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Bihar: भोजपुर एनकाउंटर मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट, भारत भूषण तिवारी की मौत पर एफआईआर और स्वतंत्र जांच की मांग
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना/नई दिल्ली
Published by: Ashutosh Pratap Singh
Updated Sun, 21 Jun 2026 06:50 PM IST
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सार
याचिका में दावा किया गया है कि भारत भूषण तिवारी ने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था और घटना के समय निहत्थे थे। वहीं पुलिस का कहना है कि तिवारी ने पुलिस टीम पर फायरिंग की थी, जिसके जवाब में कार्रवाई की गई।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : PTI
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विस्तार
बिहार के भोजपुर जिले में भारत भूषण तिवारी की कथित एनकाउंटर में हुई मौत का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट से स्वतः संज्ञान लेने, एफआईआर दर्ज कराने, स्वतंत्र जांच कराने और पुलिस एनकाउंटर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने की मांग की गई है। इस बीच मामले को लेकर राजनीतिक विवाद भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट में दी गई याचिका जैसी प्रस्तुति
अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को एक प्रतिनिधित्व सौंपा है। इसमें मांग की गई है कि 17 जून को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौती गांव में हुई घटना की कोर्ट की निगरानी में जांच कराई जाए। प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि इस घटना ने कानून के शासन, संवैधानिक अधिकारों और पुलिस एनकाउंटर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
परिवार ने सरेंडर के बाद गोली मारने का लगाया आरोप
प्रतिनिधित्व में दावा किया गया है कि भारत भूषण तिवारी के परिजनों और ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था और अपना पिस्तौल भी फेंक दिया था। परिजनों का आरोप है कि सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो भी इस बात की ओर संकेत करते हैं कि गोली चलने से पहले उन्होंने सरेंडर कर दिया था। परिवार का कहना है कि घटना के समय भारत भूषण तिवारी निहत्थे थे और यह कोई वास्तविक मुठभेड़ नहीं बल्कि एक कथित फर्जी एनकाउंटर था।
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सामाजिक मुद्दों को उठाने वाले युवक थे भारत भूषण
प्रतिनिधित्व में दावा किया गया है कि भारत भूषण तिवारी के खिलाफ किसी पुराने आपराधिक मामले या एफआईआर की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है। उन्हें स्नातक शिक्षित युवक बताया गया है, जो सोशल मीडिया के माध्यम से बाढ़, कटाव और जनसमस्याओं जैसे मुद्दों को उठाते थे। प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि यदि उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था तो वह ऐसी कोई तत्काल धमकी नहीं थे, जिसके लिए जानलेवा बल प्रयोग जरूरी हो।
हत्या का मामला दर्ज करने की मांग
याचिका में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति सरेंडर कर चुका हो और उससे तत्काल खतरा न हो, तो उसके खिलाफ घातक बल का प्रयोग कानून के दायरे से बाहर माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103 के तहत हत्या का मामला बन सकता है, जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला
प्रतिनिधित्व में सुप्रीम कोर्ट के पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र सरकार (2014) फैसले का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि किसी भी एनकाउंटर मौत के मामले में एफआईआर दर्ज करना, स्वतंत्र जांच कराना, मजिस्ट्रियल जांच करवाना, सबूत सुरक्षित रखना और राष्ट्रीय या राज्य मानवाधिकार आयोग को सूचना देना अनिवार्य है। याचिका में कहा गया है कि पुलिस एनकाउंटर एक असाधारण परिस्थिति में अपनाया जाने वाला कदम है और इसे गिरफ्तारी, जांच, मुकदमे और न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
पुलिसकर्मियों के निलंबन पर भी उठे सवाल
प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि घटना में शामिल कुछ पुलिसकर्मियों को बाद में निलंबित किए जाने की खबरें सामने आई हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे भी मुठभेड़ की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि घटना के खिलाफ प्रदर्शन करने और न्याय की मांग करने वाले कुछ लोगों पर आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, जिससे गवाहों और प्रभावित लोगों में डर का माहौल है।
