LPG Crisis: सिलेंडर संकट के दौर में राहत की कहानी, गोबर गैस से चल रही गया जी के इस गांव की रसोई; क्या खास?
बतसपुर गांव एलपीजी संकट के बीच आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गया है। यहां चार वर्षों से गोबर गैस प्लांट के जरिए 40–50 घरों में पाइपलाइन से गैस पहुंच रही है, जिससे रसोई और खेती दोनों को फायदा मिल रहा है।
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देश के कई राज्यों में एलपीजी गैस की किल्लत के बीच बिहार के गया जिले का एक छोटा सा गांव आत्मनिर्भरता की अनोखी मिसाल पेश कर रहा है। बोधगया प्रखंड का बतसपुर गांव पिछले चार वर्षों से गोबर गैस के सहारे अपनी रसोई चला रहा है, जिससे यहां के लोगों पर एलपीजी संकट का कोई असर नहीं पड़ रहा है।
ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध का असर अब भारत में भी दिखाई देने लगा है। कई राज्यों में एलपीजी गैस की आपूर्ति प्रभावित होने से सिलेंडर के लिए लोगों को लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। कई बड़े शहरों में होटल और रेस्टोरेंट भी गैस संकट की वजह से बंद होने की कगार पर पहुंच गए हैं। लेकिन इसी संकट के बीच बिहार के गया जिले का एक गांव देश के सामने आत्मनिर्भरता की अलग ही तस्वीर पेश कर रहा है।
गया जिले के बोधगया प्रखंड का बतसपुर गांव आज गोबर गैस के जरिए अपनी रसोई की जरूरतें पूरी कर रहा है। यहां के ग्रामीणों ने लोहिया स्वच्छ अभियान और गोबरधन योजना के तहत गांव में गोबर गैस प्लांट स्थापित किया है। इस प्लांट से तैयार होने वाली गैस पाइपलाइन के माध्यम से सीधे गांव के घरों की रसोई तक पहुंचाई जाती है। वर्तमान में इस प्लांट से करीब 40 से 50 घरों में गैस की आपूर्ति की जा रही है।
इस व्यवस्था की खास बात यह है कि हर घर के बाहर गैस का मीटर लगाया गया है, जिससे यह पता चलता है कि किस घर में कितना गैस इस्तेमाल हो रहा है। जो ग्रामीण अपने पशुओं का गोबर प्लांट को देते हैं, उन्हें गैस मुफ्त में उपलब्ध कराई जाती है। वहीं जो लोग गोबर नहीं दे पाते, उनसे 25 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से शुल्क लिया जाता है।
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गांव की महिला ललिता देवी बताती हैं कि गोबरधन योजना के तहत गांव में गोबर गैस प्लांट शुरू होने के बाद से काफी बदलाव आया है। पहले गांव में जगह-जगह गोबर फैला रहता था और गंदगी रहती थी, लेकिन अब वही गोबर गैस बनाने में उपयोग हो रहा है। गैस बनने के बाद बचा हुआ अवशेष जैविक खाद के रूप में खेतों में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे खेती को भी फायदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि आज जब एलपीजी सिलेंडर के दाम बढ़ रहे हैं, तब भी उनके गांव के लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है।
वहीं गांव की दूसरी महिला चंचला कुमारी का कहना है कि एलपीजी संकट से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। गांव में प्रधानमंत्री की गोबरधन योजना के तहत चल रहे गोबर गैस प्लांट से सभी लोगों को फायदा मिल रहा है। उन्होंने बताया कि पहले लकड़ी पर खाना बनाने में काफी धुआं होता था, जिससे महिलाओं को परेशानी होती थी। लेकिन अब गोबर गैस पर खाना बनाना आसान और तेज हो गया है। उन्होंने कहा कि इस गैस की आंच भी तेज होती है और करीब 30 मिनट में पूरा खाना तैयार हो जाता है।
गांव के मुखिया ईश्वर मांझी बताते हैं कि ग्रामीणों के सहयोग से यह गोबर गैस प्लांट लगाया गया था, जो पिछले चार वर्षों से सफलतापूर्वक चल रहा है। उन्होंने कहा कि पहले गांव की महिलाएं लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती थीं, जिससे धुएं की समस्या होती थी। लेकिन अब गोबर गैस से खाना बनने लगा है और महिलाओं को धुएं से राहत मिली है।
बतसपुर गांव की यह पहल न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण का उदाहरण है, बल्कि यह देश के अन्य गांवों के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बन गई है। एलपीजी संकट के दौर में यह गांव दिखा रहा है कि स्थानीय संसाधनों का सही उपयोग कर आत्मनिर्भर बना जा सकता है।