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Bihar : अपना हाथ काटकर जेल गए थे लालू यादव, फिर कभी वह गलती नहीं की; क्या तेजस्वी की चाहत है ऐसी?

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सार

Lalu Yadav : भाजपा में 'कार्यकारी' के रास्ते राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं नितिन नवीन। अब राजद की चर्चा शुरू होने वाली है। खूब चर्चा है कि लालू प्रसाद यादव अपनी 'अंतिम शक्ति' भी छोटे बेटे तेजस्वी यादव को सौंप देंगे। लेकिन, क्या यह संभव है? 

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25 जनवरी को होगा लालू परिवार के भविष्य का फैसला? - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
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विस्तार
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बिहार विधानसभा चुनाव के बाद बिहार के दोनों बड़े क्षेत्रीय दलों में कुछ होगा, यह आसार थे। लेकिन, बाजी भारतीय जनता पार्टी ने मारी। भाजपा ने अपने एक युवा विधायक नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सारी चर्चाएं अपने खाते में कर लीं। कांग्रेस की चर्चा उसके सभी छह विधायकों के भविष्य को लेकर शुरू से चल रही। जनता दल यूनाईटेड में अगली पीढ़ी की चर्चा थी, लेकिन कई और भी बातें आईं। वैसे, अब सुर्खियों में आने वाला है लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल। चर्चा है कि लालू प्रसाद यादव अपना हाथ काटने को तैयार हो गए हैं। ऐसा न तो लालू ने कहा है और न तेजस्वी यादव ने, लेकिन चर्चा-ए-आम है। इस खबर में लालू की पुरानी कहानी और नई संभावना को खुलकर जानें-समझें।

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सबक सीख चुके लालू क्या फिर करेंगे गलती?
बिहार की राजनीति में लंबे समय तक 'किंग मेकर' कहलाने वाले लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल में पिछले साल एक जमाने के 'सुपर सीएम' की एंट्री हुई थी। नाम है- रंजन प्रसाद यादव। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी जगह मिली। वह मौजूदा राजद में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं, लेकिन जब लालू प्रसाद यादव का जलवा था तो रंजन प्रसाद यादव भी रौ में थे। लालू प्रसाद यादव जब चारा घोटाला मामले में जेल जा रहे थे तो उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया था। एक घरेलू और अशिक्षित महिला सीधे सीएम बन गई थीं। तब राजद के अंदर परिवारवाद की यह पहली मिसाल थी। थोड़ी असमंजस वाली स्थिति थी। लेकिन, लालू ने संतुलन दिखाते हुए अपने बेहद करीबी रंजन प्रसाद यादव को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया था। 
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लालू जेल जा रहे थे तो एक तरह से राष्ट्रीय अध्यक्ष का प्राधिकार रंजन यादव को सौंप गए। राजद में एक ही बार कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया, फिर नहीं? इस सवाल के जवाब में, राजद राज में लंबे समय तक कद्दावर मंत्री रहे शिवानंद तिवारी याद करते हुए कहते हैं कि "जब यह पता चला कि रंजन यादव विधायक दल की बैठक बुला रहे हैं और आशंका है कि वह राबड़ी देवी की जगह खुद को सीएम घोषित कर सकते हैं तो लालू प्रसाद यादव ने तत्काल सारे अधिकार वापस ले लिए। उस बात में कितनी सच्चाई थी, यह रंजन यादव या लालू प्रसाद ही बता सकते हैं; लेकिन घटनाक्रम यही रहा था। इसके बाद कार्यकारी अध्यक्ष जैसी शक्तियां कभी किसी को नहीं दी गई। हां, पिछले साल तेजस्वी यादव को लालू प्रसाद यादव ने ज्यादातर शक्तियां दे दीं। संभवत: सिम्बल बांटने की शक्ति राष्ट्रीय अध्यक्ष में ही निहित है और विधायक दल की बैठक के लिए भी उनकी अनुमति अब तक अपरिहार्य है।"
 
तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया तो क्या होगा?
तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की बात अब तक 'सूत्र' आधारित 'कपोल-कल्पित' बात ही है, लेकिन यह असंभव है- यह नहीं कहा जा सकता। तेजस्वी यादव या लालू प्रसाद यादव या परिवार के किसी सदस्य ने अब तक ऐसा कुछ नहीं बताया है। राजद के कोई नेता इस बारे में किसी तरह की जानकारी होने से इनकार कर रहे। सभी बस यही कह रहे कि सूत्रों से पता मीडिया के जरिए ही चल रहा है। जो पता चलना होगा, 25 जनवरी को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान ही होगा।

अब यह जानना जरूरी है कि अगर सचमुच तेजस्वी यादव को लालू यादव ने कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया तो क्या होगा? चाणक्या इंस्टीट्यूट ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं- "हंगामा होगा। पार्टी में नहीं परिवार में। सांसद मीसा भारती और सांसदी का चुनाव लड़ चुकीं रोहिणी आचार्य का रहा-सहा अधिकार भी अपने आप छिन जाएगा। मर्जी तेजस्वी की चलेगी तो मीसा भी कहां रहेंगी, पता नहीं। तेज प्रताप यादव को तो तेजस्वी यादव के कारण ही लालू ने अलग कर दिया था। वह भी हक मांगने आएंगे। ऐसे में लालू के सामने ही परिवार में महाभारत हो तो आश्चर्य नहीं।" 

इसी सवाल का जवाब राजद के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी दूसरे तरीके से देते हैं। कहते हैं- "कई लड़कियों के बाद तेज प्रताप यादव आए थे लालू-राबड़ी की दुनिया में। पार्टी-परिवार से अलग करने की घोषणा अपनी जगह, तेज प्रताप यादव के बुलाव पर लालू प्रसाद दही-चूड़ा भोज में पहुंचे तो यह समझना मुश्किल नहीं कि उस बेटे का महत्व कमतर है। कुछ पारिवारिक परिस्थितियां हैं, जिनके कारण तेजस्वी यादव को पहले ही लालू प्रसाद यादव ने बहुत सारी शक्तियां सौंप दी हैं। अब तक उसका कोई फायदा राजनीतिक या पारिवारिक रूप से तो नजर नहीं आया है, इसलिए तेजस्वी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फैसला लेना उतना भी आसान नहीं है। बेटियां भी राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं। बेटी बड़ी भी है। तेजस्वी तो भाइयों में भी छोटे हैं। बाकी, इस निर्णय की जानकारी या तो लालू प्रसाद के पास होगी या तेजस्वी यादव बता सकेंगे।"

तेजस्वी के पास अभी भी एक तरह से पार्टी पर नियंत्रण
तेजस्वी यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाएगा या नहीं, इसके लिए समय का इंतजार करना होगा। फिलहाल यह भी जानना रोचक है कि राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव भले ही पिछले साल फिर बन गए, लेकिन मूलभूत शक्तियां उन्होंने तेजस्वी को दे दी। कुछ लिखित और कुछ...। अगर ऐसा नहीं होता तो राजद के पोस्टर लालू-मुक्त नहीं हो जाते। बिहार विधानसभा चुनाव के समय प्रत्याशियों को लालू यादव के हाथों बंटे चुनाव चिह्न को लेकर अंदर-बाहर इतना हंगामा नहीं मचा होता।

चुनाव चिह्न देने का अधिकार अब भी लालू के पास है, लेकिन रास्ता तेजस्वी यादव ही एकमात्र हैं। और किसी की नहीं चलती, यह रोहिणी आचार्य प्रकरण में भी सामने आ चुका है। मीसा भारती भी कह चुकी हैं कि पार्टी के रोजमर्रे के निर्णयों का अधिकार तेजस्वी यादव लेते हैं। मतलब, पार्टी पर नियंत्रण एक तरह से तेजस्वी यादव का ही है। अब सिर्फ बात एकाधिकार की है, जिसके लिए इतनी चर्चाएं चल रही हैं। देखना है कि 25 जनवरी को होता क्या है?

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