दलितों के नेता कोटे पर क्यों भिड़े?: आरक्षण पर सत्ताधारी गठबंधन एनडीए के अंदर रार, तेजस्वी यादव क्या कर रहे?
Reservation : आरक्षण पर चल रही अखिल भारतीय बहस बिहार में दूसरे ढर्रे पर है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में ही रार मची है। दलित नेताओं के बीच ही तकरार है। रार-तकरार की वजह वरिष्ठ पत्रकारों ने क्या बताई? फायदे-नुकसान भी बताए।
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विस्तार
बिहार में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर सियासत के केंद्र में है। इस बार दिलचस्प बात यह है कि आरक्षण को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर ही दो बड़े दलित नेताओं केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच सीधी बहस छिड़ गई है। मुद्दा है अनुसूचित जाति (एससी) आरक्षण में उप-वर्गीकरण यानी कोटा के भीतर कोटा और क्रीमी लेयर। दोनों नेता दलित समाज के हित की बात कर रहे हैं, लेकिन उनके रास्ते अलग हैं। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों नेता एक-दूसरे का इस्तीफा तक मांगने लगे। विपक्ष ने इस मौके का फायदा उठाया और दोनों को घेरते हुए आरोप लगाया कि यह दोनों आरक्षण के विरोधी है, क्योंकि यह दोनों भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। आइये जानते हैं पूरी बात...
मांझी का तर्क: आरक्षण का लाभ सबसे वंचित तक पहुंचे
जीतन राम मांझी का तर्क है कि अनुसूचित जाति के भीतर भी सभी जातियां समान रूप से पिछड़ी नहीं हैं। कुछ समुदाय आरक्षण का अपेक्षाकृत अधिक लाभ उठा चुके हैं, जबकि कई जातियां आज भी शिक्षा, सरकारी नौकरी और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के मामले में काफी पीछे हैं। मांझी चाहते हैं कि एससी आरक्षण के भीतर ही अधिक वंचित जातियों की पहचान कर उन्हें प्राथमिकता दी जाए। उनके अनुसार इससे आरक्षण कमजोर नहीं होगा, बल्कि उसका लाभ उन लोगों तक पहुंचेगा जिन्हें अब तक अपेक्षित हिस्सा नहीं मिल पाया है। मांझी की राजनीति में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बिहार में महादलित और अत्यंत वंचित दलित समूहों के बीच अपनी राजनीतिक पहचान बनाए हुए हैं। मांझी ने कहा कि आरक्षण के लाभ का न्यायसंगत वितरण हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) का पुराना सिद्धांत रहा है। पार्टी लंबे समय से इस मुद्दे पर अपनी राय रखती आई है और आगे भी इसी नीति पर कायम रहेगी। उन्होंने कहा कि गरीब और वास्तविक जरूरतमंद वर्गों के हितों की रक्षा के लिए उनकी पार्टी हर स्तर पर संघर्ष करती रहेगी। उन्होंने कहा कि रामसुंदर दास एक ऐसे दलित नेता जो कि आरक्षित सीट से नहीं बल्कि सामान्य सीट (सोनपुर) से लड़कर विधानसभा पहुंचते थे। वह मुख्यमंत्री भी रहे। ऐसा उदाहरण चिराग और मांझी को भी आगामी चुनाव में देना चाहिए।
आरक्षण खत्म नहीं, दायरा बढ़ाने की मांग
केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री संतोष सुमन ने स्पष्ट किया कि उनकी मांग आरक्षण समाप्त करने की नहीं है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग के भीतर भी कई ऐसे समुदाय हैं जो आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। शिक्षा, आर्थिक स्थिति, सामाजिक सम्मान और छुआछूत जैसी समस्याओं से वे अब भी जूझ रहे हैं। ऐसे वंचित वर्गों को आगे लाने के लिए आरक्षण की सीमा बढ़ाने और लाभ के बेहतर वितरण पर विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक आरक्षण का वास्तविक लाभ पहुंचना चाहिए। यदि वर्षों बाद भी कुछ समुदाय शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान से वंचित हैं तो इस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है। यही उनकी मांग का मूल उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि चिराग पासवान उनकी बात को सही संदर्भ में नहीं समझ रहे हैं। संतोष कुमार सुमन ने आरक्षण समाप्त करने की नहीं, बल्कि समाज के वंचित तबकों तक इसका वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए समीक्षा और उचित बंटवारे की बात कही है।
