Bihar : खाकी 'द बिहार चैप्टर' के फेर में फंसे चर्चित आईपीएस अमित लोढ़ा की अपील को हाईकोर्ट ने किया खारिज
Bihar : बिहार कैडर के चर्चित IPS अधिकारी अमित लोढ़ा की अपील को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। विशेष निगरानी इकाई ने 'खाकी: द बिहार चैप्टर' बनाने वाली फ्राइडे स्टोरी टेलर और नेटफ्लिक्स के साथ व्यावसायिक संलिप्तता के सत्यापन के बाद मामला दर्ज किया था।
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विस्तार
सीनियर आईपीएस अधिकारी अमित लोढ़ा एक बार फिर चर्चा में हैं। राजस्थान के मूल निवासी और बिहार के अपराध पर कहानी लिखने के कारण वह पहली बार सुर्खी में आये थे। अब पटना हाईकोर्ट ने अमित लोढ़ा के अपील को खारिज कर दिया है, जिस वजह से वह एक बार फिर सुर्ख़ियों में हैं। उन्होंने खुद पर पर लगे भ्रष्टाचार की एफआईआर को खारिज करने की अपील पटना हाईकोर्ट में की थी, लेकिन कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले को निष्पक्ष जांच के आदेश विशेष निगरानी इकाई (SVU) को दे दिया है। कोर्ट का कहना है कि अमित लोढ़ा की जीवनी पर आधारित किताब पर वेब सिरीज बनाने वाली प्रोडक्शन कंपनी फ्राइडे स्टोरी टेलर एलएलपी से अवैध तरीके से पैसे अर्जित करने के मामले में अगले छह महीने में जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करे।
क्या है मामला
बिहार की विशेष निगरानी इकाई ने चर्चित आईपीएस अधिकारी अमित लोढ़ा पर भ्रष्टाचार के मामले में केस दर्ज किया था। 'खाकी: द बिहार चैप्टर' बनाने वाली फ्राइडे स्टोरी टेलर और नेटफ्लिक्स के साथ व्यावसायिक संलिप्तता के सत्यापन के बाद यह केस दर्ज हुआ था। अमित लोढ़ा पर लगे आरोपों की प्राथमिक जांच के आधार पर भ्रष्टाचार की पुष्टि करते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। इस संबंध में आईपीएस अधिकारियों का कहना था कि भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और भारतीय दंड विधान की इन धाराओं में निलंबन तय है।
क्या लिखा था एफआईआर में
प्राथमिकी के अनुसार, 2 नवंबर 2018 को अमित लोढ़ा और फ्राइडे स्टोरीटेलर्स के बीच एक रुपये में करार हुआ और उनके खाते में 12,372 रुपए आये। उनपर यह भी आरोप है कि लोढ़ा ने स्थापित कहानीकार नहीं होते हुए भी बगैर अनुमति के न केवल किताब लिखी, बल्कि प्रोडक्शन हाउस से इस किताब पर 'खाकी: द बिहार चैप्टर’ बनाने के लिए पत्नी कौमुदी लोढ़ा के द्वारा 49,62,372 रुपए अर्जित भी किये। लोढ़ा पर भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम 1988 की विभिन्न धाराओं और भारतीय दंड विधान 120 (B) और 168 के तहत यह केस दर्ज किया गया। वरीय अधिवक्ता पंकज मैजरवार के अनुसार, दोनों भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम और भारतीय दंड विधान की जो भी धाराएं हैं, वह लोक सेवक की कर्तव्यनिष्ठा को धूमिल करने वाली हैं। इन धाराओं में एक साल से लेकर 10 साल तक की सजा का प्रावधान दर्ज है। उन्होंने कहा कि हालांकि यह कोर्ट का विशेषाधिकार है कि वह तथ्यों को लेकर पेश किए गये सबूतों को कितना विश्वसनीय मानता है।