Bankipur Election Results: प्रशांत किशोर बांकीपुर विधायक; वोकल और साइलेंट- दोनों तरह के वोट से जीते
Prashant Kishor MLA : जन सुराज पार्टी ने आखिरकार बिहार विधानसभा में प्रवेश पा लिया। विधानसभा चुनाव में 238 प्रत्याशियों में से 236 की जमानत जब्त हुई थी। इस बार पार्टी के कर्ताधर्ता प्रशांत किशोर खुद उतरे। जीते। वजह समझिए।
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बांकीपुर उप चुनाव ने बहुत कुछ दिखा दिया। विधायक बदलना आसान काम नहीं था। भाजपा की 31 साल से चल रही गाड़ी के पहिये को रोका प्रशांत किशोर ने। वही प्रशांत किशोर जो खुद को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाने का दावा करते हैं। बिहार विधानसभा में वह 238 सीटों पर प्रत्याशी लेकर आए थे। खुद नहीं उतरे। इनमें से 236 की जमानत जब्त हो गई। इसके साथ ही प्रशांत किशोर ने एलान किया था कि जनता दल यूनाईटेड 25 सीटें जीत जाए तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे। लेकिन, इन सभी के बाद वह असल राजनीति में अब आए हैं। बांकीपुर के विधायक बने हैं। विधानसभा में तेजस्वी यादव से भी बड़ा चेहरा होंगे, भले अकेले सदस्य हैं अपनी पार्टी के।
प्रशांत किशोर को चुपचाप वोटरों का फायदा ज्यादा
प्रशांत किशोर के समर्थक वोकल और वोटर साइलेंट निकले। इस कारण भाजपा कन्फ्यूज थी। उसे लगता रहा कि हमेशा की तरह साइलेंट वोटर उसके खाते में मतदान करने के लिए बूथ पर आए। कम वोटिंग के कारण डर था, लेकिन पुराने रिकॉर्ड के कारण भाजपा को थोड़े अंतर से ही सही, जीत तय लग रही थी। लेकिन, हो गया उलटा। भाजपा के साइलेंट वोटर इस बार कई मुद्दों पर उससे खफा थे और चुपचाप स्कूल का बस्ता उठाकर चलने का फैसला ले लिया। कमल की जगह उन्हें कीचड़ नजर आया। जन सुराज को दूसरा फायदा राष्ट्रीय जनता दल के वोटरों के साइलेंट होने से भी मिला। तेजस्वी यादव की उदासीनता और प्रशांत किशोर के रूप में विकल्प देखकर राजद के वोटरों ने भी चुपचाप बस्ता उठा लिया। मुस्लिम के साथ यादव वोटरों ने भी लालटेन की जगह बस्ता उठाकर संदेश दिया कि वह उदासीन नेतृत्व के साथ अब नहीं रहेंगे।
भाजपा के खिलाफ होता गया सबकुछ
प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उप चुनाव में अपनी जीत के लिए जितना कुछ किया, उससे ज्यादा भाजपा ने अपनी हार के लिए किया। अप्रैल 2026 से इसकी शुरुआत हो गई थी, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नहीं रहे। भाजपा ने विधानसभा चुनाव में जीत के बाद सीएम बने नीतीश कुमार को हटाकर अपना मुख्यमंत्री बनाया। इसका गुस्सा तो था ही, मौका मिल गया बांकीपुर उप चुनाव के रूप में। रही-सही कसर आगे भी पूरी की गई। बगैर जांच-पड़ताल भाजपा ने पहले अभिषेक कुमार बंटी को उतारा, फिर नामांकन दर्ज कराने के बाद वापस करा लिया। इससे अभिषेक के समर्थक भी नाराज थे। फिर तत्काल नीरज कुमार को प्रत्याशी बनाया, जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं थी। नतीजा नीरज कुमार के बूथ पर भी नजर आ गया। इतना ही नहीं हुआ। यूजीसी मुद्दे ने सवर्णों को नाराज पहले से कर रखा था। ई20 पेट्रोल को लेकर चल रही मनमानी, सीएनजी-पेट्रोल-डीजल के साथ रसोई गैस की कीमतों में कमी नहीं करने के फैसले भी भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में काम आए। फिर, NEET परीक्षा परिणाम में गड़बड़ी को लेकर हुए आंदोलन ने अभिभावकों के मन में भाजपा के प्रति थोड़ी नाराजगी भर दी। उसके बाद भी गलतियों का सिलसिला नहीं थमा। पार्टी ने रोड शो में समय गुजारा और वोटरों तक संपर्क की जगह इलाके के ठेकेदारों को वोट मैनेज करने में लगा दिया। अगर सबसे बड़ा कारण देखें तो भाजपा का प्रत्याशी चयन और मुख्यमंत्री बदलना रहा।
प्रशांत किशोर ने नीतीश का मुद्दा समझा
प्रशांत किशोर ने क्या किया, यह जानना है तो जन सुराज की बैठकों पर नजर डालना होगा। प्रशांत किशोर ने बड़ी जनसभाओं और रोड शो को किनारे कर दिया। जनसंपर्क ही करते रहे। मुहल्लों में लोगों से मिलने के लिए गए। भीड़ जुटाई, लेकिन अनियंत्रित नहीं। इस भीड़ को समझाया कि क्यों भाजपा को सबक सिखाना जरूरी है। उन्होंने नीतीश कुमार को कुर्सी से उतारे जाने को मुद्दा बनाया। उसे ही लोगों तक पहुंचाया। यह मैसेज सभी जातियों में कारगर रहा। यहां तक कि भाजपा के कोर वोटर कायस्थों में भी। भूमिहार-ब्राह्मण वोटर प्रशांत किशोर के साथ आ ही रहे थे, राजपूतों-कायस्थों ने भी बस्ता उठाकर भाजपा को सबक सिखाने की ठानी। परिणाम सामने है।