चिराग का विरोध: दलित समाज को बांटने का खतरा
केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान इस तरह की व्यवस्था को लेकर ज्यादा सतर्क हैं। उनका तर्क है कि एससी आरक्षण सिर्फ आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर नहीं दिया गया है। इसके पीछे सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और जातिगत वंचना का इतिहास है। चिराग ने कहा कि मुझे आशंका है कि अगर क्रीमी लेयर या इसी तरह की कोई नई व्यवस्था लागू होती है तो इसका असर पूरे एससी समुदाय के आरक्षण अधिकार पर पड़ सकता है। उनके लिए सबसे बड़ा सवाल है कि एससी समाज के भीतर किस आधार पर यह तय किया जाएगा कि कौन आरक्षण का हकदार है और कौन नहीं? चिराग पासवान ने कहा कि समाज के हर वर्ग की चिंताओं का समाधान करना सरकार की जिम्मेदारी है। अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग या ऊंची जाति से आने वाले लोगों की अपनी-अपनी चिंताएं हैं और इनका समाधान संवाद के जरिए ही निकाला जा सकता है। किसी एक वर्ग की समस्या का समाधान दूसरे वर्ग के आरक्षण को छीनकर नहीं किया जा सकता।
मांझी बनाम चिराग: सिर्फ आरक्षण की बहस नहीं
वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण बागी बताते हैं कि बहस आरक्षण की नीति को लेकर है, लेकिन बिहार की राजनीति में इसके पीछे दलित नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चिराग पासवान बिहार में रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत के सबसे बड़े दावेदार हैं। पासवान समाज के बीच उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। दूसरी ओर जीतन राम मांझी खुद महादलित राजनीति से उभरे हैं और मुसहर समुदाय सहित सबसे वंचित महादलित समूहों के बीच अपनी अलग पहचान रखते हैं। दोनों अपने-अपने वर्गों पर मजबूत पकड़ बनाना चाहते हैं। नीतीश कुमार भी लव-कुश समीकरण की राजनीति के जरिए लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे। लालू प्रसाद ने भी अपना कोर वोटबैंक यादवों को ही बनाया। ठीक इसी तरह मांझी और चिराग भी अपने-अपने समाज के हित की बात कर उन्हें अपना कोर वोटबैंक बनाना चाहते हैं। ताकि चुनाव में इसका लाभ मिल सके। इसलिए इस तरह की बयानबाजी कर रहे हैं। हालांकि, आरक्षण में सुधार को यह दोनों गंभीर नहीं है। अगर गंभीर होते तो दोनों आगे बढ़कर कहते कि हमें आरक्षण का लाभ नहीं चाहते हैं। इन दोनों के लिए परिवार पहले आता है। इसलिए पार्टी से सरकार तक अपने परिवार वालों को पहले सेट करते हैं, बाकी किसी अन्य के बारे में सोचते हैं। दलित और देश इनके लिए प्राथमिकता नहीं है।
बिहार में दलित वोट का गणित क्यों महत्वपूर्ण?
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा बताते हैं कि बिहार की चुनावी राजनीति में दलित मतदाता लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। इनकी आबादी 2 करोड़ 56 लाख 89 हजार 820 है। यानी राज्य की कुल आबादी का 19.65 फीसदी। इनमें चिराग पासवान के समाज की संख्या करीब 5.50 फीसदी और जीतन राम मांझी के समाज की संख्या करीब सवा तीन फीसदी है। लेकिन, दलित समाज एकसमान राजनीतिक समूह नहीं है। अलग-अलग जातियों के अपने सामाजिक और राजनीतिक हित हैं। यही वह बिंदु है जहां ‘दलित’ और ‘महादलित’ की राजनीति महत्वपूर्ण हो जाती है। चिराग दलित श्रेणी में आते हैं और मांझी महादलित श्रेणी में। मांझी की राजनीति का जोर उस समाज पर है जिन्हें वह आरक्षण के बावजूद अपेक्षित लाभ से वंचित मानते हैं। वहीं चिराग की राजनीति का आधार व्यापक दलित पहचान और विशेष रूप से पासवान समाज में मजबूत समर्थन से जुड़ा है।
एनडीए के लिए चुनौती क्या?
