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Bihar News: स्मार्ट सिटी या भ्रष्टाचार की लाइट शो? लाखों खर्च, पर सड़कें और बाजार अंधेरे में

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, छपरा Published by: सारण ब्यूरो Updated Fri, 06 Feb 2026 11:18 AM IST
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सार

मढ़ौरा नगर पंचायत में हाई मास्ट लाइट और स्ट्रीट लाइट लगाने के बड़े दावे झूठ साबित हो रहे हैं। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद कई लाइटें काम नहीं कर रही हैं, जिससे नगरवासी अंधेरे में रहने को मजबूर हैं।

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मढ़ौरा नगर पंचायत की हाई मास्ट लाइट बनी दिखावा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

बिहार सरकार और स्थानीय नगर निकायों की “स्मार्ट सिटी” और “जगमग नगर” जैसी योजनाओं का हकीकत में कितना खोखला असर है, यह मढ़ौरा नगर पंचायत में साफ देखा जा सकता है। करोड़ों रुपए खर्च कर लगाए गए हाई मास्ट लाइट और स्ट्रीट लाइट अब रोशनी देने के बजाय सरकारी लापरवाही और भ्रष्ट तंत्र की खुली प्रदर्शनी बन चुके हैं।
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17 नए स्थानों पर लगाईं गई थी हाई मास्ट लाइट

नगर को जगमग करने के लिए मार्च 2025 में मढ़ौरा के 17 नए स्थानों पर हाई मास्ट लाइट लगाए गए। इससे पहले ही मुख्य बाजार सहित छह स्थानों पर हाई मास्ट लाइट मौजूद थे। कुल मिलाकर नगर में 23 हाई मास्ट लाइट होने का दावा किया गया। इन 17 नई लाइटों पर अकेले 1 करोड़ 31 लाख रुपए खर्च किए गए, यानी प्रति लाइट करीब 7.70 लाख रुपए की लागत।
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लेकिन हकीकत इससे उलट है। बाजार के बीचोंबीच स्थित रेफरल अस्पताल परिसर की हाई मास्ट लाइट पिछले दस दिनों से बंद पड़ी है। स्थानीय लोगों ने नगर प्रशासन को इसकी सूचना दी, लेकिन प्रशासन की नींद नहीं खुली। अस्पताल जैसे संवेदनशील जगह पर अंधेरा होना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा के साथ खुला खिलवाड़ भी है।

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नगर पंचायत कार्यालय दावा कर सकता है कि सभी हाई मास्ट लाइट काम कर रही हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई इन दावों की पोल खोल रही है। यह पहली बार नहीं है। नगर में पहले भी रोशनी के नाम पर करोड़ों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। 2014-15 में स्ट्रीट लाइट पर करीब दो करोड़ और 2022-23 में डेढ़ करोड़ रुपए खर्च हुए, लेकिन आधी से ज्यादा लाइटें अभी भी खराब हैं और पूरा नगर अंधेरे में है।

पहले भी उठ चुके हैं सवाल

वार्ड पार्षद पहले ही स्ट्रीट लाइट और हाई मास्ट लाइट की गुणवत्ता पर सवाल उठा चुके हैं। कार्यपालक अधिकारी को लिखित शिकायत में आरोप लगाया गया कि 2000 लाइट की बजाय सिर्फ 1400 लाइट ही लगाई गईं और बाकी राशि का गबन कर लिया गया। इसके बावजूद किसी एजेंसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई और न किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हुई।

यह पूरा मामला बिहार सरकार की योजनाओं और स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। सवाल उठता है कि करोड़ों रुपए सिर्फ कमीशन, टेंडर और दिखावटी विकास के लिए खर्च किए जा रहे हैं, जबकि नगरवासियों की सुरक्षा, सुविधा और विश्वास की कोई कीमत नहीं है।
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