सीबीआई या एसआईटी जांच की मांग
सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही स्थानीय पुलिस व्यवस्था से अलग किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे सीबीआई या विशेष जांच दल (एसआईटी), से जांच कराई जाए। याचिका में घटना से जुड़े सभी वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग, वायरलेस संचार और फोरेंसिक सबूतों को सुरक्षित रखने की भी मांग की गई है।
एनएचआरसी और राज्य मानवाधिकार आयोग से भी जांच की मांग
प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि कानून के शासन की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब कथित फर्जी एनकाउंटर के आरोपों की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच हो। इसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) और बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग से भी मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है। साथ ही मृतक के परिजनों और संभावित गवाहों को सुरक्षा देने की भी अपील की गई है।
बिहार सरकार ने बैठाई न्यायिक जांच
भोजपुर एनकाउंटर को लेकर बढ़ते विवाद और राजनीतिक दबाव के बीच बिहार सरकार ने शनिवार को न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। सरकार ने घोषणा की है कि मामले की जांच एक सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश करेंगे, जो घटना से जुड़े सभी तथ्यों और विवादित पहलुओं की पड़ताल करेंगे।
सत्ता पक्ष के नेताओं ने भी उठाए सवाल
जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने कहा कि घटना से जुड़े वायरल वीडियो कई सवाल खड़े करते हैं। उन्होंने कहा कि केवल चार पुलिसकर्मियों का निलंबन पर्याप्त नहीं है और पूरे मामले की समयबद्ध जांच होनी चाहिए। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता अश्विनी चौबे ने भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि भारत भूषण तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था और निहत्थे थे, तो फिर उन पर गोली क्यों चलाई गई। आरा सांसद सुदामा प्रसाद ने भी बिलौती गांव पहुंचकर परिजनों से मुलाकात की और दावा किया कि उपलब्ध वीडियो और अन्य साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि मुठभेड़ कथित तौर पर सुनियोजित हो सकती है।
पुलिस अपने दावे पर कायम
हालांकि पुलिस का कहना है कि भारत भूषण तिवारी को पकड़ने गई टीम पर उन्होंने पहले गोली चलाई थी। पुलिस के अनुसार जवाबी कार्रवाई में फायरिंग हुई, जिसमें उनकी मौत हुई। दूसरी ओर परिजन और ग्रामीण लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था और उसके बाद उन्हें गोली मारी गई। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो सामने आने के बाद इस पूरे मामले को लेकर विवाद और गहरा गया है तथा अब सभी की नजरें न्यायिक जांच और संभावित कानूनी कार्रवाई पर टिकी हैं।
सुप्रीम कोर्ट में दी गई याचिका जैसी प्रस्तुति
अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को एक प्रतिनिधित्व सौंपा है। इसमें मांग की गई है कि 17 जून को भोजपुर जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र के बिलौती गांव में हुई घटना की कोर्ट की निगरानी में जांच कराई जाए। प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि इस घटना ने कानून के शासन, संवैधानिक अधिकारों और पुलिस एनकाउंटर से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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परिवार ने सरेंडर के बाद गोली मारने का लगाया आरोप
प्रतिनिधित्व में दावा किया गया है कि भारत भूषण तिवारी के परिजनों और ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था और अपना पिस्तौल भी फेंक दिया था। परिजनों का आरोप है कि सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो भी इस बात की ओर संकेत करते हैं कि गोली चलने से पहले उन्होंने सरेंडर कर दिया था। परिवार का कहना है कि घटना के समय भारत भूषण तिवारी निहत्थे थे और यह कोई वास्तविक मुठभेड़ नहीं बल्कि एक कथित फर्जी एनकाउंटर था।
सामाजिक मुद्दों को उठाने वाले युवक थे भारत भूषण
प्रतिनिधित्व में दावा किया गया है कि भारत भूषण तिवारी के खिलाफ किसी पुराने आपराधिक मामले या एफआईआर की सार्वजनिक जानकारी सामने नहीं आई है। उन्हें स्नातक शिक्षित युवक बताया गया है, जो सोशल मीडिया के माध्यम से बाढ़, कटाव और जनसमस्याओं जैसे मुद्दों को उठाते थे। प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि यदि उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था तो वह ऐसी कोई तत्काल धमकी नहीं थे, जिसके लिए जानलेवा बल प्रयोग जरूरी हो।