वरिष्ठ पत्रकार लव कुमार मिश्रा बताते हैं कि जीतन राम मांझी और चिराग पासवान दोनों एनडीए के महत्वपूर्ण सहयोगी हैं। इसलिए इस विवाद को ज्यादा बढ़ने देना गठबंधन के लिए राजनीतिक रूप से असहज स्थिति पैदा कर सकता है। एनडीए के सामने चुनौती यह है कि वह एक तरफ दलित समाज के अलग-अलग वर्गों की आकांक्षाओं को साधे और दूसरी तरफ सहयोगी दलों के बीच बढ़ती बयानबाजी को भी नियंत्रित रखे। खास बात यह है कि बिहार में चुनावी राजनीति में जातीय समीकरण बेहद महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर चिराग और मांझी के अलग-अलग रुख का असर केवल विधानसभा की सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि गठबंधन के सामाजिक समीकरण पर भी पड़ सकता है।
तेजस्वी यादव को भी मिला हमला करने का मौका, क्या कहा इस मामले पर?
एनडीए के दो प्रमुख दलित नेताओं के बीच छिड़ी यह बहस विपक्ष के लिए भी राजनीतिक मौका बन गई है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने मांझी और चिराग के आरक्षण संबंधी बयानों पर सवाल उठाते हुए दोनों नेताओं को सामान्य सीट से चुनाव लड़ने की चुनौती तक दी। तेजस्वी यादव ने कहा कि कुछ नेता आरक्षण का लाभ लेने के साथ ही आरक्षण खत्म करने वालों के साथ खड़े हैं। तेजस्वी ने चिराग पासवान, जीतन राम मांझी, नीतीश कुमार की पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा पर निशाना साधते हुए कहा कि जो आरक्षण को खत्म करना चाहता है, ये लोग उसके साथ खड़े हैं। उन्होंने कहा कि अगर चिराग और मांझी में दम है तो अपनी आरक्षित सीटों से इस्तीफा दें और सामान्य सीट से चुनाव लड़कर दिखाएं। उन्होंने कहा कि नेता आरक्षण का फायदा भी उठाएंगे, सत्ता की मलाई भी खाएंगे और मंत्री भी बनेंगे, लेकिन बाद में आरक्षण को लेकर बहस करेंगे।
भाजपा की ओर से मंत्री लखेंद्र रोशन ने रखा पक्ष, जीतन राम मांझी से क्या सवाल पूछ लिया?
भाजपा की ओर बिहार सरकार में मंत्री लखेंद्र रोशन उर्फ लखेंद्र पासवान ने कहा कि भाजपा ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है और पीएम नरेंद्र मोदी जब तक है आरक्षण की समीक्षा तो दूर, इसके साथ कोई छेड़छाड़ तक नहीं कर सकता है। आज आरक्षण का लाभ हर समाज को मिल रहा है। चिराग पासवान और जीतन राम मांझी भारत सरकार में मंत्री हैं। दोनों बड़े नेता है। दोनों लोकसभा के सदस्य हैं। सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि आरक्षण पर कहीं चर्चा नहीं हो रही है। लेकिन, जीतन राम मांझी कह रहे हैं कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। वह बड़े नेता हैं इसलिए मैं उनसे कहना चाहता हूं कि वह एससी समाज की स्थिति को जाकर देखिए। आप थोड़ा अपने परिवार के दायरे से निकलिए तब मुसहर समाज की स्थिति का आपको पता चलेगा। आपने अपने परिवार के दायरे से निकलकर समाज के लोगों को कितना मौका दिया है? पहले यह सोच लीजिए फिर समीक्षा की बात कीजिएगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बहस को दी नई जमीन, उप-वर्गीकरण और क्रीमिलेयर अलग कैसे?
अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने पंजाब बनाम देवेंद्र सिंह केस में एससी के भीतर उप-वर्गीकरण को संवैधानिक रूप से स्वीकार किया था। इस फैसले के बाद राज्यों के पास यह संभावना बनी कि वे उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एससी के भीतर अधिक वंचित समूहों के लिए अलग व्यवस्था कर सकें। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है कि उप-वर्गीकरण और क्रीमिलेयर दोनों अलग अलग चीज है। उप-वर्गीकरण का अर्थ है कि एससी आरक्षण के भीतर अलग-अलग समूहों को उनकी वंचना के आधार पर हिस्सेदारी या प्राथमिकता देना। वहीं क्रीमी लेयर का अर्थ है कि एससी वर्ग में सामाजिक-आर्थिक रूप से पर्याप्त रूप से आगे निकल चुके लोगों को आरक्षण के लाभ से बाहर करने की व्यवस्था।