपकी जेब पर इस नए फैसले का क्या असर होगा।
विस्तार
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने देश के बायोफ्यूल (जैविक ईंधन) प्रोग्राम को और मजबूत करने का बड़ा फैसला लिया है। ट्रंप प्रशासन ने फ्यूल में बायोफ्यूल मिलाने के नए और बड़े लक्ष्य तय किए हैं। इस फैसले से जहां एक तरफ किसानों के लिए खुशखबरी है, वहीं तेल रिफाइनरियों की टेंशन बढ़ गई है। आइए समझते हैं कि इस फैसले के मायने क्या हैं और यह ऑटोमोबाइल सेक्टर व आम जनता को कैसे प्रभावित करेगा।
क्या है नया फैसला?
अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) के जरिए जारी नए नियमों के तहत देश की ईंधन नीति में एक बड़ा बदलाव किया गया है। इस फैसले के केंद्र में बायोमास आधारित डीजल है, जिसकी ब्लेंडिंग यानी मिलावट की सीमा में 60% से भी अधिक की भारी बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया गया है। यह खास किस्म का डीजल मुख्य रूप से सोयाबीन के तेल, पशु चर्बी और कृषि अवशेषों से तैयार किया जाता है। प्रशासन ने न केवल तात्कालिक बदलाव किए हैं, बल्कि भविष्य के लिए भी मजबूत नींव रखते हुए साल 2026 और 2027 के लिए पेट्रोल व डीजल में रिन्यूएबल फ्यूल मिलाने के नए और महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित कर दिए हैं।
किसानों की बंपर कमाई, तेल कंपनियों की बढ़ी टेंशन
इस नीति का सीधा फायदा मक्का और सोयाबीन उगाने वाले किसानों को होगा। अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रॉलिंस के मुताबिक, इस कदम से किसानों की कमाई में 3 से 4 अरब डॉलर (लगभग 25-33 हजार करोड़ रुपये) तक का भारी उछाल आ सकता है। मांग बढ़ने की उम्मीद में सोयाबीन के दाम इस साल 11% तक बढ़ भी चुके हैं।
लेकिन आम जनता को इससे झटका लग सकता है। फ्यूल रिफाइनरीज इस फैसले से खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि बायोफ्यूल ज्यादा मिलाने से उनकी लागत बढ़ेगी। चूंकि दुनिया भर में पहले ही क्रूड ऑयल की सप्लाई और तनाव को लेकर दिक्कतें चल रही हैं, ऐसे में बढ़ी हुई लागत का बोझ अंततः पेट्रोल पंप पर आम ग्राहकों की जेब पर डाला जा सकता है।
E15 पेट्रोल लाने की तैयारी: क्या गाड़ियों के लिए है सुरक्षित?
ट्रंप प्रशासन अब अमेरिकी संसद पर इस बात के लिए दबाव बना रहा है कि देश में E15 पेट्रोल की साल भर बिक्री को कानूनी मंजूरी दी जाए। वर्तमान में इस्तेमाल होने वाले स्टैंडर्ड 10% इथेनॉल ब्लेंड के मुकाबले, E15 में 15% इथेनॉल मिला होता है। इस कदम के पीछे मुख्य तर्क आर्थिक है- समर्थकों का मानना है कि इससे न केवल पेट्रोल की कीमतें कम होंगी, बल्कि मक्के की भारी खपत से किसानों को भी बड़ा सहारा मिलेगा।
हालांकि, इस बदलाव की राह इतनी आसान नहीं है। ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट्स और आलोचकों ने इंजन की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर की है। उनका मानना है कि अधिक इथेनॉल वाला ईंधन पुरानी गाड़ियों के इंजन और फ्यूल सिस्टम को नुकसान पहुंचा सकता है क्योंकि हर इंजन E15 के साथ तालमेल बिठाने के लिए नहीं बना है। इसके अलावा, इस नीति के व्यापक बाजार और पर्यावरण पर पड़ने वाले दूरगामी असर को लेकर भी विशेषज्ञों के बीच बहस छिड़ी हुई है।
भारत के नजरिए से यह खबर क्यों अहम है?
ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिहाज से देखें तो अमेरिका का यह कदम बिल्कुल भारत सरकार की मौजूदा रणनीति जैसा ही है। भारत में भी पेट्रोल-डीजल पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण को बचाने के लिए बायोफ्यूल (इथेनॉल ब्लेंडिंग) को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। वर्तमान में भारत के कई पेट्रोल पंपों पर E20 पेट्रोल (20% इथेनॉल मिला हुआ पेट्रोल) बिक रहा है और ऑटोमोबाइल कंपनियां भी अपने इंजनों को इसके हिसाब से अपडेट कर रही हैं। अब भारत सरकार E25 फ्यूल (25% इथेनॉल) की तरफ कदम बढ़ाने की तैयारी कर रही है।