हत्या का मामला दर्ज करने की मांग
याचिका में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति सरेंडर कर चुका हो और उससे तत्काल खतरा न हो, तो उसके खिलाफ घातक बल का प्रयोग कानून के दायरे से बाहर माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 103 के तहत हत्या का मामला बन सकता है, जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का हवाला
प्रतिनिधित्व में सुप्रीम कोर्ट के पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र सरकार (2014) फैसले का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि किसी भी एनकाउंटर मौत के मामले में एफआईआर दर्ज करना, स्वतंत्र जांच कराना, मजिस्ट्रियल जांच करवाना, सबूत सुरक्षित रखना और राष्ट्रीय या राज्य मानवाधिकार आयोग को सूचना देना अनिवार्य है। याचिका में कहा गया है कि पुलिस एनकाउंटर एक असाधारण परिस्थिति में अपनाया जाने वाला कदम है और इसे गिरफ्तारी, जांच, मुकदमे और न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।
पुलिसकर्मियों के निलंबन पर भी उठे सवाल
प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि घटना में शामिल कुछ पुलिसकर्मियों को बाद में निलंबित किए जाने की खबरें सामने आई हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे भी मुठभेड़ की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं। साथ ही यह भी आरोप लगाया गया है कि घटना के खिलाफ प्रदर्शन करने और न्याय की मांग करने वाले कुछ लोगों पर आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं, जिससे गवाहों और प्रभावित लोगों में डर का माहौल है।
सीबीआई या एसआईटी जांच की मांग
सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया जाए। साथ ही स्थानीय पुलिस व्यवस्था से अलग किसी स्वतंत्र एजेंसी, जैसे सीबीआई या विशेष जांच दल (एसआईटी), से जांच कराई जाए। याचिका में घटना से जुड़े सभी वीडियो, सीसीटीवी फुटेज, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग, वायरलेस संचार और फोरेंसिक सबूतों को सुरक्षित रखने की भी मांग की गई है।
एनएचआरसी और राज्य मानवाधिकार आयोग से भी जांच की मांग
प्रतिनिधित्व में कहा गया है कि कानून के शासन की विश्वसनीयता तभी बनी रह सकती है, जब कथित फर्जी एनकाउंटर के आरोपों की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच हो। इसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) और बिहार राज्य मानवाधिकार आयोग से भी मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई है। साथ ही मृतक के परिजनों और संभावित गवाहों को सुरक्षा देने की भी अपील की गई है।
बिहार सरकार ने बैठाई न्यायिक जांच
भोजपुर एनकाउंटर को लेकर बढ़ते विवाद और राजनीतिक दबाव के बीच बिहार सरकार ने शनिवार को न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। सरकार ने घोषणा की है कि मामले की जांच एक सेवानिवृत्त हाईकोर्ट न्यायाधीश करेंगे, जो घटना से जुड़े सभी तथ्यों और विवादित पहलुओं की पड़ताल करेंगे।
सत्ता पक्ष के नेताओं ने भी उठाए सवाल
जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने कहा कि घटना से जुड़े वायरल वीडियो कई सवाल खड़े करते हैं। उन्होंने कहा कि केवल चार पुलिसकर्मियों का निलंबन पर्याप्त नहीं है और पूरे मामले की समयबद्ध जांच होनी चाहिए। पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता अश्विनी चौबे ने भी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए पूछा कि यदि भारत भूषण तिवारी ने आत्मसमर्पण कर दिया था और निहत्थे थे, तो फिर उन पर गोली क्यों चलाई गई। आरा सांसद सुदामा प्रसाद ने भी बिलौती गांव पहुंचकर परिजनों से मुलाकात की और दावा किया कि उपलब्ध वीडियो और अन्य साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि मुठभेड़ कथित तौर पर सुनियोजित हो सकती है।
पुलिस अपने दावे पर कायम
हालांकि पुलिस का कहना है कि भारत भूषण तिवारी को पकड़ने गई टीम पर उन्होंने पहले गोली चलाई थी। पुलिस के अनुसार जवाबी कार्रवाई में फायरिंग हुई, जिसमें उनकी मौत हुई। दूसरी ओर परिजन और ग्रामीण लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने पहले ही आत्मसमर्पण कर दिया था और उसके बाद उन्हें गोली मारी गई। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो सामने आने के बाद इस पूरे मामले को लेकर विवाद और गहरा गया है तथा अब सभी की नजरें न्यायिक जांच और संभावित कानूनी कार्रवाई पर टिकी हैं।